गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में विलुप्तप्राय राजगिद्धों के संरक्षण और उनकी संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से स्थापित जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र इन दिनों एक नई चुनौती से जूझ रहा है। कैंपियरगंज क्षेत्र के भारीवैसी में बने इस केंद्र में चार मादा गिद्ध पिछले करीब दो वर्षों से अपने जोड़े का इंतजार कर रही हैं। इन मादा गिद्धों के लिए नर पक्षियों को लाने की योजना सरकारी अनुमति के इंतजार में अटकी हुई है। ऐसे में केंद्र में राजगिद्धों का कुनबा बढ़ाने की योजना की रफ्तार धीमी पड़ गई है।
यह केंद्र राजगिद्धों के संरक्षण और प्राकृतिक प्रजनन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। इसके माध्यम से विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही इस महत्वपूर्ण पक्षी प्रजाति की संख्या बढ़ाकर भविष्य में उन्हें प्राकृतिक वातावरण में छोड़ने की योजना है। लेकिन पर्याप्त नर गिद्ध उपलब्ध नहीं होने और नए पक्षियों को लाने के लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) की अनुमति आवश्यक होने से संरक्षण की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, राजगिद्ध सामान्य पक्षियों की तरह आसानी से अपना साथी नहीं बदलते। ये जीवनभर एक ही साथी के साथ जोड़ा बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसलिए इनके संरक्षण और प्रजनन के लिए सही उम्र में जोड़ा तैयार करना बेहद महत्वपूर्ण है।
दो साल से चार मादा गिद्धों को साथी का इंतजार
कैंपियरगंज के भारीवैसी स्थित जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र में फरवरी 2025 तक चित्रकूट और ललितपुर के जंगलों से कुल आठ राजगिद्ध लाए गए थे। इनमें दो नर और छह मादा गिद्ध शामिल थे। इनमें से चार पक्षियों को दो जोड़ों के रूप में पक्षीशाला में रखा गया है। ये दोनों जोड़े अभी अल्पवयस्क अवस्था में हैं। वहीं, शेष चार मादा गिद्धों को अलग-अलग पक्षीशालाओं में रखा गया है।
इन चार मादा गिद्धों के लिए उपयुक्त नर साथी लाना जरूरी है, ताकि भविष्य में इनके प्राकृतिक प्रजनन की संभावना बढ़ाई जा सके। केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार, राजगिद्ध एक बार साथी चुनने के बाद उसी के साथ जीवन बिताने की प्रवृत्ति रखते हैं। ऐसे में इनके लिए सही साथी का चयन और जोड़ा बनाना संरक्षण कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वन विभाग के सामने चुनौती यह है कि नए नर गिद्ध कहां से और किस प्रक्रिया के तहत लाए जाएं। इसके लिए चित्रकूट और अन्य संभावित क्षेत्रों से गिद्धों को लाने की योजना पर काम किया जाना है, लेकिन आवश्यक अनुमति नहीं मिलने से आगे की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही है।
CZA की मंजूरी का इंतजार, नए गिद्ध लाने की प्रक्रिया अटकी
जटायु संरक्षण केंद्र में गिद्धों की संख्या बढ़ाने के लिए वन विभाग को अब केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से अनुमति लेनी पड़ रही है। वन्यजीव संरक्षण से संबंधित नियमों में बदलाव के बाद संरक्षण केंद्र में नए पक्षियों को लाने और रखने की प्रक्रिया के लिए केंद्रीय स्तर की स्वीकृति जरूरी हो गई है।
गोरखपुर वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, नए राजगिद्ध लाने के लिए संबंधित प्राधिकरण के पास आवेदन किया गया है। मंजूरी मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जा सकेगी।
इस अनुमति का इंतजार इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि केंद्र में पहले से मौजूद चार मादा गिद्धों के लिए नर साथी उपलब्ध कराना जरूरी है। यदि नए पक्षी समय पर नहीं लाए जा सके तो प्रजनन कार्यक्रम की गति प्रभावित हो सकती है।
वन विभाग के सामने केवल गिद्धों की संख्या बढ़ाने की चुनौती नहीं है, बल्कि उनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना भी जरूरी है। संरक्षण केंद्र का उद्देश्य इन पक्षियों को ऐसी परिस्थितियां उपलब्ध कराना है, जहां वे प्राकृतिक व्यवहार के अनुसार विकसित हों और भविष्य में जंगलों में छोड़े जाने के योग्य बन सकें।
हाईवे, रेलवे और मोबाइल टावर के शोर से पर्यावरण पर चिंता
जटायु संरक्षण केंद्र के भविष्य को लेकर पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों ने आसपास के वातावरण पर भी चिंता जताई है। कैंपियरगंज क्षेत्र में स्थित यह केंद्र गोरखपुर-सोनौली हाईवे के नजदीक है। इसके आसपास रेलवे स्टेशन, कस्बा और मानव गतिविधियां भी मौजूद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजगिद्ध जैसे संवेदनशील पक्षियों के लिए शांत वातावरण बेहद आवश्यक है। आसपास वाहनों की आवाजाही, रेलगाड़ियों का शोर, डीजे और अन्य मानवीय गतिविधियां उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।
