AMU के अध्ययन में खुलासा
देश में बुजुर्गों के सामने बढ़ता खाद्य संकट अब एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है। Aligarh Muslim University द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि बड़ी संख्या में बुजुर्ग किसी न किसी स्तर पर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं।
क्या कहता है अध्ययन
यह शोध Food and Humanity Journal में प्रकाशित हुआ है और इसमें देशभर के 31 हजार से अधिक बुजुर्गों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन के अनुसार:
करीब 38.2 प्रतिशत बुजुर्ग हल्की खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं
लगभग 5 प्रतिशत बुजुर्ग गंभीर स्थिति में हैं
यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल सीमित नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर मौजूद है।
भूख का कारण सिर्फ गरीबी नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक, बुजुर्गों में भूख का संकट केवल आर्थिक तंगी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं:
बीमारी और स्वास्थ्य समस्याएं
अकेलापन और सामाजिक दूरी
परिवार से सहयोग की कमी
शहरीकरण और बदलती जीवनशैली
इन सभी कारणों ने मिलकर बुजुर्गों की स्थिति को और जटिल बना दिया है।
राज्यों में स्थिति
अध्ययन में राज्यों के अनुसार भी गंभीर तस्वीर सामने आई है:
मध्य प्रदेश में 10.47% बुजुर्ग गंभीर खाद्य असुरक्षा में
झारखंड 8.17%
तमिलनाडु 7.93%
बिहार 7.88%
पश्चिम बंगाल 7.55%
उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 7.13%
ये सभी आंकड़े राष्ट्रीय औसत 5.14% से ज्यादा हैं, जो क्षेत्रीय असमानताओं को दर्शाते हैं।
उत्तर प्रदेश में भी चिंताजनक हालात
Uttar Pradesh में भी स्थिति अलग नहीं है। कई बुजुर्ग या तो
अकेले रह रहे हैं या परिवार के सहयोग से वंचित हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में खेती से दूरी और शहरी क्षेत्रों में अकेलापन,
दोनों ही भोजन की उपलब्धता को प्रभावित कर रहे हैं।
योजनाएं हैं, लेकिन पहुंच अधूरी
सरकार द्वारा वृद्धावस्था पेंशन और राशन जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन
कई बुजुर्गों तक इनका लाभ समय पर नहीं पहुंच पाता।
समस्याएं:
पहचान और पंजीकरण में दिक्कत
पोषण पर पर्याप्त ध्यान की कमी
स्थानीय स्तर पर निगरानी की कमी
विशेषज्ञों की राय
शोधकर्ताओं का कहना है कि हर पांच में से एक बुजुर्ग किसी न
किसी रूप में भोजन की असुरक्षा से जूझ रहा है।
वे सुझाव देते हैं कि स्थानीय स्तर पर मजबूत व्यवस्था, सामुदायिक सहयोग और पोषण योजनाओं को प्रभावी बनाना जरूरी है।
यह अध्ययन बताता है कि बुजुर्गों की भूख केवल भोजन की कमी नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक समस्या है।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है। समाज,
सरकार और परिवार—तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि बुजुर्गों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन मिले।
