भारतीय रुपये में हालिया कमजोरी ने निवेशकों और आम लोगों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एशिया के कई देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले मजबूत हो रही हैं, तब भारतीय रुपया क्यों पिछड़ रहा है? इसका एक प्रमुख कारण विदेशी निवेश का बदलता रुख है। जब विदेशी निवेशक किसी देश के शेयर बाजार और बॉन्ड बाजार में पैसा लगाते हैं तो उस देश की मुद्रा की मांग बढ़ती है। हाल के महीनों में भारत से कुछ विदेशी पूंजी बाहर निकली है, जबकि दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों में टेक्नोलॉजी सेक्टर की मजबूती के कारण विदेशी निवेश बढ़ा है। इससे वहां की मुद्राओं को समर्थन मिला और भारतीय रुपया दबाव में आ गया।
व्यापार घाटा बना रुपये की कमजोरी का बड़ा कारण
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन देश अभी भी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होने पर भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बनता है। दूसरी ओर, कई एशियाई देशों का निर्यात उनके आयात से अधिक है। उनके पास विदेशी मुद्रा का प्रवाह लगातार बढ़ता रहता है, जिससे उनकी मुद्रा मजबूत बनी रहती है। भारत का बढ़ता व्यापार घाटा रुपये की मजबूती के रास्ते में बड़ी चुनौती बन गया है।
डॉलर की ताकत का भारत पर ज्यादा असर क्यों?
जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत रहती है और अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखता है, तब वैश्विक निवेशकों का रुझान डॉलर की ओर बढ़ जाता है। ऐसे समय में निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी परिसंपत्तियों में निवेश करने लगते हैं। भारत जैसे देशों पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है क्योंकि यहां विदेशी निवेश का हिस्सा बड़ा है। परिणामस्वरूप डॉलर मजबूत होता है और भारतीय रुपया कमजोर पड़ जाता है।
एशियाई मुद्राओं ने क्यों दिखाया बेहतर प्रदर्शन?
हालिया अवधि में एशिया की कई मुद्राओं ने डॉलर के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। ताइवान डॉलर, दक्षिण कोरियाई वॉन, सिंगापुर डॉलर और थाई बहत जैसी मुद्राओं को मजबूत निर्यात, तकनीकी उद्योगों की बढ़ती मांग और विदेशी निवेश का लाभ मिला है। विशेष रूप से सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में वैश्विक मांग बढ़ने से इन देशों में डॉलर का प्रवाह बढ़ा, जिसने उनकी मुद्राओं को मजबूती प्रदान की। इसके विपरीत भारत की आयात निर्भरता ने रुपये को कमजोर बनाए रखा।
केंद्रीय बैंकों की नीतियां भी करती हैं बड़ा अंतर
मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। कई एशियाई देशों के केंद्रीय बैंकों ने अपनी मुद्रा को स्थिर रखने के लिए बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप किया है। भारत का केंद्रीय बैंक भी समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचकर रुपये को सहारा देता है। हालांकि वैश्विक परिस्थितियां और निवेशकों की धारणा इतनी प्रभावशाली होती हैं कि केवल हस्तक्षेप के दम पर मुद्रा को लंबे समय तक नियंत्रित रखना आसान नहीं होता।
क्या कमजोर रुपया हमेशा नुकसानदायक होता है?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि मुद्रा का सीमित स्तर तक कमजोर होना हमेशा नकारात्मक संकेत नहीं होता।
कमजोर रुपया भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है।
आईटी, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और अन्य निर्यात आधारित उद्योगों को इसका फायदा मिलता है।
लेकिन यदि रुपये में तेज और लगातार गिरावट आती है तो आयात महंगे हो जाते हैं,
महंगाई बढ़ सकती है और आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
आने वाले समय में रुपये की दिशा क्या होगी?
रुपये का भविष्य कई घरेलू और वैश्विक कारकों पर निर्भर करेगा।
यदि भारत में विदेशी निवेश दोबारा बढ़ता है, कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रण में रहती हैं और
आर्थिक विकास दर मजबूत बनी रहती है तो रुपये को स्थिरता मिल सकती है।
वहीं अमेरिका की ब्याज दरें, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और
भू-राजनीतिक घटनाएं भी रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।
भारतीय रुपया कमजोर होने का अर्थ यह नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था संकट में है।
मुद्रा की चाल कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारकों से प्रभावित होती है। एशिया के कुछ देशों की
मुद्राएं मजबूत इसलिए हैं क्योंकि उनकी आर्थिक संरचना, निर्यात क्षमता और
विदेशी निवेश की स्थिति भारत से अलग है। आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि,
निवेश आकर्षित करने की क्षमता और व्यापार संतुलन रुपये की मजबूती या कमजोरी का सबसे बड़ा आधार बनेंगे।
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