सोशल मीडिया आज जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, मनोरंजन, दोस्तों से बातचीत और खबरों से लेकर खरीदारी तक, हर क्षेत्र में डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन इसी डिजिटल दुनिया को बनाने और आगे बढ़ाने वाले कई बड़े तकनीकी दिग्गज अपने बच्चों के स्क्रीन और सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर काफी सतर्क नजर आते हैं। यही वजह है कि दुनिया में अब यह बहस तेज हो गई है कि आखिर सोशल मीडिया बच्चों के लिए कितना सुरक्षित है और माता-पिता को अपने बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल पर कितनी निगरानी रखनी चाहिए।
टेक इंडस्ट्री से जुड़े कई प्रमुख लोगों ने सार्वजनिक रूप से बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित रखने या कम उम्र में स्मार्टफोन न देने की बात कही है। इस चर्चा के पीछे सिर्फ स्क्रीन के सामने बिताया जाने वाला समय नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया का बच्चों की नींद, ध्यान, व्यवहार, मानसिक स्वास्थ्य और साइबर बुलिंग पर संभावित प्रभाव भी बड़ी चिंता बन चुका है।
बड़े टेक अधिकारियों के बच्चे सोशल मीडिया से क्यों रहते हैं दूर?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर तकनीकी क्षेत्र के कई बड़े नाम अपने परिवारों में सख्त नियम अपनाने के लिए जाने जाते हैं। मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने बच्चों के लंबे समय तक टीवी या कंप्यूटर के सामने बैठे रहने को लेकर चिंता जताई थी। उनका मानना रहा है कि लोगों के साथ वास्तविक बातचीत करना सकारात्मक है, लेकिन लगातार वीडियो से वीडियो पर जाना बच्चों के लिए उतना लाभदायक नहीं हो सकता।
फेसबुक के शुरुआती निवेशकों में शामिल पीटर थील ने बताया था कि उनके छोटे बच्चों का स्क्रीन टाइम सप्ताह में लगभग 90 मिनट तक सीमित था। माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने भी अपने बच्चों को 14 वर्ष की उम्र तक मोबाइल फोन नहीं देने की बात कही थी।
गूगल के प्रमुख सुंदर पिचाई ने भी बताया था कि उनका 11 वर्षीय बेटा फोन इस्तेमाल नहीं करता था। वहीं एप्पल के प्रमुख टिम कुक ने अपने भतीजे को सोशल नेटवर्क से दूर रखने की बात कही थी।
इन उदाहरणों से यह सवाल उठता है कि यदि तकनीकी क्षेत्र के बड़े लोग खुद अपने बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को लेकर सावधानी बरत रहे हैं, तो आम परिवारों को भी सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर गंभीरता से नियम बनाने की जरूरत है या नहीं।
चिंता सिर्फ स्क्रीन टाइम की नहीं
बच्चों के लिए समस्या सिर्फ यह नहीं है कि वे मोबाइल या कंप्यूटर पर कितने घंटे बिताते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बच्चे स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं और उस सामग्री का उनके व्यवहार तथा सोच पर क्या असर पड़ रहा है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का डिजाइन ऐसा है कि उपयोगकर्ता लगातार नई सामग्री देखते रहें। छोटे वीडियो, लगातार बदलती पोस्ट, नोटिफिकेशन और सिफारिशों के कारण बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन से जुड़े रह सकते हैं।
यूट्यूब के सह-संस्थापक स्टीव चेन ने छोटे वीडियो को लेकर चिंता जताई थी। उनका डर था कि लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत बच्चों की लंबी सामग्री पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
WHO के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
विश्व स्वास्थ्य संगठन के यूरोप क्षेत्रीय कार्यालय की एक रिपोर्ट में 2022 के दौरान 44 देशों और क्षेत्रों के करीब 2.80 लाख बच्चों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें 11, 13 और 15 वर्ष की उम्र के बच्चे शामिल थे।
अध्ययन के अनुसार किशोरों में समस्याग्रस्त सोशल मीडिया इस्तेमाल की दर 2018 में 7 प्रतिशत थी, जो 2022 में बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई। लड़कियों में यह आंकड़ा 13 प्रतिशत और लड़कों में 9 प्रतिशत रहा।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समस्याग्रस्त इस्तेमाल का मतलब केवल ज्यादा समय तक सोशल मीडिया चलाना नहीं है। इसमें इस्तेमाल पर नियंत्रण खोना, सोशल मीडिया न चलाने पर बेचैनी होना, अन्य गतिविधियों की जगह सोशल मीडिया को प्राथमिकता देना और इसके कारण रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होना शामिल है।
बच्चों की नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर असर
सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर कई शोधों में बच्चों और किशोरों की मानसिक सेहत से जुड़े संभावित जोखिमों पर चर्चा की गई है। ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल को चिंता, अवसाद और नींद की समस्या जैसे लक्षणों से जोड़ा गया है।
