72 देशों के केंद्रीय बैंकों का बड़ा संकेत
दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में आने वाले वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। एक हालिया सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भारत के रिजर्व बैंक (RBI) समेत 72 देशों के केंद्रीय बैंक अगले पांच वर्षों में अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। यह कदम केवल निवेश रणनीति नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन में संभावित बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ रही भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं, युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध और वैश्विक वित्तीय जोखिमों ने केंद्रीय बैंकों को अपनी रिजर्व नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। इसी वजह से दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अब अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और सोने को सुरक्षित विकल्प के रूप में अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
क्यों बढ़ रहा है सोने का महत्व?
सोना सदियों से संपत्ति संरक्षण का सबसे भरोसेमंद माध्यम माना जाता रहा है। जब भी वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट में आती है, निवेशकों और सरकारों का भरोसा सोने पर बढ़ जाता है। वर्तमान समय में रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन व्यापार तनाव, मध्य पूर्व में अस्थिरता और बढ़ती महंगाई ने वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है।
ऐसे माहौल में केंद्रीय बैंक अपनी संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं। सोना किसी एक देश या मुद्रा पर निर्भर नहीं होता, इसलिए इसे आर्थिक संकट के समय सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है।
RBI लगातार बढ़ा रहा है गोल्ड रिजर्व
भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर सोना खरीद चुका है। RBI का मानना है कि विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता बनाए रखने से आर्थिक जोखिम कम होते हैं। भारत का गोल्ड रिजर्व लगातार बढ़ रहा है और यह देश की वित्तीय सुरक्षा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण बनी रहती हैं तो RBI आने वाले वर्षों में भी सोने की खरीद जारी रख सकता है। इससे भारत की आर्थिक स्थिति और मजबूत हो सकती है।
क्या डॉलर की बादशाहत खत्म होने वाली है?
अमेरिकी डॉलर दशकों से दुनिया की सबसे प्रमुख रिजर्व मुद्रा बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल खरीद और वैश्विक भुगतान प्रणाली में डॉलर का दबदबा कायम है। लेकिन अब कई देश डॉलर आधारित व्यवस्था के विकल्प तलाश रहे हैं।
यदि केंद्रीय बैंक लगातार डॉलर आधारित परिसंपत्तियों की हिस्सेदारी कम करते हैं और सोने का भंडार बढ़ाते हैं, तो वैश्विक रिजर्व सिस्टम में धीरे-धीरे बदलाव आ सकता है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि निकट भविष्य में डॉलर का प्रभुत्व पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, लेकिन उसकी ताकत को चुनौती जरूर मिल सकती है।
सोने की कीमतों में आ सकती है बड़ी तेजी
केंद्रीय बैंकों की बढ़ती खरीदारी का सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ सकता है।
जब बड़े संस्थागत खरीदार बाजार में लगातार सोना खरीदते हैं तो मांग बढ़ती है और
कीमतों में तेजी देखने को मिलती है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि अगले पांच वर्षों तक केंद्रीय बैंक
इसी गति से खरीदारी जारी रखते हैं तो सोने की कीमतें
नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती हैं। इससे उन निवेशकों को बड़ा फायदा हो सकता है
जिन्होंने पहले से गोल्ड में निवेश किया हुआ है।
भारत को क्या होगा फायदा?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में से एक है।
मजबूत गोल्ड रिजर्व देश की आर्थिक स्थिरता को बढ़ाता है
और विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत करता है। आर्थिक संकट या वैश्विक वित्तीय
उथल-पुथल के समय गोल्ड रिजर्व देश के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है।
इसके अलावा मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और गोल्ड रिजर्व अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख को भी मजबूत बनाते हैं।
अगले 5 वर्षों में क्या बदल सकता है?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले पांच वर्षों में
वैश्विक रिजर्व पोर्टफोलियो में सोने की हिस्सेदारी बढ़ सकती है।
कई देश डॉलर के साथ-साथ सोने और अन्य वैकल्पिक संपत्तियों पर अधिक भरोसा करेंगे।
इससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक विविध और संतुलित हो सकती है।
72 देशों के केंद्रीय बैंकों का यह संकेत बताता है कि दुनिया एक नए आर्थिक युग की ओर बढ़ रही है।
RBI समेत कई केंद्रीय बैंक सोने को भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का
मजबूत आधार मान रहे हैं। यदि यह रुझान जारी रहता है तो सोने की मांग, कीमत और
वैश्विक महत्व आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है। वहीं अमेरिकी डॉलर को भी
पहली बार इतने बड़े स्तर पर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
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