इसके अतिरिक्त क्षेत्र में मौजूद मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों को लेकर भी कुछ विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। हालांकि, इनके प्रजनन और विकास पर वास्तविक प्रभाव का आकलन वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर किया जाना जरूरी है।
केंद्र के आसपास वानिकी एवं औद्यानिकी विश्वविद्यालय का निर्माण भी प्रस्तावित है। इस निर्माण से पक्षियों के प्राकृतिक आवास पर शोर और अन्य गतिविधियों का प्रभाव न पड़े, इसके लिए वन विभाग की ओर से ध्वनि अवरोधक और ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना बताई गई है।
गोरखपुर के वन विभाग के अधिकारी शुभम सिंह के अनुसार, विश्वविद्यालय के लेआउट में
जटायु केंद्र की तरफ हरित क्षेत्र विकसित करने और पक्षियों को शोर से बचाने के उपाय शामिल किए जाएंगे।
इसका उद्देश्य संरक्षण केंद्र के आसपास बेहतर पर्यावरण बनाए रखना है।
पारिस्थितिकी तंत्र के लिए क्यों जरूरी हैं राजगिद्ध?
राजगिद्ध प्रकृति के महत्वपूर्ण सफाईकर्मी माने जाते हैं। ये मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर
पर्यावरण को स्वच्छ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इनके कारण मृत जीवों के सड़ने से फैलने वाले
संक्रमण और बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद मिलती है।
प्रकृति में गिद्धों की संख्या कम होना पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चिंता का विषय है। भारत में गिद्धों की
कई प्रजातियों की संख्या में गिरावट के पीछे आवास का नुकसान, भोजन की उपलब्धता में कमी और
पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली कुछ हानिकारक दवाओं जैसे कारण रहे हैं।
राजगिद्धों का संरक्षण इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इनकी प्रजनन प्रक्रिया धीमी होती है।
ये सामान्य रूप से एक वर्ष में एक अंडा देते हैं और जोड़ा बनाने में भी विशेष व्यवहार दिखाते हैं।
ऐसे में इनकी संख्या बढ़ाने के लिए लंबे समय तक वैज्ञानिक निगरानी, उचित भोजन,
सुरक्षित आवास और अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है।
गोरखपुर का जटायु संरक्षण केंद्र इसी दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
हालांकि, इसके उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नए पक्षियों की उपलब्धता,
सरकारी अनुमति और आसपास के पर्यावरण की सुरक्षा पर एक साथ ध्यान देना होगा।
निष्कर्ष: गोरखपुर के जटायु संरक्षण केंद्र में चार मादा राजगिद्धों को नर साथी का
इंतजार होना संरक्षण अभियान के सामने बड़ी चुनौती को दर्शाता है। CZA की
अनुमति मिलने के बाद नए गिद्ध लाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
इसके साथ ही केंद्र के आसपास शांत और सुरक्षित वातावरण तैयार करना भी जरूरी है।
यदि इन सभी पहलुओं पर प्रभावी ढंग से काम किया गया तो यह केंद्र
राजगिद्धों की घटती आबादी को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. गोरखपुर का जटायु संरक्षण केंद्र कहां स्थित है?
उत्तर: यह केंद्र उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के कैंपियरगंज क्षेत्र के भारीवैसी में स्थित है।
प्रश्न 2. जटायु संरक्षण केंद्र में कितने गिद्ध मौजूद हैं?
उत्तर: फरवरी 2025 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार केंद्र में कुल आठ राजगिद्ध थे,
जिनमें दो नर और छह मादा शामिल थे।
प्रश्न 3. चार मादा गिद्धों को साथी क्यों नहीं मिल पा रहा है?
उत्तर: उनके लिए उपयुक्त नर गिद्ध लाने की जरूरत है, लेकिन नए पक्षियों को
संरक्षण केंद्र में लाने के लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की अनुमति का इंतजार है।
प्रश्न 4. CZA की अनुमति क्यों जरूरी है?
उत्तर: नए नियमों के तहत संरक्षण केंद्र में वन्यजीवों को लाने और रखने के लिए
संबंधित केंद्रीय प्राधिकरण की स्वीकृति आवश्यक है।
प्रश्न 5. राजगिद्ध पर्यावरण के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर: राजगिद्ध मृत पशुओं के अवशेष खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने और
संभावित संक्रमण के प्रसार को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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