खास तौर पर सोने से ठीक पहले मोबाइल या सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से नींद प्रभावित हो सकती है। देर रात तक स्क्रीन देखने से बच्चे देर से सो सकते हैं और उनकी नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है।
हालांकि, शोधों में सोशल मीडिया इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संबंध जरूर पाया गया है, लेकिन हर मामले में यह साबित नहीं हुआ है कि सोशल मीडिया ही सीधे तौर पर मानसिक स्वास्थ्य समस्या का कारण है। बच्चों की मानसिक स्थिति पर परिवार, स्कूल, सामाजिक माहौल और व्यक्तिगत परिस्थितियों का भी असर पड़ता है।
साइबर बुलिंग भी बड़ी चुनौती
सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर बुलिंग भी बच्चों के लिए बड़ी समस्या बनकर सामने आई है। WHO के आंकड़ों के अनुसार 15 प्रतिशत किशोरों ने साइबर बुलिंग का शिकार होने की जानकारी दी।
लड़कियों में यह आंकड़ा 16 प्रतिशत और लड़कों में 15 प्रतिशत रहा। 2018 से 2022 के बीच लड़कियों में साइबर बुलिंग का आंकड़ा 13 प्रतिशत से बढ़कर 16 प्रतिशत हुआ, जबकि लड़कों में यह 12 प्रतिशत से बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया।
साइबर बुलिंग का असर स्कूल और सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहता। लगातार ऑनलाइन परेशान किए जाने से बच्चे तनाव, डर, सामाजिक अलगाव और आत्मविश्वास की कमी जैसी परेशानियों का सामना कर सकते हैं।
सोशल मीडिया कंपनियों पर बढ़ा कानूनी दबाव
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सोशल मीडिया कंपनियों पर दुनिया के कई हिस्सों में कानूनी दबाव भी बढ़ा है।
अमेरिका में मेटा सहित कई बड़ी कंपनियों के खिलाफ बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के संभावित प्रभाव को लेकर मामले सामने आए हैं। कुछ मामलों में कंपनियों पर बच्चों को प्लेटफॉर्म पर लंबे समय तक बनाए रखने वाले डिजाइन और सुरक्षा उपायों से जुड़े आरोप लगाए गए।
2026 में भी अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनियों को लेकर कई कानूनी फैसले और मामले चर्चा में रहे हैं। न्यू मैक्सिको के एक मामले में मेटा पर भारी नागरिक जुर्माना लगाया गया, जबकि अन्य मामलों में भी बच्चों की मानसिक सेहत और सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर कंपनियों की जवाबदेही पर सवाल उठे।
कई देशों ने बच्चों के लिए उम्र सीमा तय की
बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाने के लिए कई देश उम्र आधारित नियमों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू किया गया है। ब्राजील में नाबालिग उपयोगकर्ताओं के खातों और अभिभावकीय निगरानी से जुड़े नियम बनाए गए हैं। इंडोनेशिया और मलेशिया ने भी कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित किया है।
तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात ने भी बच्चों के लिए उम्र आधारित प्रतिबंधों की दिशा में कदम उठाए हैं। यूरोप के कई देशों में भी न्यूनतम उम्र बढ़ाने या बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच सीमित करने पर चर्चा और कानून बनाने की प्रक्रिया चल रही है।
*भारत में क्या है स्थिति?
भारत में अभी बच्चों के लिए सोशल मीडिया की कोई अलग राष्ट्रीय न्यूनतम उम्र सीमा लागू नहीं है।
हालांकि, बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सरकार और विभिन्न संस्थाओं की ओर से
जागरूकता तथा सुरक्षा उपायों पर जोर दिया जाता रहा है।
भारत में बड़ी संख्या में बच्चे स्मार्टफोन और इंटरनेट का
इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अभिभावकों के सामने चुनौती
यह है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह काटने के बजाय
उन्हें सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से इसका इस्तेमाल करना सिखाया जाए।
माता-पिता बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं?
बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहले परिवार में स्पष्ट नियम बनाए जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए सोने से पहले मोबाइल इस्तेमाल न करने का नियम बनाया जा सकता है।
खाने के समय फोन से दूरी रखी जा सकती है और बच्चों को रोजाना कुछ समय खेल, पढ़ाई,
परिवार तथा दोस्तों के साथ वास्तविक बातचीत के लिए दिया जा सकता है।
माता-पिता को सिर्फ बच्चों का स्क्रीन टाइम देखने के बजाय
यह भी समझना चाहिए कि वे ऑनलाइन क्या देख रहे हैं,
किन लोगों से बातचीत कर रहे हैं और किस तरह की सामग्री उनके सामने आ रही है।
बच्चे से बातचीत करते समय केवल डांटने के बजाय भरोसे का माहौल बनाना भी जरूरी है।
यदि बच्चा साइबर बुलिंग या किसी परेशान करने वाली
ऑनलाइन घटना का सामना करता है, तो उसे यह महसूस होना चाहिए कि
वह बिना डर के माता-पिता से बात कर सकता है।
क्या सोशल मीडिया पूरी तरह नुकसानदायक है?
