हिमंत बिस्व सरमा
कांग्रेस से BJP तक: कैसे हिमंत बिस्व सरमा बने असम के सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री
असम में लगातार तीसरी बार BJP की वापसी
असम की राजनीति में एक बार फिर हिमंत बिस्व सरमा सबसे मजबूत चेहरे के रूप में उभरे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने लगातार तीसरी बार असम में सत्ता में वापसी की है और इसके पीछे हिमंत बिस्व सरमा की रणनीति, संगठन क्षमता और राजनीतिक अनुभव को सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है।
हालांकि हिमंत का राजनीतिक सफर सीधे भाजपा से शुरू नहीं हुआ था। छात्र राजनीति से निकलकर उन्होंने कांग्रेस में दो मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में राजनीति की बारीकियां सीखीं, लेकिन मुख्यमंत्री बनने का सपना भाजपा में शामिल होने के बाद ही पूरा हुआ।
कौन हैं हिमंत बिस्व सरमा?
हिमंत बिस्व सरमा का जन्म 1 फरवरी 1969 को असम के जोरहाट में हुआ था। बाद में उनका परिवार गुवाहाटी के उलुबारी और गांधीबस्ती इलाके में बस गया। उनका परिवार मूल रूप से नलबाड़ी जिले के लतीमा गांव से जुड़ा हुआ है।
राजनीति में सक्रिय होने से पहले उनका जीवन शिक्षा, छात्र नेतृत्व और वकालत से जुड़ा रहा। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई गुवाहाटी के कामरूप अकादमी स्कूल से पूरी की।
इसके बाद उन्होंने प्रतिष्ठित कॉटन यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया, जहां से राजनीति विज्ञान में स्नातक और परास्नातक की डिग्री हासिल की। बाद में उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई भी की और 2006 में गुवाहाटी विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की।
छात्र राजनीति से चमके हिमंत
हिमंत बिस्व सरमा ने राजनीति की शुरुआत छात्र आंदोलन से की। वे प्रभावशाली छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े और जल्द ही छात्र राजनीति का बड़ा चेहरा बन गए।
1987 में वे कॉटन कॉलेज छात्र संघ के सहायक महासचिव चुने गए। इसके बाद लगातार तीन बार छात्र संघ के महासचिव बने। उनकी भाषण शैली और रणनीतिक सोच ने उन्हें छात्र राजनीति में अलग पहचान दिलाई।
बताया जाता है कि एक बार उन्होंने छात्रों के प्रतिनिधिमंडल के साथ दिल्ली जाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मुलाकात की थी और फुटबॉल स्टेडियम के लिए फंड भी मंजूर करवाया था।
कांग्रेस में कैसे मिली पहचान?
1991 के आसपास ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से मतभेद के बाद हिमंत मुख्यधारा की राजनीति में आ गए। उस समय असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया युवाओं और छात्रों के बीच कांग्रेस की पकड़ मजबूत करना चाहते थे।
इसी दौरान हिमंत बिस्व सरमा कांग्रेस से जुड़े और राज्यभर के छात्र संगठनों में पार्टी की पकड़ मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। धीरे-धीरे वे कांग्रेस के बड़े युवा नेताओं में शामिल हो गए।
1996 में उन्होंने पहली बार कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
लेकिन 2001 में उन्होंने जालुकबारी सीट से जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बनने में सफलता हासिल की।
इसके बाद 2006 और 2011 में भी उन्होंने लगातार जीत दर्ज की और
असम की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बना ली।
तरुण गोगोई सरकार में बने ताकतवर मंत्री
तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में हिमंत बिस्व सरमा बेहद प्रभावशाली
मंत्री बनकर उभरे। उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्त जैसे कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले।
सरकार में उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई और उन्हें कांग्रेस का भविष्य का
बड़ा चेहरा माना जाने लगा। लेकिन समय के साथ पार्टी नेतृत्व से उनके मतभेद बढ़ने लगे।
BJP में शामिल होने के बाद बदली किस्मत
2015 में हिमंत बिस्व सरमा ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।
इसके बाद असम की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
2016 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पहली बार असम में सरकार बनाई और हिमंत बिस्व सरमा ने
इसमें अहम भूमिका निभाई। उन्हें पूर्वोत्तर में भाजपा का सबसे बड़ा रणनीतिकार माना जाने लगा।
आखिरकार 2021 में भाजपा नेतृत्व ने उन्हें असम का मुख्यमंत्री बनाया।
इसके बाद उन्होंने लगातार संगठन और सरकार दोनों स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की।
पूर्वोत्तर में BJP का बड़ा चेहरा बने हिमंत
आज हिमंत बिस्व सरमा सिर्फ असम ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत में
भाजपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। चुनावी रणनीति, संगठन क्षमता और
आक्रामक राजनीतिक शैली ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में भी मजबूत पहचान दिलाई है।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ हिमंत बिस्व सरमा का सफर आज उन्हें असम की
राजनीति के सबसे शक्तिशाली नेताओं में शामिल कर चुका है। कांग्रेस में उन्होंने राजनीति सीखी,
लेकिन भाजपा में उन्हें वह मंच मिला जहां वे मुख्यमंत्री बनकर उभरे।
लगातार तीसरी बार भाजपा की सत्ता वापसी ने यह साफ कर दिया है कि असम की राजनीति में
हिमंत बिस्व सरमा का प्रभाव अभी और मजबूत होने वाला है।
