दुनिया में मचा डर, लेकिन भारत दिखा शांत
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। फारस की खाड़ी में युद्ध जैसे हालात बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने लगा है। लेकिन इस पूरे संकट के बीच भारत ने बेहद संतुलित और व्यावहारिक रणनीति अपनाई है। यही कारण है कि आज दुनिया भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक सोच की सराहना कर रही है।
क्या भारत को पहले से था खतरे का अंदेशा?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह अपनी विदेश नीति और ऊर्जा रणनीति को मजबूत किया, उससे साफ संकेत मिलता है कि नई दिल्ली संभावित वैश्विक संकटों को पहले से समझ रही थी। भारत ने तेल आयात के नए विकल्प तलाशे, सामरिक तेल भंडार बढ़ाए और अलग-अलग देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे। यही तैयारी आज भारत की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई है।
“राष्ट्रहित प्रथम” नीति ने बदल दिया पूरा समीकरण
भारत ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि उसकी विदेश नीति का पहला उद्देश्य देश के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी होने के बावजूद भारत ने ईरान के साथ अपने संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं किए। यही संतुलन आज भारत को बाकी देशों से अलग पहचान देता है। जहां कई देश किसी एक पक्ष के समर्थन में खुलकर खड़े दिखाई दे रहे हैं, वहीं भारत ने संवाद, शांति और संतुलन की नीति अपनाई है।
फारस की खाड़ी क्यों है पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण?
फारस की खाड़ी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाती है। दुनिया के कई बड़े देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं। अगर यहां युद्ध या समुद्री मार्गों में बाधा आती है तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। भारत जैसे देश, जो बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं, उनके लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील बन जाती है। यही कारण है कि भारत ने पहले से ही ऊर्जा सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया।
तेल संकट से बचने के लिए भारत ने क्या तैयारी की?
भारत ने केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से भी तेल आयात बढ़ाया। इससे भारत की ऊर्जा आपूर्ति अधिक सुरक्षित हुई। वर्तमान संकट के दौरान यही रणनीति भारत के लिए बड़ी राहत साबित हो रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत ने समय रहते यह बदलाव नहीं किया होता तो देश पर तेल संकट का बड़ा असर पड़ सकता था।
भारतीय नौसेना की बढ़ी सक्रियता
ईरान-अमेरिका तनाव के बीच भारत ने समुद्री सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी। भारतीय नौसेना ने हिंद महासागर और अरब सागर में अपनी निगरानी बढ़ाई। व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की रक्षा के लिए विशेष तैयारियां की गईं। इससे दुनिया को यह संदेश गया कि भारत केवल बयानबाजी नहीं बल्कि वास्तविक रणनीतिक तैयारी पर भी काम कर रहा है।
बदल रही है दुनिया में भारत की भूमिका
कुछ वर्षों पहले तक भारत कई बार वैश्विक दबावों के अनुसार फैसले लेता दिखाई देता था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भारत अब किसी एक शक्ति के प्रभाव में आने के बजाय अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर आगे बढ़ रहा है। यही वजह है कि भारत अमेरिका के साथ QUAD में भी सक्रिय है और रूस तथा ईरान के साथ भी संतुलित संबंध बनाए हुए है।
खाड़ी देशों में बसे भारतीयों की सुरक्षा बनी प्राथमिकता
खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं और वहां से आने वाला विदेशी मुद्रा प्रवाह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में भारत सरकार लगातार अपने नागरिकों की सुरक्षा पर नजर बनाए हुए है। जरूरत पड़ने पर निकासी अभियान चलाने की तैयारी भी की जा रही है ताकि किसी भी संकट में भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वापस लाया जा सके।
शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था पर कितना असर?
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव शेयर बाजार, मुद्रा विनिमय दर और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है। हालांकि भारत ने अपनी आर्थिक नीतियों और वित्तीय रणनीति को पहले से मजबूत बनाकर जोखिम कम करने की कोशिश की है। यही वजह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई दे रही है।
भारत की नई डिप्लोमेसी क्यों हो रही चर्चा में?
वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि भारत अब भावनात्मक
विदेश नीति के बजाय रणनीतिक विदेश नीति पर काम कर रहा है।
भारत ने किसी भी युद्ध या सैन्य टकराव का खुला समर्थन करने के बजाय शांति और संवाद का रास्ता चुना।
इससे भारत की छवि एक जिम्मेदार और परिपक्व वैश्विक शक्ति के रूप में मजबूत हुई है।
दुनिया के लिए नया मॉडल बन रहा भारत
मध्य पूर्व में बढ़ता संकट आने वाले समय में पूरी दुनिया की राजनीति और
अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। लेकिन भारत ने जिस तरह अपने ऊर्जा हितों,
व्यापारिक मार्गों और रणनीतिक साझेदारियों को संतुलित किया है, उससे साफ हो गया है कि
नई दिल्ली अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं बल्कि वैश्विक रणनीतिक खिलाड़ी बन चुकी है।
आने वाले दिनों में क्या हो सकता है बड़ा असर?
अगर फारस की खाड़ी में हालात और बिगड़ते हैं तो तेल की
कीमतों में भारी उछाल, वैश्विक बाजारों में अस्थिरता और
समुद्री व्यापार संकट गहरा सकता है। ऐसे समय में भारत की “राष्ट्रहित प्रथम” नीति देश को बड़े आर्थिक और
रणनीतिक झटकों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यही कारण है कि
आज दुनिया भारत की विदेश नीति को एक सफल और व्यावहारिक मॉडल के रूप में देख रही है।
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