Graduate Jobs Crisis: सिर्फ 8.25% ग्रेजुएट्स को मिल रही योग्यता के अनुरूप नौकरी, नीति आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

8.25% ग्रेजुएट्स ही अपनी योग्यता के अनुरूप भूमिकाओं में कार्यरत

भारत में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन उनकी डिग्री और रोजगार के बीच का अंतर अब एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में केवल 8.25% स्नातक ही ऐसी नौकरियों में कार्यरत हैं, जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप हैं। नीति आयोग ने इस आंकड़े को Economic Survey 2024-25 के हवाले से अपनी रिपोर्ट में शामिल किया है।

इस आंकड़े ने भारत में उच्च शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के बीच मौजूद असंतुलन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि बाकी स्नातक पूरी तरह बेरोजगार हैं, बल्कि बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे युवा ऐसी भूमिकाओं में काम कर रहे हैं जो उनकी डिग्री या विशेषज्ञता से पूरी तरह मेल नहीं खातीं।

डिग्री के बाद भी क्यों नहीं मिल रही योग्यता के अनुरूप नौकरी?

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत की उच्च और तकनीकी शिक्षा व्यवस्था में पढ़ाई और श्रम बाजार की जरूरतों के बीच महत्वपूर्ण अंतर मौजूद है। कई संस्थानों के पाठ्यक्रम तेजी से बदलती औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप अपडेट नहीं हो पाए हैं। परिणामस्वरूप डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र हासिल करने के बावजूद युवाओं को रोजगार के लिए अतिरिक्त कौशल की आवश्यकता पड़ती है।

आज कंपनियां केवल शैक्षणिक डिग्री पर निर्भर नहीं रहतीं। संचार कौशल, डिजिटल दक्षता, समस्या समाधान, तकनीकी जानकारी और संबंधित क्षेत्र का व्यावहारिक अनुभव नौकरी पाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रिपोर्ट में भी job-ready skills की कमी को रोजगार की बड़ी बाधाओं में शामिल किया गया है।

पढ़ाई और इंडस्ट्री की जरूरतों के बीच गैप बड़ी चुनौती

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण संकेत यह है कि शिक्षा व्यवस्था और उद्योग की मांग के बीच तालमेल मजबूत करने की जरूरत है। कई युवा कॉलेज में ऐसी शिक्षा प्राप्त करते हैं जिसका वास्तविक कार्यस्थल पर सीमित उपयोग होता है। वहीं दूसरी ओर कंपनियों को ऐसे उम्मीदवारों की जरूरत होती है, जिनके पास पहले से व्यावहारिक और उद्योग-विशिष्ट कौशल मौजूद हों।

इस स्थिति में एक तरफ युवाओं की डिग्रियां बढ़ रही हैं, तो दूसरी तरफ कंपनियों को उपयुक्त उम्मीदवार खोजने में कठिनाई होती है। यह स्थिति भारत के रोजगार बाजार में “skills mismatch” की समस्या को दर्शाती है।

सिर्फ डिग्री नहीं, रोजगार योग्य कौशल पर जोर

नीति आयोग ने रोजगार की समस्या से निपटने के लिए शिक्षा और कौशल विकास को उद्योग की जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया है। इसके लिए पाठ्यक्रमों को आधुनिक बनाने, विद्यार्थियों को व्यावहारिक अनुभव देने और उद्योग से जुड़े प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई है।

स्कूल स्तर से ही communication, digital skills, financial literacy, problem-solving और entrepreneurship जैसे कौशल विकसित करने पर भी रिपोर्ट में जोर दिया गया है। इससे विद्यार्थियों को केवल परीक्षा आधारित शिक्षा के बजाय रोजगार और उद्यमिता के लिए तैयार किया जा सकता है।

युवाओं के लिए क्या है इसका मतलब?

इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि केवल ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करना अब पर्याप्त नहीं है। युवाओं को अपनी पढ़ाई के साथ-साथ ऐसे कौशल विकसित करने की जरूरत है जिनकी वास्तविक नौकरी बाजार में मांग है।

इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, उद्योग आधारित प्रोजेक्ट, डिजिटल स्किल, तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावहारिक अनुभव युवाओं की employability बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

वहीं शिक्षण संस्थानों के लिए भी जरूरी है कि वे अपने पाठ्यक्रम को उद्योग की बदलती जरूरतों के अनुसार लगातार अपडेट करें।

रोजगार व्यवस्था में बड़े सुधार की जरूरत

भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। लेकिन यदि शिक्षित युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिलता है, तो इसका असर व्यक्तिगत आय के साथ-साथ देश की उत्पादकता और आर्थिक विकास पर भी पड़ सकता है।

नीति आयोग की रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब भारत में skill development, vocational education और industry-linked training को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को कम करना भारत के विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा।

शिक्षा संस्थानों के सामने भी बड़ी चुनौती

बदलते रोजगार बाजार के बीच शिक्षण संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

केवल पारंपरिक पाठ्यक्रम और परीक्षा आधारित शिक्षा के बजाय विद्यार्थियों को

वास्तविक कार्यस्थल की जरूरतों के अनुरूप तैयार करने की आवश्यकता है।

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उद्योग विशेषज्ञों के साथ सहयोग,

प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप और प्रशिक्षण कार्यक्रम बढ़ाने से विद्यार्थियों को पढ़ाई के दौरान ही

कार्यस्थल की वास्तविक परिस्थितियों का अनुभव मिल सकता है।

कंपनियों और उद्योग की भूमिका भी अहम

Qualification-job mismatch को कम करने में उद्योग जगत की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

कंपनियां यदि शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम विकसित करें तो

विद्यार्थियों को बाजार की वास्तविक जरूरतों को समझने का अवसर मिल सकता है।

इससे कंपनियों को भी ऐसे उम्मीदवार मिल सकते हैं जिनके पास डिग्री के साथ आवश्यक व्यावहारिक कौशल मौजूद हों।

8.25% का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है?

केवल 8.25% स्नातकों का अपनी योग्यता के अनुरूप भूमिकाओं में काम करना

यह संकेत देता है कि भारत के सामने चुनौती केवल रोजगार की संख्या बढ़ाने की नहीं है।

रोजगार की गुणवत्ता और उपयुक्तता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

यदि कोई युवा उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद ऐसी नौकरी करता है

जिसमें उसकी शिक्षा और विशेषज्ञता का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं होता, तो

उसकी क्षमता का पूरा लाभ न तो उसे मिलता है और न ही अर्थव्यवस्था को।

आगे क्या करना होगा?

भारत में शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद अंतर को कम करने के लिए

कई स्तरों पर प्रयास की जरूरत होगी। पाठ्यक्रमों को उद्योग की जरूरतों के अनुसार अपडेट करने के

साथ-साथ कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण होगा।

इसके अलावा इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, व्यावसायिक प्रशिक्षण, डिजिटल शिक्षा और उद्योग-आधारित प्रोजेक्ट्स के अवसरों को व्यापक बनाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

8.25% का आंकड़ा भारत के रोजगार बाजार में मौजूद qualification-job mismatch की

गंभीर तस्वीर पेश करता है। चुनौती सिर्फ नौकरी पैदा करने की नहीं, बल्कि युवाओं को उनकी योग्यता,

कौशल और विशेषज्ञता के अनुरूप बेहतर रोजगार उपलब्ध कराने की भी है।

इसके लिए शिक्षा व्यवस्था, उद्योग और कौशल विकास संस्थानों के बीच मजबूत तालमेल जरूरी होगा।

यदि युवाओं की डिग्री को व्यावहारिक कौशल और उद्योग की जरूरतों से जोड़ा जाता है, तो

उनकी employability बढ़ाने के साथ-साथ देश की उत्पादकता और आर्थिक विकास को भी मजबूती मिल सकती है।

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