सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ का फैसला चर्चा में
सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन सत्र के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की एक टिप्पणी ने कानूनी जगत में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनकी बेंच के समक्ष आंशिक कार्य दिवसों और अवकाशकालीन अवधि में वरिष्ठ अधिवक्ताओं को मौखिक मेंशनिंग या पेशी की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य युवा वकीलों को अधिक अवसर प्रदान करना है।
युवा अधिवक्ताओं को मिलेगा मंच
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि अदालत में युवा वकीलों और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड को अपनी कानूनी क्षमता दिखाने का अवसर मिलना चाहिए। उनके अनुसार अवकाशकालीन बेंच ऐसे अधिवक्ताओं के लिए सीखने और अनुभव प्राप्त करने का महत्वपूर्ण मंच हो सकती है।
वरिष्ठ वकीलों की आपत्ति भी आई सामने
कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष यह तर्क रखा कि कई मामलों में वे पहले से पक्षकारों की ओर से नियुक्त हैं और अचानक इस प्रकार की रोक से व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं। हालांकि न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने स्पष्ट किया कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं है और वह पिछले कई वर्षों से अवकाशकालीन अवधि में इसी नियम का पालन कर रहे हैं।
अदालत ने नहीं बदला अपना रुख
कार्यवाही के दौरान कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि पहले से लंबित मामलों में उन्हें पेश होने की अनुमति दी जाए, लेकिन न्यायमूर्ति नाथ अपने निर्णय पर कायम रहे। उन्होंने कहा कि युवा वकीलों को आगे आने का अवसर देना ही इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य है।
कानूनी समुदाय में शुरू हुई बहस
इस फैसले के बाद कानूनी समुदाय में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे युवा अधिवक्ताओं के लिए सकारात्मक कदम बता रहे हैं, जबकि कुछ वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि सभी बेंचों में एक समान व्यवस्था होनी चाहिए ताकि भ्रम की स्थिति न बने।
आंशिक कार्य दिवसों में चल रही है सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में 1 जून से 12 जुलाई 2026 तक आंशिक कार्य दिवस लागू हैं।
इस दौरान विशेष बेंचों का गठन किया गया है जो जरूरी मामलों की सुनवाई कर रही हैं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ भी इसी अवधि में गठित विशेष बेंच का हिस्सा हैं।
न्यायिक सुधार की दिशा में माना जा रहा कदम
कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में नई प्रतिभाओं को
अवसर देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे युवा अधिवक्ताओं को सीधे अदालत में बहस करने और
न्यायिक प्रक्रिया को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।
पहले भी हो चुके हैं ऐसे बदलाव
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ताओं की मौखिक मेंशनिंग को लेकर पहले भी
प्रशासनिक स्तर पर बदलाव किए जा चुके हैं। अदालत पहले भी तत्काल सूचीकरण और
मेंशनिंग प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए नियम लागू कर चुकी है।
न्यायपालिका में नई सोच का संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न्यायपालिका में नई सोच और
युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का संकेत देता है। इससे आने वाले वर्षों में युवा अधिवक्ताओं की भूमिका और
प्रभाव बढ़ सकता है, जो न्यायिक व्यवस्था के लिए सकारात्मक माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ द्वारा अवकाशकालीन बेंच में वरिष्ठ अधिवक्ताओं की मौखिक
मेंशनिंग और पेशी पर रोक लगाने का निर्णय कानूनी जगत में
चर्चा का विषय बन गया है। अदालत का मानना है कि
इससे युवा वकीलों को आगे बढ़ने और अपनी क्षमता
साबित करने का अवसर मिलेगा। आने वाले समय में इस व्यवस्था का
प्रभाव न्यायिक कार्यप्रणाली और वकालत के पेशे पर महत्वपूर्ण रूप से देखने को मिल सकता है।
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