US-Iran Peace Deal: ट्रंप के 14 सूत्रीय समझौते से मचा बवाल, MAGA समर्थकों और रिपब्लिकन नेताओं में नाराजगी

अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता

अमेरिका और ईरान ने लंबे तनाव और संघर्ष के बाद एक 14 सूत्रीय प्रारंभिक शांति समझौते (MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव को समाप्त करना, परमाणु मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाना और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सामान्य बनाना है। समझौते पर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और ईरानी राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने हस्ताक्षर किए हैं।

14 पॉइंट समझौते में क्या है खास?

समझौते के तहत 60 दिनों की वार्ता अवधि तय की गई है, जिसमें दोनों देश स्थायी समझौते की दिशा में बातचीत करेंगे। इसके अलावा होरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से पूरी तरह खोलने, कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी को मजबूत करने जैसे कदम शामिल हैं। ईरान ने परमाणु हथियार विकसित नहीं करने की प्रतिबद्धता दोहराई है और IAEA की निगरानी स्वीकार करने पर सहमति जताई है।

होरमुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा मुद्दा

दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा होरमुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। युद्ध और तनाव के दौरान इस मार्ग के प्रभावित होने से वैश्विक तेल कीमतों में उछाल देखा गया था। नए समझौते में इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित और खुला रखने पर विशेष जोर दिया गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों को राहत मिलने की उम्मीद है।

परमाणु कार्यक्रम पर आगे होगी बड़ी बातचीत

हालांकि समझौते में परमाणु मुद्दे का अंतिम समाधान नहीं हुआ है, लेकिन यह तय किया गया है कि अगले 60 दिनों में विस्तृत बातचीत होगी। ईरान अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में प्रबंधित करने पर चर्चा करेगा। यही मुद्दा आगे की वार्ता का सबसे संवेदनशील विषय माना जा रहा है।

ट्रंप के समर्थकों में क्यों बढ़ी नाराजगी?

समझौते के बाद अमेरिका में राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। कई रिपब्लिकन नेताओं और MAGA समर्थकों का मानना है कि यह समझौता ईरान को जरूरत से ज्यादा रियायतें देता है। कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि इससे ईरान को आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिलेगा जबकि अमेरिका को अपेक्षित सुरक्षा गारंटी नहीं मिली है।

रिपब्लिकन नेताओं ने उठाए सवाल

कई प्रमुख रिपब्लिकन नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इस समझौते की आलोचना की है। आलोचकों का कहना है कि प्रतिबंधों में ढील और आर्थिक सहायता

जैसी व्यवस्थाएं ईरान को मजबूत कर सकती हैं। वहीं ट्रंप समर्थक खेमे का

एक हिस्सा इसे उनकी पुरानी “कठोर ईरान नीति” से अलग कदम मान रहा है।

इजरायल और मध्य पूर्व की राजनीति पर असर

यह समझौता केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव इजरायल,

खाड़ी देशों और पूरे मध्य पूर्व की राजनीति पर पड़ सकता है।

कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि समझौता सफल रहा तो क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है,

लेकिन यदि वार्ता विफल हुई तो हालात फिर से बिगड़ सकते हैं।

वैश्विक अर्थव्यवस्था को मिल सकती है राहत

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि होरमुज जलडमरूमध्य के सामान्य रूप से

खुलने और तेल निर्यात बहाल होने से वैश्विक तेल बाजार स्थिर हो सकता है।

इससे कई देशों को राहत मिलेगी जो हाल के महीनों में बढ़ती ऊर्जा कीमतों से प्रभावित रहे हैं।

आगे क्या होगा?

फिलहाल यह एक प्रारंभिक समझौता है। अगले 60 दिनों में होने वाली वार्ताएं तय

करेंगी कि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति समझौता

संभव हो पाएगा या नहीं। दुनिया भर की नजरें अब इन वार्ताओं पर टिकी हुई हैं

क्योंकि इनका असर केवल मध्य पूर्व ही नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

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