लोकसभा सीटों के संभावित परिसीमन और महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार की कोशिशों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू की ओर से परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर विपक्ष से समर्थन जुटाने की कोशिशों के बीच यह चर्चा तेज हुई कि जरूरत पड़ने पर संसद के मानसून सत्र को दोबारा बुलाया जा सकता है। हालांकि, इस मुद्दे पर सरकार की ओर से अलग-अलग समय पर विशेष सत्र को लेकर अलग स्थिति सामने आई है, इसलिए किसी संभावित नए सत्र को लेकर अंतिम आधिकारिक निर्णय का इंतजार जरूरी है।
परिसीमन का मुद्दा इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध भविष्य में लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण, राज्यों के प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण की व्यवस्था से है। सरकार की ओर से पहले पेश किए गए प्रस्ताव में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाने की योजना रखी गई थी। अप्रैल 2026 में संबंधित संवैधानिक संशोधन विधेयक लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर पाया था।
क्या फिर बुलाया जा सकता है संसद का सत्र?
परिसीमन विधेयक को लेकर संसद का सत्र दोबारा बुलाए जाने की संभावना की चर्चा ऐसे समय में हो रही है, जब सरकार को विधेयक पारित कराने के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन की जरूरत है। इससे पहले अगस्त में किरेन रिजिजू ने कहा था कि उस समय मानसून सत्र बढ़ाने या 16 से 18 अगस्त के बीच अलग विशेष सत्र बुलाने का कोई प्रस्ताव नहीं था।
वहीं, इससे पहले सामने आई रिपोर्टों में कहा गया था कि सरकार मौजूदा मानसून सत्र में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों को फिर से लाने के लिए विपक्षी दलों से समर्थन मांग रही थी। रिजिजू ने विपक्ष के नेताओं से संपर्क भी किया था।
इससे स्पष्ट है कि सरकार की रणनीति और संसद की कार्यवाही के बीच राजनीतिक बातचीत लगातार जारी रही है। अब किसी नए सत्र या विधेयक को दोबारा पेश करने के संबंध में अंतिम फैसला सरकार और संसद की निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही होगा।
परिसीमन बिल आखिर है क्या?
परिसीमन (Delimitation) का अर्थ लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण करना है। इसका उद्देश्य बदलती आबादी और संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना होता है।
भारत में लोकसभा सीटों के राज्यवार आवंटन को लंबे समय से एक निश्चित आधार पर रखा गया है। 84वें संविधान संशोधन के बाद सीटों के आवंटन को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक प्रभावी रूप से स्थिर रखा गया था। अब आने वाले वर्षों में परिसीमन का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की नई व्यवस्था तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होनी है।
लोकसभा की सीटें बढ़ाने की योजना क्यों?
केंद्र सरकार की ओर से 2026 में पेश किए गए प्रस्तावों में लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने की बात सामने आई थी। अलग-अलग प्रस्तावों और रिपोर्टों में सीटों की संख्या को लेकर अलग आंकड़े सामने आए हैं, लेकिन व्यापक उद्देश्य मौजूदा 543 सीटों के मुकाबले लोकसभा का विस्तार करना था।
सरकार की दलील यह रही है कि देश की आबादी और मतदाताओं की संख्या में बड़े बदलाव के बावजूद लोकसभा की सीटों की संख्या लंबे समय से सीमित है। सीटें बढ़ने से सांसद और मतदाताओं के बीच प्रतिनिधित्व का अनुपात बेहतर किया जा सकता है।
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर दक्षिणी राज्यों में चिंता भी सामने आई है। उनका तर्क है कि यदि परिसीमन मुख्य रूप से आबादी के आधार पर किया गया तो अधिक आबादी वाले राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं और अपेक्षाकृत कम आबादी वाले राज्यों का राजनीतिक वजन कम हो सकता है।
दक्षिणी राज्यों की चिंता क्या है?
परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी राजनीतिक बहस जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन को लेकर है। दक्षिणी राज्यों ने अतीत में परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। ऐसे में वहां की राजनीतिक पार्टियां आशंका जताती रही हैं कि सिर्फ आबादी को आधार बनाने पर उन्हें नुकसान हो सकता है।
किरन रिजिजू ने इससे पहले कहा था कि परिसीमन के बाद राज्यों के बीच आनुपातिक प्रतिनिधित्व में बदलाव नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार इस विषय पर अपनी स्थिति संसद में स्पष्ट करेगी।
यही वजह है कि परिसीमन केवल चुनावी क्षेत्रों की सीमा बदलने का विषय नहीं है, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी पड़ सकता है।
महिला आरक्षण से परिसीमन का क्या संबंध है?
परिसीमन की चर्चा महिला आरक्षण के साथ भी जुड़ी हुई है। 2023 में संसद ने महिलाओं के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान पारित किया था। हालांकि इसके लागू होने की प्रक्रिया परिसीमन और जनगणना से जुड़ी हुई है।
2026 में केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण को जल्द लागू करने के उद्देश्य से संवैधानिक बदलाव का प्रस्ताव रखा था। लेकिन अप्रैल में संबंधित विधेयक लोकसभा में आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका। उस मतदान में 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में और 230 ने विपक्ष में मतदान किया था।
अप्रैल में सरकार को क्यों लगा झटका?
