न्यायिक सेवा में जाने की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने निचली अदालतों में प्रवेश स्तर के न्यायिक पदों पर सीधी भर्ती के लिए पहले से लागू तीन साल की अनिवार्य वकालत की शर्त को संशोधित करते हुए इसे एक साल कर दिया है। यानी अब न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए उम्मीदवारों के लिए तीन साल के बजाय एक साल की सक्रिय कानूनी प्रैक्टिस पर्याप्त होगी। हालांकि अदालत ने व्यावहारिक अनुभव की जरूरत को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। चयन के बाद उम्मीदवारों को निर्धारित प्रशिक्षण और क्लर्कशिप से गुजरना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से देशभर में सिविल जज और निचली न्यायपालिका की भर्ती की तैयारी करने वाले लाखों कानून स्नातकों को राहत मिलने की उम्मीद है। अदालत ने एक ओर न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के लिए कोर्ट में काम करने के अनुभव को जरूरी माना, वहीं दूसरी ओर तीन साल की अनिवार्यता से युवा प्रतिभाओं के सामने पैदा होने वाली बाधाओं को भी ध्यान में रखा।
तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त घटाकर एक साल की गई
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के उस फैसले को पूरी तरह वापस नहीं लिया, जिसमें न्यायिक सेवा में प्रवेश से पहले वकालत का अनुभव जरूरी बताया गया था। अदालत ने केवल अनुभव की न्यूनतम अवधि में बदलाव किया है।
अब उम्मीदवारों के लिए एक साल की सक्रिय कानूनी प्रैक्टिस जरूरी होगी। इससे उन कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा का रास्ता कुछ आसान हो सकता है, जो एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी करना चाहते हैं।
पहले तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य किए जाने से कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले नए स्नातकों को न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए आवेदन करने से पहले लंबा इंतजार करना पड़ता था। अब अदालत ने इस अवधि को घटाकर एक साल कर दिया है।
चयन के बाद भी आसान नहीं होगी न्यायिक सेवा की राह
सुप्रीम कोर्ट ने प्रैक्टिस की अवधि कम करने के साथ उम्मीदवारों के लिए प्रशिक्षण व्यवस्था को मजबूत किया है। न्यायिक सेवा परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवारों को सीधे नियमित न्यायिक अधिकारी के रूप में काम शुरू करने के बजाय निर्धारित प्रशिक्षण प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
अदालत के अनुसार चयनित उम्मीदवारों को एक साल का गहन प्रशिक्षण राज्य न्यायिक अकादमी में लेना होगा। इसके बाद उन्हें न्यायिक अधिकारियों और हाईकोर्ट के मौजूदा न्यायाधीशों के साथ क्लर्कशिप का अनुभव भी दिया जाएगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालत में जिम्मेदारी संभालने से पहले नए न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव मिल सके।
छह महीने जिला जज के साथ और छह महीने हाईकोर्ट जज के साथ क्लर्कशिप
नई व्यवस्था में क्लर्कशिप को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार चयनित उम्मीदवारों को छह महीने जिला न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारी के साथ काम करना होगा।
इसके बाद छह महीने किसी मौजूदा हाईकोर्ट जज के साथ क्लर्कशिप करनी होगी। इस तरह उम्मीदवारों को निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट स्तर तक न्यायिक कार्यप्रणाली को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।
इस व्यवस्था के जरिए अदालत ने पहले जरूरी माने गए लंबे प्रैक्टिस अनुभव की जगह प्रशिक्षण और न्यायिक संस्थानों के साथ प्रत्यक्ष काम करने को महत्व दिया है।
31 मार्च 2027 तक बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने संक्रमण अवधि को लेकर भी महत्वपूर्ण राहत दी है। अदालत के निर्देश के मुताबिक 31 मार्च 2027 तक लागू होने वाली संक्रमण व्यवस्था के तहत कानून स्नातकों को तीन साल की पुरानी प्रैक्टिस शर्त के कारण आवेदन से वंचित नहीं किया जाएगा।
अदालत ने कहा है कि इस अवधि में पात्र उम्मीदवारों को आवेदन के उद्देश्य से एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी कर लेने वाला माना जाएगा और इस अवधि के लिए अलग से प्रैक्टिस प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी।
यह व्यवस्था खासतौर पर उन उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण है जो तीन साल की प्रैक्टिस की पुरानी शर्त के कारण न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी के बावजूद आवेदन नहीं कर पा रहे थे।
युवा कानून स्नातकों को क्यों मिली राहत?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के दौरान इस बात पर भी विचार किया कि तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस से कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले युवाओं के सामने एक लंबी खाली अवधि पैदा हो सकती है।
