केजरीवाल-सिसोदिया को ‘डिस्चार्ज’ क्यों: अदालत ने CBI केस ठुकराया

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने 26 फरवरी 2026 को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को दिल्ली आबकारी नीति मामले में डिस्चार्ज कर दिया। अदालत ने CBI की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया क्योंकि कोई प्रथम दृष्टया अपराध या साजिश साबित नहीं हुई।

डिस्चार्ज vs बरी: मुख्य अंतर

डिस्चार्ज ट्रायल शुरू होने से पहले होता है जब अदालत को चार्ज फ्रेम करने के लिए पर्याप्त आधार नजर नहीं आता (सीआरपीसी धारा 227, 239)। बरी (एक्विटल) ट्रायल के बाद दोष सिद्ध न होने पर आता है, जबकि डिस्चार्ज केस को ही समाप्त कर देता है बिना सबूतों की जांच के। इस मामले में स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने 600 पेज के आदेश में कहा कि CBI का केस ‘ज्यूडिशियल स्क्रूटिनी’ में फेल हो गया।

अदालत ने क्या कहा: प्रमुख टिप्पणियां

अदालत ने पाया कि नीति निर्माण में कोई आपराधिक मंशा या व्यापक साजिश नहीं थी, केवल प्रशासनिक चर्चाएं थीं। CBI केस मुख्य रूप से अप्रोवर बयानों और अमान्य दस्तावेजों (जैसे पौती एंट्रीज) पर टिका था, जो कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं। जज ने जांच अधिकारी पर विभागीय जांच के आदेश दिए और LG द्वारा दी गई सैंक्शन पर सवाल उठाए।

केस का बैकग्राउंड

2021-22 दिल्ली एक्साइज पॉलिसी में कथित अनियमितताओं से 580 करोड़ का नुकसान बताकर CBI ने केस दर्ज किया।

‘साउथ ग्रुप’ को फायदा पहुंचाने के आरोप थे, लेकिन अदालत ने कहा कि कोई ठोस सबूत नहीं।

केजरीवाल ने फैसले पर भावुक होकर कहा कि यह सबसे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र

राजनीतिक प्रभाव

इस फैसले से AAP को बड़ी राहत मिली, पार्टी ने इसे

‘क्लीन चिट’ बताया। CBI ने दिल्ली HC में अपील की है।

वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, ‘डिस्चार्ज मतलब कोई केस ही नहीं बचा।’