मानसून पर मंडराया संकट, कम बारिश का अलर्ट
उत्तर प्रदेश में इस बार मानसून को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत महासागर में सक्रिय हो रही अल नीनो (El Niño) परिस्थितियों का असर भारतीय मानसून पर पड़ सकता है। यदि यह प्रभाव मजबूत रहा तो प्रदेश में सामान्य से कम बारिश हो सकती है और कई जिलों में 2015 जैसी आंशिक सूखे की स्थिति बनने की आशंका है।
राज्य के कृषि विशेषज्ञ और मौसम वैज्ञानिक लगातार मानसून की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। कम बारिश का सीधा असर खेती, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ जाती है चिंता?
अल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। इसका प्रभाव दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। भारत में अल नीनो को अक्सर कमजोर मानसून और कम वर्षा से जोड़कर देखा जाता है। मौसम विभाग के अनुसार 2026 के मानसून सीजन में मध्यम से मजबूत अल नीनो की स्थिति बनने की संभावना है।
2015 जैसे हालात का डर क्यों?
विशेषज्ञ 2015 का उदाहरण दे रहे हैं, जब मजबूत अल नीनो के कारण देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हुई थी और कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ था। हालिया रिपोर्टों में भी यह संकेत दिया गया है कि 2015 आखिरी बड़ा वर्ष था जब अल नीनो के प्रभाव से खाद्यान्न उत्पादन पर गंभीर असर देखने को मिला था।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अब सिंचाई सुविधाएं, जल संरक्षण और कृषि तकनीक पहले की तुलना में बेहतर हैं, जिससे संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है।
किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती
यदि मानसून कमजोर रहता है तो धान, मक्का, अरहर, उड़द और अन्य खरीफ फसलों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और समय पर बारिश नहीं होने से बुवाई प्रभावित हो सकती है। इससे उत्पादन घटने और किसानों की आय पर असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
जल संकट और बिजली की मांग बढ़ सकती है
कम बारिश का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा। जलाशयों का जलस्तर घट सकता है,
भूजल रिचार्ज प्रभावित हो सकता है और कई क्षेत्रों में पेयजल संकट भी गहरा सकता है।
इसके साथ ही भीषण गर्मी के कारण एयर कंडीशनर, कूलर और
सिंचाई उपकरणों के उपयोग से बिजली की मांग में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
सरकार ने शुरू की तैयारी
संभावित कम वर्षा को देखते हुए विभिन्न राज्यों और कृषि विभागों ने
वैकल्पिक फसल योजना, जल संरक्षण और सूखा प्रबंधन रणनीतियों पर काम शुरू कर दिया है।
देशभर के सैकड़ों जिलों के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार की जा रही हैं
ताकि कमजोर मानसून की स्थिति में किसानों को राहत दी जा सके।
क्या घबराने की जरूरत है?
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो चिंता का विषय जरूर है, लेकिन घबराने की आवश्यकता नहीं है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कमजोर वर्षा के बावजूद बेहतर कृषि प्रबंधन और
सिंचाई सुविधाओं की मदद से खाद्यान्न उत्पादन को काफी हद तक स्थिर बनाए रखा है।
किसानों को मौसम विभाग के अपडेट पर नजर रखने, जल संरक्षण अपनाने और
स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार फसल चयन करने की सलाह दी जा रही है।
उत्तर प्रदेश में अल नीनो के प्रभाव से कम बारिश और आंशिक सूखे की
आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहा तो
इसका असर खेती, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
फिलहाल मौसम विभाग, कृषि वैज्ञानिक और सरकार सभी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि इस वर्ष मानसून प्रदेश के लिए राहत लेकर आएगा या नई चुनौती।
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