अदालत के अनुसार प्रतिभाशाली युवा कानून स्नातक न्यायिक सेवा को करियर के रूप में चुनने से हतोत्साहित हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें परीक्षा में शामिल होने से पहले कई वर्षों तक वकालत करनी पड़ती थी।
इसलिए अदालत ने ऐसा संतुलन बनाने की कोशिश की है, जिसमें न्यायिक अधिकारियों के लिए व्यावहारिक अनुभव की आवश्यकता भी बनी रहे और युवा प्रतिभाओं के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता अत्यधिक कठिन भी न हो।
महिला उम्मीदवारों के लिए भी महत्वपूर्ण बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान महिला उम्मीदवारों के सामने आने वाली सामाजिक परिस्थितियों पर भी चिंता व्यक्त की थी।
अदालत ने माना कि परिवार की जिम्मेदारियां, शादी और स्थान परिवर्तन जैसी परिस्थितियों के कारण कुछ महिला उम्मीदवारों के लिए लगातार तीन साल की वकालत पूरी करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में प्रैक्टिस की अवधि कम होने से महिला कानून स्नातकों के लिए भी न्यायिक सेवा में प्रवेश का अवसर बढ़ सकता है।
हालांकि उम्मीदवारों को चयन के बाद प्रशिक्षण और क्लर्कशिप पूरी करनी होगी, जिससे न्यायिक जिम्मेदारियां संभालने से पहले उन्हें व्यावहारिक अनुभव हासिल हो सके।
मई 2025 के फैसले में क्या था?
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा में सीधी भर्ती के लिए कम से कम तीन साल की कानूनी प्रैक्टिस को अनिवार्य किया था। इस फैसले का उद्देश्य ट्रायल कोर्ट में नियुक्त होने वाले न्यायिक अधिकारियों में व्यावहारिक अनुभव और परिपक्वता सुनिश्चित करना था।
इसके बाद इस फैसले की समीक्षा के लिए कई याचिकाएं दाखिल हुईं। याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि कानून की पढ़ाई के दौरान इंटर्नशिप, अदालतों के दौरे और अन्य व्यावहारिक प्रशिक्षण पहले से पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। साथ ही न्यायिक अधिकारी बनने के बाद भी प्रशिक्षण दिया जाता है।
अब सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा के बाद तीन साल की शर्त को संशोधित करते हुए एक साल कर दिया है।
अदालत ने प्रैक्टिस को पूरी तरह खत्म क्यों नहीं किया?
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि अदालत में व्यावहारिक अनुभव न्यायिक सेवा के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए प्रैक्टिस की शर्त को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया।
अदालत का नया मॉडल इस सोच पर आधारित है कि उम्मीदवारों को एक साल की वकालत का अनुभव मिले और चयन के बाद उन्हें न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण तथा
अदालतों के साथ क्लर्कशिप के जरिए व्यावहारिक ज्ञान दिया जाए।
इससे न्यायिक सेवा में प्रवेश और न्यायिक कार्य के लिए जरूरी
अनुभव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है।
न्यायिक सेवा की तैयारी करने वालों पर क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले का सबसे सीधा असर सिविल जज और अन्य प्रवेश स्तर की
न्यायिक सेवा परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों पर पड़ेगा।
पहले तीन साल की प्रैक्टिस पूरी करने के लिए उम्मीदवारों को लंबा इंतजार करना पड़ता था।
अब एक साल की प्रैक्टिस की शर्त होने से वे अपेक्षाकृत जल्दी परीक्षा के लिए पात्र बन सकेंगे।
हालांकि केवल परीक्षा पास कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। चयन के बाद निर्धारित
प्रशिक्षण और क्लर्कशिप पूरी करनी होगी। इसलिए उम्मीदवारों को अब अपनी तैयारी में न्यायिक
अकादमी प्रशिक्षण और व्यावहारिक न्यायिक कार्य को भी ध्यान में रखना होगा।
हाईकोर्ट और न्यायिक सेवा नियमों में बदलाव जरूरी
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संबंधित न्यायिक सेवा नियमों को नए निर्देशों के
अनुरूप ढालना होगा। भर्ती प्रक्रिया में प्रैक्टिस की अवधि, संक्रमण व्यवस्था और
चयन के बाद प्रशिक्षण को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाएगा।
इससे आने वाली न्यायिक सेवा भर्ती अधिसूचनाओं में पात्रता को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।
उम्मीदवारों के लिए जरूरी बातें
न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों को नए नियमों के बाद कुछ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना होगा—
- अब तीन साल के बजाय एक साल की सक्रिय कानूनी प्रैक्टिस का नियम लागू होगा।
- चयन के बाद एक साल का गहन प्रशिक्षण लेना होगा।
- प्रशिक्षण राज्य न्यायिक अकादमी में होगा।
- इसके बाद छह महीने जिला न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा अधिकारी के साथ क्लर्कशिप होगी।
- छह महीने हाईकोर्ट के मौजूदा जज के साथ क्लर्कशिप करनी होगी।
- संक्रमण अवधि में 31 मार्च 2027 तक विशेष राहत दी गई है।
आगे क्या होगा?
