भारत ने हेग कोर्ट के फैसले को ठुकराया, सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान को बड़ा झटका

सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त रुख

भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद में बड़ा और स्पष्ट रुख अपनाते हुए हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय के हालिया फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है। केंद्र सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि यह तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय अवैध रूप से गठित किया गया था और इसके सभी फैसले भारत के लिए मान्य नहीं हैं।

भारत ने यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका निर्णय अभी भी प्रभावी है और इसमें किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया गया है। सरकार के इस बयान के बाद एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला जम्मू-कश्मीर में भारत द्वारा विकसित की जा रही किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान का आरोप है कि भारत इन परियोजनाओं के जरिए सिंधु जल संधि का उल्लंघन कर रहा है।

इसी मुद्दे को लेकर पाकिस्तान ने हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन यानी PCA का दरवाजा खटखटाया था। हाल ही में मध्यस्थता न्यायालय ने अधिकतम जल ग्रहण क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर फैसला सुनाया, जिसे पाकिस्तान ने अपने पक्ष में बताया।

हालांकि भारत ने शुरुआत से ही इस प्रक्रिया का विरोध किया और कहा कि यह अदालत संधि के प्रावधानों के अनुसार वैध नहीं है।

विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल ने प्रेस वार्ता में कहा कि तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय ने 15 मई को एक पूरक फैसला जारी किया है, लेकिन भारत इसे पूरी तरह अस्वीकार करता है।

उन्होंने कहा कि यह अदालत अवैध रूप से गठित की गई थी और इसके पहले के सभी फैसलों की तरह यह निर्णय भी अमान्य है। भारत ने कभी भी इस अदालत की वैधता को स्वीकार नहीं किया और न ही इसकी प्रक्रिया में हिस्सा लिया।

भारत का मानना है कि सिंधु जल संधि के तहत विवाद समाधान के लिए अलग तंत्र मौजूद है और पाकिस्तान ने गलत तरीके से अंतरराष्ट्रीय अदालत का सहारा लिया।

क्या है सिंधु जल संधि?

सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में हुआ एक महत्वपूर्ण समझौता है। इसमें विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।

इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों का जल दोनों देशों के बीच बांटा गया था। रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का नियंत्रण भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का अधिकांश उपयोग पाकिस्तान को दिया गया।

हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित स्तर पर जलविद्युत परियोजनाएं विकसित करने का अधिकार प्राप्त है।

क्यों बढ़ा विवाद?

बीते कुछ वर्षों में भारत ने जम्मू-कश्मीर में कई जलविद्युत परियोजनाओं पर काम तेज किया है। पाकिस्तान लगातार इन परियोजनाओं पर आपत्ति जताता रहा है।

भारत का कहना है कि उसकी सभी परियोजनाएं सिंधु जल संधि के नियमों के अनुरूप हैं।

वहीं पाकिस्तान का दावा है कि इन परियोजनाओं से उसके जल प्रवाह पर असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान जल संकट और कृषि निर्भरता के कारण

इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाता रहा है।

*भारत ने PCA को अवैध क्यों बताया?

भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि के तहत विवाद समाधान की एक निश्चित प्रक्रिया तय की गई है।

पहले दोनों देशों के आयुक्त बातचीत करते हैं। यदि समाधान नहीं निकलता तो तटस्थ विशेषज्ञ नियुक्त किया जा सकता है।

#भारत का आरोप है कि पाकिस्तान ने समानांतर रूप से मध्यस्थता न्यायालय का

गठन करवाकर संधि की मूल भावना का उल्लंघन किया।

$भारत पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि एक ही समय पर तटस्थ विशेषज्ञ और

मध्यस्थता न्यायालय की प्रक्रिया नहीं चल सकती। इसी आधार पर भारत PCA की वैधता को नहीं मानता।

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया

#पाकिस्तान ने दावा किया है कि हेग स्थित अदालत ने उसके पक्ष को सही माना है।

पाकिस्तान के अधिकारियों का कहना है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय

नियमों का पालन करना चाहिए और सिंधु जल संधि का सम्मान करना चाहिए।

पाकिस्तानी मीडिया इस फैसले को बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है।

हालांकि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी बाहरी दबाव में आने वाला नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है।

सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान की कृषि और पेयजल जरूरतों की रीढ़ मानी जाती है।

ऐसे में इस विवाद का असर दोनों देशों के रिश्तों और क्षेत्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है।

हालांकि भारत का कहना है कि वह अपने वैधानिक अधिकारों के भीतर रहकर ही परियोजनाओं को आगे बढ़ा रहा है।

सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय के फैसले को भारत द्वारा खारिज किए जाने से यह साफ हो गया है कि

नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभु अधिकारों पर किसी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं है।

दूसरी ओर पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

आने वाले समय में यह विवाद दक्षिण एशिया की राजनीति और कूटनीति में अहम भूमिका निभा सकता है।