POK में चीन का बढ़ता निवेश: क्यों बढ़ रही है भारत की चिंता?
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) और गिलगित-बाल्टिस्तान पिछले कुछ वर्षों में चीन की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके हैं। चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (China-Pakistan Economic Corridor – CPEC) के तहत इस क्षेत्र में सड़क, पुल, सुरंग, ऊर्जा परियोजनाओं, फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क और अन्य बुनियादी ढांचे पर बड़े पैमाने पर काम किया जा रहा है। यह क्षेत्र चीन के शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने वाली रणनीतिक परियोजना का अहम हिस्सा है। भारत लगातार इन परियोजनाओं पर आपत्ति जताता रहा है क्योंकि भारत POK को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है।
CPEC क्या है?
चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का प्रमुख हिस्सा है। इस परियोजना का उद्देश्य चीन के शिनजियांग क्षेत्र को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ना है ताकि व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और परिवहन को अधिक तेज और प्रभावी बनाया जा सके।
CPEC के तहत सड़क, रेलवे, बिजली उत्पादन, औद्योगिक पार्क, डिजिटल कनेक्टिविटी और बंदरगाह विकास जैसी कई परियोजनाएं शामिल हैं।
अब तक कितना निवेश हुआ?
विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार CPEC के तहत पाकिस्तान में घोषित परियोजनाओं का कुल मूल्य लगभग 62 से 65 अरब अमेरिकी डॉलर के आसपास माना जाता है।
विश्लेषकों के अनुसार गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से जुड़े क्षेत्रों में लगभग 10 से 15 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परियोजनाएं विभिन्न चरणों में पूरी हो चुकी हैं, निर्माणाधीन हैं या प्रस्तावित हैं। अलग-अलग स्रोतों में यह अनुमान भिन्न हो सकता है।
किन परियोजनाओं पर हो रहा है काम?
POK और आसपास के क्षेत्रों में चीन जिन प्रमुख परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है, उनमें शामिल हैं—
- कराकोरम हाईवे का विस्तार और आधुनिकीकरण।
- नई सुरंगों और आधुनिक पुलों का निर्माण।
- जलविद्युत परियोजनाएं और बिजली उत्पादन संयंत्र।
- फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क और डिजिटल कनेक्टिविटी।
- सीमा क्षेत्रों में परिवहन और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास।
- व्यापार और माल परिवहन के लिए बेहतर सड़क नेटवर्क।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य पूरे वर्ष परिवहन को सुचारु बनाए रखना और चीन-पाकिस्तान व्यापार को मजबूत करना बताया जाता है।
रणनीतिक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है POK?
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान एशिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल हैं। यह क्षेत्र चीन, पाकिस्तान और भारत के बीच सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर सड़क और सुरंग नेटवर्क केवल व्यापार ही नहीं बल्कि आपातकालीन परिस्थितियों में रसद और आवागमन को भी आसान बना सकता है। इसी कारण इस क्षेत्र का सामरिक महत्व लगातार बढ़ रहा है।
भारत क्यों कर रहा है विरोध?
*भारत का स्पष्ट और लंबे समय से कायम आधिकारिक रुख है कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी शामिल है, भारत का अभिन्न हिस्सा है।
भारत का कहना है कि विवादित क्षेत्र में किसी तीसरे देश द्वारा किए जाने वाले बुनियादी ढांचा निवेश और परियोजनाएं उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करती हैं। नई दिल्ली ने कई अवसरों पर चीन और पाकिस्तान के समक्ष अपनी आपत्ति कूटनीतिक स्तर पर दर्ज कराई है।
स्थानीय स्तर पर भी उठे सवाल
हालांकि चीन और पाकिस्तान इन परियोजनाओं को विकास और रोजगार से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर कई संगठनों और निवासियों ने भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय प्रभाव, विस्थापन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर चिंताएं व्यक्त की हैं।
कुछ क्षेत्रों में स्थानीय लोगों ने बेहतर मुआवजे और पारदर्शिता की मांग भी उठाई है।
ऊर्जा परियोजनाओं पर विशेष फोकस
POK और गिलगित-बाल्टिस्तान में कई जलविद्युत परियोजनाओं पर कार्य किया जा रहा है। इनका उद्देश्य बिजली उत्पादन बढ़ाना और पाकिस्तान की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना है।
इन परियोजनाओं को पाकिस्तान की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है,
जबकि पर्यावरण विशेषज्ञ इनके दीर्घकालिक प्रभावों पर भी चर्चा करते रहे हैं।
भविष्य की संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में चीन इस क्षेत्र में परिवहन, ऊर्जा,
डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापारिक परियोजनाओं का विस्तार जारी रख सकता है। वहीं भारत इस पूरे
घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है और अपने आधिकारिक रुख पर कायम है।
भविष्य में इस क्षेत्र का विकास केवल आर्थिक नहीं बल्कि
दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति को भी प्रभावित कर सकता है।
निष्कर्ष
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन का बढ़ता निवेश केवल आर्थिक परियोजनाओं तक सीमित नहीं माना जा रहा,
बल्कि इसका रणनीतिक और कूटनीतिक महत्व भी काफी बड़ा है। CPEC के तहत अरबों डॉलर की
परियोजनाएं इस क्षेत्र का बुनियादी ढांचा बदल रही हैं, जबकि भारत लगातार इन परियोजनाओं पर
अपनी संप्रभुता से जुड़ी आपत्ति दर्ज कराता रहा है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र दक्षिण एशिया की
राजनीति और रणनीतिक समीकरणों का महत्वपूर्ण केंद्र बना रह सकता है।
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