मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला विवाद
मध्य प्रदेश का धार क्यों बना चर्चा का केंद्र?
धार स्थित भोजशाला एक बार फिर चर्चा में है। हर साल जब बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ते हैं, तब यहां विवाद की स्थिति बन जाती है। हिंदू पक्ष भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर मानता है और बसंत पंचमी पर पूजा-अर्चना करता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानते हुए जुमे की नमाज अदा करता है। यही कारण है कि यह स्थान लंबे समय से धार्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है।
क्या है भोजशाला का इतिहास?
भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार परमार वंश के राजा राजा भोज ने धार को अपनी राजधानी बनाया था। कहा जाता है कि इसी दौरान यहां देवी सरस्वती को समर्पित एक भव्य मंदिर और शिक्षा केंद्र की स्थापना हुई थी। इसी स्थान को बाद में भोजशाला कहा जाने लगा।
कई ऐतिहासिक दावों के अनुसार 12वीं-13वीं शताब्दी के दौरान इस मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया गया और उसी स्थान पर मकबरा तथा मस्जिदनुमा ढांचे का निर्माण हुआ। हिंदू संगठनों का दावा है कि वर्तमान ढांचे में मंदिर के अवशेष आज भी दिखाई देते हैं।
दस्तावेजों और रिसर्च में क्या उल्लेख मिलता है?
रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के रिसर्च पेपर “धार, भोज और सरस्वती” में बताया गया है कि “भोजशाला” शब्द का इस्तेमाल पहली बार जर्मन भारतविद् एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने किया था। फ्यूहरर 1893 में भारत आए थे और भारतीय पुरातत्व विभाग से जुड़े थे।
बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा विभाग के अधिकारी केके लेले ने भी इस स्थल का अध्ययन करवाया। रिसर्च में यह दावा सामने आया कि वर्तमान ढांचे का निर्माण ध्वस्त मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके किया गया था। यहां कई संस्कृत शिलालेख और मूर्तिकला के अवशेष भी पाए गए थे।
हिंदू और मुस्लिम पक्ष में विवाद कैसे शुरू हुआ?
समय के साथ भोजशाला धार्मिक विवाद का केंद्र बन गई। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। दोनों समुदाय इस स्थान पर अपने धार्मिक अधिकार का दावा करते रहे हैं।
विवाद सबसे ज्यादा तब बढ़ता है जब बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़ती है। ऐसे समय में पूजा और नमाज को लेकर प्रशासन के सामने कानून व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाती है।
एएसआई का क्या कहना है?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई ने भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया हुआ है।
एएसआई के दस्तावेजों में यह स्थल ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व का बताया गया है।
वर्तमान में एएसआई की देखरेख में यहां पूजा और नमाज को लेकर तय व्यवस्था लागू की जाती है।
प्रशासन विशेष परिस्थितियों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा देता है ताकि किसी तरह का तनाव न फैले।
कोर्ट में क्या-क्या हुआ?
भोजशाला विवाद कई बार अदालत तक पहुंच चुका है। हिंदू संगठनों ने
इसे पूर्ण रूप से मंदिर घोषित करने की मांग की है,
जबकि मुस्लिम पक्ष ने नमाज के अधिकार को बनाए रखने की बात कही है।
विभिन्न अदालतों में इस मामले को लेकर कई याचिकाएं दायर हुईं। समय-समय पर अदालतों ने
प्रशासन को शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।
हाल के वर्षों में सर्वे और पुरातात्विक जांच की मांग भी तेज हुई है।
राजनीति में कैसे बना बड़ा मुद्दा?
भोजशाला विवाद धीरे-धीरे राजनीतिक मुद्दा भी बन गया। मध्य प्रदेश में चुनाव के दौरान
कई राजनीतिक दल इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। हिंदू संगठन इसे सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जोड़ते हैं,
जबकि विपक्षी दल इसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दा बताते हैं।
बसंत पंचमी के दौरान नेताओं के बयान और धार्मिक कार्यक्रम
अक्सर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। यही वजह है कि
भोजशाला सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी अहम मुद्दा बन चुकी है।
वर्तमान स्थिति क्या है?
फिलहाल भोजशाला में प्रशासन द्वारा तय नियमों के अनुसार पूजा और
नमाज की व्यवस्था लागू रहती है। सुरक्षा बलों की तैनाती भी की जाती है ताकि
किसी प्रकार का तनाव न हो। हर साल बसंत पंचमी के समय यहां विशेष निगरानी रखी जाती है।
भोजशाला का विवाद केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है,
बल्कि यह इतिहास, पुरातत्व, आस्था और राजनीति से जुड़ा बड़ा
विषय बन चुका है। मंदिर और मस्जिद को लेकर दोनों पक्षों के दावे दशकों से जारी हैं।
आने वाले समय में अदालत और प्रशासन के फैसले इस विवाद की दिशा तय करेंगे।
