श्रीमद्भागवत कथा में धुंधकारी प्रकरण सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु, गूंजे राधे-राधे के जयकारे

राकेश शर्मा की रिपोर्ट

दीपगढ़ में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

गोरखपुर जनपद की गोला तहसील क्षेत्र के ग्राम दीपगढ़ में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। श्रीधाम वृंदावन से पधारीं कथा व्यास श्रीमती अनुराधा तिवारी ने धुंधकारी और गोकर्ण का मार्मिक प्रसंग सुनाया। कथा के दौरान श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए और पूरा पंडाल भक्ति रस में डूब गया। कथा स्थल पर लगातार ‘राधे-राधे’ और ‘जय श्री कृष्ण’ के जयकारे गूंजते रहे।

आत्मदेव, धुंधुली और धुंधकारी की कथा का किया वर्णन

कथा व्यास अनुराधा तिवारी ने बताया कि प्राचीन काल में तुंगभद्रा नदी के तट पर आत्मदेव नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी धुंधुली के साथ रहते थे। दंपति के कोई संतान नहीं थी, जिससे वे काफी दुखी रहते थे। भगवान शिव की कृपा से उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए। बड़े पुत्र का नाम गोकर्ण था, जो जन्म से ही विद्वान, धार्मिक और तपस्वी प्रवृत्ति के थे। वहीं छोटा पुत्र धुंधकारी बुरी संगत में पड़ गया और अधर्म के मार्ग पर चलने लगा।

बुरे कर्मों के कारण धुंधकारी का हुआ पतन

कथा व्यास ने बताया कि धुंधकारी ने अपने जीवन में अनेक पाप कर्म किए। उसने अपने माता-पिता को प्रताड़ित किया और वेश्याओं के मोह में पड़कर जीवन को विनाश की ओर ले गया। अंततः वेश्याओं के कहने पर उसने अपने ही माता-पिता की हत्या कर दी। बाद में उन्हीं वेश्याओं ने उसका सारा धन हड़प लिया और उसकी भी हत्या कर दी। पाप कर्मों के कारण धुंधकारी को प्रेत योनि प्राप्त हुई और वह अत्यंत कष्ट भोगने लगा।

गोकर्ण ने कराया भाई का उद्धार

तपस्या पूर्ण करने के बाद जब गोकर्ण अपने गांव लौटे तो रात में प्रेत बने धुंधकारी ने उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। भाई की पीड़ा सुनकर गोकर्ण अत्यंत दुखी हुए और उसके उद्धार का उपाय खोजने लगे। उन्होंने सूर्यदेव से मार्गदर्शन मांगा। सूर्यदेव ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण ही धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति दिला सकता है।

सात दिन की भागवत कथा से मिली मुक्ति

इसके बाद गोकर्ण ने गांव के लोगों के साथ सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया। कथा श्रवण के लिए एक बांस गाड़कर उसमें सात गांठें लगाई गईं। प्रतिदिन कथा समाप्त होने पर एक-एक गांठ टूटती चली गई। सातवें दिन कथा पूर्ण होते ही बांस की सभी गांठें टूट गईं और धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई।

कथा व्यास ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा के प्रभाव से भगवान विष्णु के पार्षद दिव्य विमान लेकर आए और धुंधकारी को वैकुंठ धाम ले गए। यह प्रसंग इस बात का संदेश देता है कि श्रद्धा और

भक्ति के साथ भागवत कथा का श्रवण करने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो सकते हैं।

भक्ति रस में डूबा रहा पूरा पंडाल

धुंधकारी प्रकरण के दौरान कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए।

कथा के बीच-बीच में ‘राधे-राधे’ और ‘हरि बोल’ के जयकारों से वातावरण

भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने कथा को बड़े ध्यान और श्रद्धा के साथ सुना।

मुख्य यजमान ने की महाआरती

कथा के समापन पर मुख्य यजमान सुभाष विश्वकर्मा एवं उनकी पत्नी

श्रीमती विंध्यवासिनी देवी द्वारा भगवान की भव्य महाआरती की गई। आरती के दौरान श्रद्धालुओं ने

दीप जलाकर भगवान का पूजन किया। इसके बाद सभी भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया।

धार्मिक आयोजनों से बढ़ती है आध्यात्मिक चेतना

कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि जीवन को

सही दिशा देने का माध्यम है। कथा के माध्यम से मनुष्य को धर्म, भक्ति, सदाचार और

मानवता का संदेश मिलता है। ऐसे आयोजन समाज में आध्यात्मिक चेतना जागृत करने का कार्य करते हैं।

ग्राम दीपगढ़ में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन धुंधकारी और गोकर्ण के प्रसंग ने

श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। कथा के माध्यम से लोगों को भक्ति,

सत्कर्म और श्रीमद्भागवत श्रवण के महत्व का संदेश मिला।

महाआरती और प्रसाद वितरण के साथ दिन की कथा का समापन हुआ।

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