अप्रैल 2026 में पेश संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी। सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में मतदान किया। आवश्यक विशेष बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका।
इस घटनाक्रम के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त संख्या जुटाने की थी। यही वजह है कि बाद में सरकार ने विपक्षी दलों से बातचीत की कोशिश तेज की।
NDA के नंबर क्यों महत्वपूर्ण हैं?
परिसीमन जैसे संवैधानिक बदलाव वाले विधेयक को पारित कराने के लिए सामान्य बहुमत से ज्यादा समर्थन की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए लोकसभा में सरकार के पास कितने सांसद हैं और विपक्ष की स्थिति क्या है, यह राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
अगस्त में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार सरकार परिसीमन विधेयक पर विपक्षी दलों का सहयोग हासिल करने की कोशिश कर रही थी। कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी और अन्य दलों से भी बातचीत की संभावना बताई गई थी।
कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण लोकसभा में विभिन्न दलों की संख्या और
बैठने की व्यवस्था में भी बदलाव हुआ है। इसलिए किसी भी नए विधेयक के समय वास्तविक संख्या और मतदान की
स्थिति को उसी समय के आधिकारिक संसदीय आंकड़ों से देखना जरूरी होगा।
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?
विपक्षी दल परिसीमन के मुद्दे पर कई सवाल उठा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल
राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर है। खासकर दक्षिणी राज्यों की पार्टियां चाहती हैं कि
परिसीमन के दौरान उनकी मौजूदा राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित न हो।
इसके अलावा विपक्ष सरकार से परिसीमन के प्रस्ताव की पूरी जानकारी, सीटों के निर्धारण का
आधार और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संभावित बदलाव को लेकर स्पष्टता मांगता रहा है।
एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले ने भी जुलाई में कहा था कि यदि सभी राज्यों की सीटों में समान
अनुपात से वृद्धि की जाए तो उनकी पार्टी परिसीमन विधेयक का समर्थन कर सकती है।
सरकार के सामने क्या है चुनौती?
सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे परिसीमन और महिला
आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त राजनीतिक
समर्थन जुटाना होगा, वहीं दूसरी ओर राज्यों की चिंताओं को दूर करना होगा।
यदि सरकार किसी नए प्रस्ताव के साथ आगे बढ़ती है तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि सीटों का
पुनर्वितरण किस आधार पर होगा और इससे किसी राज्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर कितना असर पड़ेगा।
आगे क्या हो सकता है?
अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम पर है। यदि सरकार परिसीमन विधेयक को
दोबारा लाने का फैसला करती है तो उसके लिए राजनीतिक सहमति बनाना सबसे अहम होगा।
संसद का कोई नया या विशेष सत्र बुलाया जाता है या नहीं, और विधेयक किस स्वरूप में पेश किया जाता है,
इसकी आधिकारिक घोषणा के बाद ही तस्वीर साफ होगी। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों से इतना स्पष्ट है कि
परिसीमन का मुद्दा केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण राजनीतिक प्राथमिकताओं में बना हुआ है।
निष्कर्ष
लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच
राजनीतिक खींचतान जारी है। किरेन रिजिजू की ओर से विपक्षी नेताओं से
बातचीत और विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिशों ने
इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि पहले सरकार ने मानसून सत्र बढ़ाने या
अगस्त में अलग विशेष सत्र बुलाने की किसी योजना से इनकार किया था।
परिसीमन का असर सिर्फ लोकसभा सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रहेगा।
इसका संबंध राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण के कार्यान्वयन से भी
जुड़ा है। इसलिए आने वाले समय में सरकार और विपक्ष के
बीच सहमति बनती है या टकराव बढ़ता है, इस पर देश की राजनीति की नजर रहेगी।
FAQ: परिसीमन बिल और संसद सत्र
1. परिसीमन बिल क्या है?
परिसीमन बिल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और लोकसभा-विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण से जुड़ा प्रस्ताव है।
2. परिसीमन का लोकसभा पर क्या असर पड़ेगा?
परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में
बदलाव की संभावना है। 2026 में पेश प्रस्तावों में लोकसभा विस्तार का प्रावधान रखा गया था।
3. परिसीमन और महिला आरक्षण का क्या संबंध है?
महिला आरक्षण को लागू करने की संवैधानिक व्यवस्था परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ी हुई है।
सरकार ने इसे जल्द लागू करने के लिए 2026 में अलग संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव पेश किया था।
4. परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्य चिंतित क्यों हैं?
दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि आबादी को प्रमुख आधार बनाने पर अधिक जनसंख्या वाले
राज्यों की लोकसभा सीटें ज्यादा बढ़ सकती हैं और उनका सापेक्ष प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
5. क्या परिसीमन बिल पहले लोकसभा में आया था?
हां। 2026 में केंद्र सरकार ने परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव संसद में पेश किए थे।
संबंधित संवैधानिक संशोधन विधेयक अप्रैल में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका।
6. किरेन रिजिजू ने क्या कहा?
रिजिजू ने परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों पर विपक्ष से सहयोग
हासिल करने की कोशिश की थी। अगस्त में उन्होंने कहा था कि उस समय मानसून सत्र बढ़ाने या
16-18 अगस्त के बीच विशेष सत्र बुलाने का कोई प्रस्ताव नहीं था।
7. क्या संसद का नया सत्र निश्चित हो गया है?
उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर किसी नए विशेष सत्र को
निश्चित मानना उचित नहीं है। सरकार की ओर से अंतिम घोषणा होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
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