सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अनधिकृत प्रसारण, पोस्टिंग और शेयरिंग पर अंतरिम रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब बिना पूर्व अनुमति के अदालत की कार्यवाही के वीडियो क्लिप निकालना, एडिट करना, पोस्ट करना, री-पोस्ट करना, अपलोड करना या उनका व्यावसायिक (Monetisation) उपयोग नहीं किया जा सकेगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि “न्यायालय 24×7 एंटरटेनमेंट चैनल नहीं बन सकता।”
बिना अनुमति कोर्ट की कार्यवाही पोस्ट करने पर रोक
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए कहा कि न्यायिक कार्यवाही के ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग को बिना संबंधित अदालत की अनुमति के सोशल मीडिया या किसी अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पोस्ट, री-पोस्ट, प्रसारित, एडिट, स्टोर, होस्ट या मोनेटाइज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी।
“अदालत मनोरंजन का माध्यम नहीं”
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालतों की कार्यवाही को सोशल मीडिया पर छोटे-छोटे क्लिप बनाकर वायरल करना न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को प्रभावित करता है। अदालत ने कहा कि न्यायालय का उद्देश्य न्याय देना है, न कि वह “24×7 एंटरटेनमेंट चैनल” बने। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि लाइव स्ट्रीमिंग व्यवस्था की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता हो सकती है।
एडिट किए गए क्लिप्स पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाल के समय में अदालत की लाइव स्ट्रीमिंग से वीडियो क्लिप निकालकर उन्हें संदर्भ से अलग (Out of Context) तरीके से सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जा रहा है। कई मामलों में वीडियो को एडिट कर सनसनीखेज प्रस्तुति दी जाती है, जिससे न्यायिक कार्यवाही का वास्तविक संदर्भ बदल जाता है और लोगों के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
समाचार रिपोर्टिंग पर नहीं पड़ेगा असर
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अंतरिम आदेश न्यायालय की कार्यवाही की समाचार रिपोर्टिंग पर रोक नहीं है। मीडिया संस्थान पहले की तरह अदालत की कार्यवाही की तथ्यात्मक रिपोर्टिंग कर सकेंगे। रोक केवल ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को बिना अनुमति सोशल मीडिया या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित करने, एडिट करने, अपलोड करने और मोनेटाइज करने पर लागू होगी।
सोशल मीडिया कंपनियों को भी निर्देश
अदालत ने सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म से अपेक्षा की है कि वे न्यायालय के आदेश का पालन सुनिश्चित करें। बिना अनुमति अदालत की कार्यवाही से जुड़े ऑडियो-वीडियो क्लिप साझा किए जाने पर संबंधित प्लेटफॉर्म भी आवश्यक कार्रवाई करेंगे। यह कदम न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने और सामग्री के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
यह आदेश उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आया जिसमें आरोप लगाया गया था कि
अदालतों की लाइव स्ट्रीमिंग से वीडियो क्लिप निकालकर
उन्हें एडिट किया जा रहा है, सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है और
कई मामलों में व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अदालत ने माना कि
इससे न्यायपालिका की छवि और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम आदेश लागू रहेगा। मामले की आगे भी सुनवाई होगी, जिसके बाद
अदालत विस्तृत दिशा-निर्देश या अंतिम आदेश जारी कर सकती है। इस बीच अदालत ने विभिन्न
उच्च न्यायालयों से लाइव स्ट्रीमिंग व्यवस्था के प्रभाव और उसके क्रियान्वयन पर रिपोर्ट भी मांगी है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश का उद्देश्य न्यायिक कार्यवाही की गरिमा बनाए रखना और
सोशल मीडिया पर अदालत की कार्यवाही के दुरुपयोग को रोकना है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि
इस आदेश से मीडिया की तथ्यात्मक समाचार रिपोर्टिंग प्रभावित नहीं होगी।
भविष्य में इस मामले पर आने वाला अंतिम निर्णय न्यायालयों की
लाइव स्ट्रीमिंग और डिजिटल प्रसारण से जुड़े नियमों की दिशा तय कर सकता है।
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