सोशल मीडिया को पूरी तरह नुकसानदायक कहना सही नहीं होगा। सही उम्र और
उचित निगरानी के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों को सीखने,
जानकारी हासिल करने और सामाजिक संपर्क में मदद कर सकते हैं।
समस्या तब गंभीर हो सकती है जब सोशल मीडिया वास्तविक जीवन की गतिविधियों,
पढ़ाई, नींद, खेलकूद और परिवार के साथ बातचीत की
जगह लेने लगे। इसलिए लक्ष्य बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर करना नहीं,
बल्कि तकनीक के संतुलित और सुरक्षित इस्तेमाल की आदत विकसित करना होना चाहिए।
निष्कर्ष
टेक्नोलॉजी ने दुनिया को बदल दिया है, लेकिन बच्चों के मामले में इसका इस्तेमाल
सोच-समझकर करना जरूरी है। तकनीकी क्षेत्र के कई बड़े लोगों द्वारा अपने बच्चों के स्क्रीन और
सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित रखने की बातें इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाती हैं।
WHO के आंकड़े समस्याग्रस्त सोशल मीडिया इस्तेमाल और साइबर
बुलिंग को लेकर बढ़ती चिंता की ओर इशारा करते हैं। वहीं दुनिया के
कई देश बच्चों के लिए उम्र आधारित प्रतिबंधों पर आगे बढ़ रहे हैं।
भारत में भी बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को लेकर माता-पिता, स्कूल और समाज को
मिलकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। बच्चों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि तकनीक उनके
जीवन का हिस्सा बने, लेकिन उनका पूरा जीवन तकनीक के इर्द-गिर्द न घूमने लगे।
FAQ
1. टेक दिग्गज अपने बच्चों को सोशल मीडिया से दूर क्यों रखते हैं?
कई टेक दिग्गज बच्चों के स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया की आदत और
ऑनलाइन सामग्री के संभावित प्रभाव को लेकर सावधानी बरतते हैं। वे वास्तविक बातचीत,
खेल और अन्य गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय देने पर जोर देते हैं।
2. सोशल मीडिया का बच्चों पर क्या असर पड़ सकता है?
अत्यधिक या समस्याग्रस्त इस्तेमाल का संबंध नींद में परेशानी, चिंता, अवसाद के लक्षण,
ध्यान भटकने और साइबर बुलिंग जैसे जोखिमों से जोड़ा गया है। हालांकि हर
मामले में सोशल मीडिया को सीधे कारण के रूप में स्थापित नहीं किया गया है।
3. WHO के अनुसार समस्याग्रस्त सोशल मीडिया इस्तेमाल कितना बढ़ा है?
WHO के अध्ययन के अनुसार किशोरों में समस्याग्रस्त सोशल मीडिया इस्तेमाल 2018 के
7 प्रतिशत से बढ़कर 2022 में 11 प्रतिशत हो गया।
4. साइबर बुलिंग कितने बच्चों को प्रभावित कर रही है?
WHO के आंकड़ों के अनुसार 15 प्रतिशत किशोरों ने साइबर बुलिंग का शिकार होने की जानकारी दी।
5. क्या बच्चों को पूरी तरह सोशल मीडिया से दूर रखना चाहिए?
हर परिवार के लिए एक ही नियम जरूरी नहीं है। उम्र, बच्चे की समझ और परिस्थितियों के
अनुसार सीमाएं तय की जा सकती हैं। संतुलित इस्तेमाल और अभिभावकीय निगरानी महत्वपूर्ण है।
6. बच्चों के स्क्रीन टाइम को कैसे कम किया जा सकता है?
सोने से पहले स्क्रीन बंद करना, भोजन के समय फोन दूर रखना, रोजाना खेल और आउटडोर
गतिविधियों के लिए समय तय करना तथा परिवार के साथ बिना स्क्रीन समय बिताना उपयोगी हो सकता है।
7. भारत में बच्चों के लिए सोशल मीडिया की न्यूनतम उम्र क्या है?
भारत में अभी बच्चों के लिए सोशल मीडिया की कोई अलग राष्ट्रीय न्यूनतम उम्र सीमा लागू नहीं है।
8. माता-पिता को बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल में क्या देखना चाहिए?
माता-पिता को समय के साथ-साथ बच्चे द्वारा देखी जा रही सामग्री, ऑनलाइन संपर्क, साइबर बुलिंग,
नींद, पढ़ाई और व्यवहार में होने वाले बदलावों पर भी ध्यान देना चाहिए।
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