अब संबंधित उच्च न्यायालयों और न्यायिक सेवा भर्ती संस्थाओं को सुप्रीम कोर्ट के
नए निर्देशों के अनुरूप भर्ती प्रक्रिया तैयार करनी होगी। आने वाली भर्तियों में पात्रता और
आवेदन से संबंधित शर्तों को नए नियमों के अनुसार स्पष्ट किया जाएगा।
उम्मीदवारों को भी किसी भर्ती परीक्षा के लिए आवेदन करने से पहले संबंधित आधिकारिक
अधिसूचना में पात्रता शर्तों की जांच करनी चाहिए, क्योंकि संक्रमण अवधि और
भर्ती अधिसूचना की तारीख के आधार पर नियमों का अनुप्रयोग अलग हो सकता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से न्यायिक सेवा में प्रवेश की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के लिए
महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। तीन साल की अनिवार्य वकालत की
शर्त को घटाकर एक साल कर दिया गया है, लेकिन व्यावहारिक
अनुभव की जरूरत को समाप्त नहीं किया गया है। चयनित उम्मीदवारों को एक साल की
न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग के साथ कुल एक साल की क्लर्कशिप भी करनी होगी।
31 मार्च 2027 तक संक्रमण अवधि के दौरान पात्र कानून स्नातकों को विशेष राहत मिलेगी।
इस फैसले का उद्देश्य युवा प्रतिभाओं के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश को अधिक सुलभ बनाना और
साथ ही नए न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त व्यावहारिक प्रशिक्षण देना है।
FAQ
1. न्यायिक सेवा के लिए अब कितने साल की वकालत जरूरी है?
सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य कानूनी प्रैक्टिस की अवधि तीन साल से घटाकर एक साल कर दी है।
2. क्या तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त पूरी तरह खत्म हो गई है?
नहीं। अदालत ने प्रैक्टिस की आवश्यकता बरकरार रखी है,
लेकिन इसकी अवधि को तीन साल से घटाकर एक साल किया है।
3. चयन के बाद उम्मीदवारों को क्या करना होगा?
चयनित उम्मीदवारों को एक साल का गहन प्रशिक्षण राज्य
न्यायिक अकादमी में लेना होगा और इसके बाद एक साल की क्लर्कशिप करनी होगी।
4. क्लर्कशिप कितने समय की होगी?
क्लर्कशिप दो हिस्सों में होगी—छह महीने जिला न्यायाधीश/उच्चतर न्यायिक
सेवा अधिकारी के साथ और छह महीने हाईकोर्ट के मौजूदा जज के साथ।
5. संक्रमण अवधि कब तक रहेगी?
सुप्रीम कोर्ट ने संक्रमण अवधि के लिए 31 मार्च 2027 तक राहत दी है।
6. क्या कानून स्नातकों को तीन साल की प्रैक्टिस पूरी होने तक इंतजार करना होगा?
नई व्यवस्था के अनुसार सामान्य आवश्यकता एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस है।
संक्रमण अवधि में भी अदालत ने पात्र उम्मीदवारों के लिए विशेष राहत दी है।
7. सुप्रीम कोर्ट ने प्रैक्टिस की अवधि क्यों घटाई?
अदालत ने माना कि तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस युवा प्रतिभाशाली
कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश के रास्ते में लंबी बाधा पैदा कर सकती है।
8. क्या नया नियम न्यायिक सेवा की तैयारी करने वालों के लिए फायदेमंद है?
हां, एक साल की प्रैक्टिस की शर्त से पात्रता तक पहुंचने का समय कम होगा।
हालांकि चयन के बाद प्रशिक्षण और क्लर्कशिप अनिवार्य रहेगी।
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