आज़ादी के 75 साल बाद भी सड़क नहीं! पहाड़ पार कर गर्भवती महिलाओं को ले जाते हैं ग्रामीण

एक तरफ देश में एक्सप्रेसवे, ग्रीन कॉरिडोर और फोरलेन हाईवे का जाल तेजी से फैल रहा है, तो दूसरी तरफ आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां सड़क का नामोनिशान तक नहीं है। यह कहानी ऐसे ही एक गांव की है जहां लोग आजादी के 75 साल बाद भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को ऊंचे पहाड़ और खतरनाक पगडंडियों से होकर गुजरना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन और नेताओं से सड़क बनाने की मांग की, लेकिन आज तक उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच यह गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से दूर है।

स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए हर दिन चुनौती

गांव के बच्चों के लिए स्कूल जाना किसी परीक्षा से कम नहीं है। छोटे-छोटे बच्चे रोज पहाड़ी रास्तों से कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं। बरसात के दिनों में हालात और ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं।

फिसलन भरे रास्तों पर कई बार बच्चे गिरकर घायल हो चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नहीं होने की वजह से कई बच्चों ने पढ़ाई तक छोड़ दी। माता-पिता हर दिन डर के माहौल में अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं। शिक्षा तक पहुंचने का यह संघर्ष गांव की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन चुका है।

बीमार पड़ने पर जिंदगी और मौत की जंग

गांव में अगर कोई व्यक्ति बीमार हो जाए तो हालात बेहद गंभीर हो जाते हैं। मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ग्रामीण चारपाई या बांस का सहारा लेते हैं और पहाड़ पार कर कई किलोमीटर पैदल चलते हैं।

कई बार समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण लोगों की जान तक चली गई। गर्भवती महिलाओं के लिए यह रास्ता सबसे ज्यादा खतरनाक साबित होता है। सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों को अस्पताल पहुंचाते हैं।

चुनावी वादों में ही रह गई सड़क

ग्रामीणों का आरोप है कि हर चुनाव में नेता सड़क बनाने का वादा करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही सब कुछ भूल जाते हैं। गांव में कई बार अधिकारियों ने सर्वे किया, निरीक्षण भी हुआ, लेकिन सड़क निर्माण का काम शुरू नहीं हो पाया।

लोगों का कहना है कि सड़क नहीं होने की वजह से गांव पूरी तरह विकास से कट गया है।

कई सरकारी योजनाओं का लाभ भी यहां के लोगों तक सही तरीके से नहीं पहुंच पाता।

पहाड़ चढ़कर राशन और गैस सिलेंडर लाते हैं लोग

ग्रामीणों की मुश्किलें सिर्फ शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं।

रोजमर्रा का सामान खरीदने के लिए भी लोगों को घंटों पैदल चलना पड़ता है।

राशन, गैस सिलेंडर और खेती का सामान तक लोग अपनी पीठ पर लादकर पहाड़ के

रास्ते गांव तक पहुंचाते हैं। बरसात के मौसम में यह सफर और ज्यादा खतरनाक हो जाता है।

कई बार ग्रामीण रास्ते में फिसलकर घायल भी हो चुके हैं।

प्रशासन ने दिया आश्वासन

स्थानीय प्रशासन का कहना है कि इलाके का भौगोलिक ढांचा काफी कठिन है,

जिसकी वजह से सड़क निर्माण में दिक्कतें आ रही हैं। अधिकारियों ने दावा किया है कि

जल्द ही योजना बनाकर सड़क निर्माण शुरू कराया जाएगा।

हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से यही आश्वासन सुनते आ रहे हैं।

अब गांव के लोग सिर्फ वादे नहीं बल्कि जमीन पर काम देखना चाहते हैं।

गांव वालों की सबसे बड़ी मांग

$गांव के लोगों की मांग बहुत छोटी लेकिन बेहद जरूरी है। ग्रामीण चाहते हैं कि

गांव तक कम से कम एक कच्ची सड़क बना दी जाए ताकि बच्चों की पढ़ाई,

मरीजों का इलाज और रोजमर्रा की जिंदगी थोड़ी आसान हो सके।

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें हाईवे या बड़ी सड़क नहीं चाहिए, बस एक ऐसा रास्ता चाहिए

जिससे वे इंसान की तरह सम्मान के साथ जिंदगी जी सकें।