फिशरमैन वर्ल्ड न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट सरदारनगर। महान क्रांतिकारी अमर शहीद बाबू बंधु सिंह ने अंग्रेजों से गोरिल्ला युद्ध लड़कर धूल चटा दी थी। इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए जाल बिछाया था।
बंधु सिंह का जन्म चौरीचौरा तहसील के चिल्हूपार गांव में हुआ था। उनका जन्म 1833 ई. में हुआ। वे 25 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति में कूद पड़े। वे शिवप्रसाद सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध करते थे।
वे माता के मंदिर में रहते थे और अंग्रेजों के लिए बगावत करने वाले लोगों की बलि देवी को चढ़ाते थे।
देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले बाबू बंधु सिंह को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने बड़ी योजना बनाई। अंग्रेजों ने अपने सैनिक भेजे, लेकिन वे हर बार असफल रहे।
आखिरकार, एक दिन अंग्रेजों ने धोखे से उन्हें पकड़ लिया।
चौरीचौरा तहसील क्षेत्र के विकासखंड सरदारनगर अंतर्गत स्थित चिल्हूपार निवासी अमर शहीद बाबू बंधु सिंह के पूर्वज 1857 के अमर शहीद बाबू बंधु सिंह पर गर्व करते हैं।
वे माता के भक्त थे और अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए उन्होंने अपनी जान न्योछावर कर दी।
देश के पहले गोरिल्ला युद्ध के धुरंधर योद्धा रहे बाबू बंधु सिंह ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। वे हर बार अंग्रेजों के चंगुल से बच निकलते थे, जिससे अंग्रेजी हुकूमत में उनके नाम का खौफ था।
फांसी देने के बाद सात बार फंदा टूट गया
बार-बार फांसी का फंदा टूट जाने से अंग्रेजों में खौफ था।
आखिरकार अंग्रेजों ने आरा मशीन का सहारा लिया और फांसी के फंदे को मजबूत कर उन्हें फांसी दी गई।
अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ उन्होंने अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया।
बंधु सिंह की वीरता आज भी लोगों में प्रेरणा जगाती है। उनका नाम सुनते ही अंग्रेज कांप उठते थ
