गोरखपुर: लकवा के लक्षण दिखते ही मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाएं, 4.5 घंटे का ‘गोल्डन ऑवर’ सबसे अहम – डॉ. ए.एन. ठाकुर

राकेश शर्मा की रिपोर्ट

गोरखपुर: बदलती जीवनशैली बना रही है स्ट्रोक का खतरा

गोरखपुर। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) गोला के अधीक्षक डॉ. अमरेन्द्र नाथ (ए.एन.) ठाकुर ने कहा कि बदलती जीवनशैली, असंतुलित खान-पान, मानसिक तनाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण मधुमेह (डायबिटीज) और उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यही बीमारियां आगे चलकर स्ट्रोक (लकवा) जैसी गंभीर स्थिति का कारण बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते स्ट्रोक के लक्षणों की पहचान कर मरीज को अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो उसकी जान बचाने के साथ-साथ स्थायी दिव्यांगता से भी बचाया जा सकता है।

हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज हैं प्रमुख कारण

डॉ. ठाकुर ने बताया कि लंबे समय तक अनियंत्रित रक्तचाप और ब्लड शुगर रहने से मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार रक्त वाहिकाओं में थक्का बनने या रक्तस्राव होने से मस्तिष्क तक रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है, जिससे स्ट्रोक की स्थिति उत्पन्न होती है। उन्होंने लोगों से नियमित रूप से ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की जांच कराने तथा चिकित्सक द्वारा बताई गई दवाओं का नियमित सेवन करने की सलाह दी।

इन लक्षणों को भूलकर भी नजरअंदाज न करें

उन्होंने बताया कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर के एक हिस्से में अचानक कमजोरी आ जाए, हाथ या पैर सुन्न हो जाए, चेहरा एक तरफ झुक जाए, बोलने में परेशानी होने लगे, शब्द स्पष्ट न निकलें, अचानक चक्कर आए या संतुलन बिगड़ जाए, तो इसे सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये सभी स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं और ऐसे में तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना बेहद जरूरी है।

4.5 घंटे का ‘गोल्डन ऑवर’ सबसे अहम

डॉ. ए.एन. ठाकुर ने बताया कि स्ट्रोक के इलाज में शुरुआती 4.5 घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, जिसे चिकित्सा विज्ञान में ‘गोल्डन ऑवर’ कहा जाता है। यदि इस अवधि के भीतर मरीज को विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा मिल जाती है, तो पात्र मरीजों को टेनेक्टोप्लेस (Tenecteplase) इंजेक्शन देकर मस्तिष्क की रक्त वाहिका में बने थक्के को घोलने का प्रयास किया जाता है। इससे मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना काफी बढ़ जाती है और स्थायी लकवा या गंभीर विकलांगता से बचाव संभव हो सकता है।

बीआरडी मेडिकल कॉलेज ट्रॉमा सेंटर पहुंचाने की अपील

उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि यदि किसी व्यक्ति में स्ट्रोक के लक्षण दिखाई दें तो समय बिल्कुल न गंवाएं और मरीज को तत्काल बाबा राघव दास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर के ट्रॉमा सेंटर या नजदीकी विशेषज्ञ अस्पताल में पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि जितनी जल्दी इलाज शुरू होगा, मरीज के स्वस्थ होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

झाड़-फूंक और घरेलू उपचार से बचें

डॉ. ठाकुर ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई लोग लकवा के शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से नहीं लेते और झाड़-फूंक या घरेलू उपचार में बहुमूल्य समय गंवा देते हैं। यह लापरवाही मरीज की जान के लिए खतरा बन सकती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की देरी न करें और तुरंत चिकित्सकीय सहायता प्राप्त करें।

स्वस्थ जीवनशैली ही सबसे बड़ा बचाव

उन्होंने कहा कि नियमित व्यायाम, संतुलित एवं पौष्टिक आहार, धूम्रपान और शराब से दूरी,

तनाव पर नियंत्रण, वजन संतुलित रखना तथा समय-समय पर

स्वास्थ्य जांच कराना स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव के प्रभावी उपाय हैं।

जागरूकता, समय पर पहचान और शीघ्र उपचार से न केवल मरीज की जान बचाई जा सकती है,

बल्कि उसे स्थायी विकलांगता से भी सुरक्षित रखा जा सकता है।

निष्कर्ष

डॉ. ए.एन. ठाकुर ने कहा कि स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें हर

मिनट बेहद कीमती होता है। यदि मरीज को शुरुआती 4.5 घंटे के भीतर उचित इलाज मिल जाए, तो

उसके सामान्य जीवन में लौटने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

इसलिए स्ट्रोक के किसी भी लक्षण को हल्के में न लें और बिना देरी किए अस्पताल पहुंचें।

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