अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता हुआ कच्चा तेल
दुनिया भर के बाजारों में पिछले कुछ समय से कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट देखने को मिल रही है। ब्रेंट क्रूड और WTI क्रूड दोनों के दाम पहले की तुलना में कम हुए हैं। आम जनता को उम्मीद थी कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता हो रहा है तो भारत में भी पेट्रोल और डीजल के दाम कम होंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई शहरों में पेट्रोल, डीजल और CNG के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इससे आम आदमी की जेब पर भारी असर पड़ रहा है।
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कैसे तय होती हैं?
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करती। इसमें कई तरह के टैक्स, ट्रांसपोर्ट खर्च और कंपनियों का मार्जिन शामिल होता है। तेल कंपनियां पहले विदेशों से कच्चा तेल खरीदती हैं। इसके बाद उसे रिफाइनरी में प्रोसेस किया जाता है। फिर केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगाती है और राज्य सरकारें वैट यानी VAT वसूलती हैं। इसके अलावा डीलर कमीशन और परिवहन खर्च भी जोड़ा जाता है।
यही वजह है कि अगर क्रूड ऑयल सस्ता भी हो जाए तो जरूरी नहीं कि पेट्रोल और डीजल भी तुरंत सस्ते हो जाएं।
सरकारी टैक्स सबसे बड़ी वजह
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में सबसे बड़ा हिस्सा टैक्स का होता है। केंद्र और राज्य सरकारें ईंधन पर भारी टैक्स वसूलती हैं। कई राज्यों में पेट्रोल पर 25 से 35 प्रतिशत तक VAT लगाया जाता है। केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी अलग होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ईंधन से मिलने वाले टैक्स का इस्तेमाल सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर और कई सरकारी योजनाओं में करती है। यही कारण है कि सरकारें आसानी से टैक्स कम नहीं करतीं।
रुपये की कमजोरी भी बढ़ा रही महंगाई
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। तेल की खरीद डॉलर में होती है। जब भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो भारत को ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल सस्ता हो, लेकिन अगर डॉलर महंगा है तो उसका फायदा आम लोगों तक नहीं पहुंच पाता।
रुपये की कमजोरी भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को ऊपर बनाए रखती है।
CNG के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
CNG की कीमतें भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी हैं। इसका सबसे बड़ा कारण प्राकृतिक गैस की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव है। भारत बड़ी मात्रा में गैस का आयात करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध और अंतरराष्ट्रीय संकटों की वजह से गैस सप्लाई प्रभावित हुई, जिससे कीमतें बढ़ीं।
इसके अलावा शहरों में गैस पाइपलाइन, ट्रांसपोर्ट और वितरण लागत भी बढ़ी है। इसी वजह से CNG वाहन चलाने वालों को राहत नहीं मिल रही।
तेल कंपनियों का घाटा और रिकवरी
सरकारी तेल कंपनियां कई बार लंबे समय तक कीमतें स्थिर रखती हैं। चुनाव या महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार कंपनियों पर दबाव बनाती है कि कीमतें ज्यादा न बढ़ाई जाएं। लेकिन जब कंपनियों का घाटा बढ़ता है तो बाद में धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाई जाती हैं ताकि नुकसान की भरपाई हो सके।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यही कारण है कि कई बार क्रूड सस्ता होने के बावजूद जनता को तुरंत राहत नहीं मिलती।
राज्यों के अलग-अलग टैक्स का असर
भारत में हर राज्य का VAT अलग होता है। इसलिए अलग-अलग शहरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी अलग होती हैं। महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे कई राज्यों में ईंधन पर अधिक टैक्स लगाया जाता है। वहीं कुछ राज्यों में टैक्स कम होने से कीमतें अपेक्षाकृत कम रहती हैं।
आम जनता पर क्या असर पड़ रहा है?
पेट्रोल, डीजल और CNG महंगे होने का असर सिर्फ वाहन चालकों पर नहीं पड़ता। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाने-पीने की चीजें, सब्जियां, दूध, फल और रोजमर्रा का सामान भी महंगा हो जाता है। ट्रक और मालवाहक गाड़ियों का खर्च बढ़ने से बाजार में महंगाई बढ़ जाती है।
मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। रोज ऑफिस जाने वाले लोग, ऑटो चालक, टैक्सी ड्राइवर और छोटे व्यापारी बढ़ती ईंधन कीमतों से परेशान हैं।
क्या आने वाले समय में सस्ते होंगे पेट्रोल-डीजल?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लगातार सस्ता बना रहता है और सरकार टैक्स में कटौती करती है तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन फिलहाल टैक्स, डॉलर की मजबूती और वैश्विक अस्थिरता के कारण जल्द बड़ी राहत की संभावना कम दिखाई दे रही है।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद भारत में पेट्रोल, डीजल और CNG महंगे बने हुए हैं। इसके पीछे सरकार का टैक्स ढांचा, रुपये की कमजोरी, ट्रांसपोर्ट लागत, तेल कंपनियों की रिकवरी और वैश्विक गैस बाजार की स्थिति मुख्य वजहें हैं। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें टैक्स कम नहीं करेंगी और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां स्थिर नहीं होंगी, तब तक आम जनता को ईंधन की कीमतों में बड़ी राहत मिलना मुश्किल दिखाई देता है।