400 रुपये महीने टैक्स देकर भी गंदा पानी
गोरखपुर शहर में नगर निगम द्वारा वाटर टैक्स वसूली तो जोर-शोर से हो रही है, लेकिन बदले में मिल रहा है गंदा और बदबूदार पानी। कई मोहल्लों में लोग 400 रुपये प्रतिमाह टैक्स भर रहे हैं, फिर भी नल से आने वाला पानी पीने लायक नहीं है। मजबूरी में परिवारों को 1200 रुपये महीने के हिसाब से मिनरल वाटर जार खरीदने पड़ रहे हैं। नगर निगम की जिम्मेदारी है कि टैक्स लेने वाले क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल की गारंटी दे, लेकिन पाइपलाइन की खराबी और मेंटेनेंस की अनदेखी से शिकायतें बढ़ती जा रही हैं। इस ब्लॉग में हम गोरखपुर की जल आपूर्ति समस्या, लोगों की परेशानी और समाधान की जरूरत पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
टैक्स भरने के बावजूद गंदा पानी: लोगों में आक्रोश
गोरखपुर नगर निगम कई वार्डों में घरों से प्रतिमाह 300-400 रुपये वाटर टैक्स वसूल रहा है। यह टैक्स पेयजल आपूर्ति के लिए लिया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। कई इलाकों जैसे राप्ती नगर, बशारतपुर, गोलघर, सिविल लाइंस और आसपास के मोहल्लों में नल का पानी पीला, बदबूदार और गंदा आ रहा है। लोग शिकायत करते हैं कि पानी में कीचड़ और जंग की मिलावट है, जिससे पीने से पेट दर्द, उल्टी और त्वचा रोग हो रहे हैं।
एक निवासी ने बताया, “400 रुपये टैक्स देते हैं, लेकिन पानी इतना गंदा कि नहाने में भी डर लगता है। मजबूरी में RO या मिनरल वाटर जार यूज करना पड़ रहा है। एक 20 लीटर जार 80-100 रुपये का आता है, महीने में 12-15 जार लग जाते हैं, यानी 1200 रुपये अतिरिक्त खर्च।” कई परिवारों की यही कहानी है। बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
नगर निगम की जिम्मेदारी: शुद्ध पानी की गारंटी क्यों नहीं?
नगर निगम अधिनियम के अनुसार, जिन क्षेत्रों में वाटर टैक्स वसूला जा रहा है, वहां शुद्ध और नियमित पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना निगम की प्राथमिक जिम्मेदारी है। अगर पाइपलाइन में लीकेज, जंग या सीवेज मिक्सिंग की समस्या है तो तत्काल सुधार करना चाहिए। लेकिन गोरखपुर में पुरानी पाइपलाइनें जर्जर हो चुकी हैं। कई जगहों पर सीवर लाइन और वाटर लाइन एक साथ हैं, जिससे प्रदूषण हो रहा है।
शिकायतों पर निगम का रवैया उदासीन है। हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करने पर जवाब मिलता है “टीम भेजी जाएगी”, लेकिन हफ्तों बीत जाते हैं। कुछ वार्डों में तो महीनों से पानी की सप्लाई अनियमित है। जल निगम और नगर निगम के बीच समन्वय की कमी भी बड़ी समस्या है।
स्वास्थ्य पर असर और आर्थिक बोझ
गंदे पानी से जलजनित बीमारियां जैसे डायरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस और स्किन इंफेक्शन बढ़ रहे हैं। अस्पतालों में मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। मध्यम वर्गीय परिवारों पर दोहरा बोझ है – टैक्स भी दें और शुद्ध पानी अलग से खरीदें।
निचले आय वर्ग के लोग मजबूरी में गंदा पानी ही पी रहे हैं, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।
महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। खाना बनाने,
बर्तन धोने से लेकर कपड़े धोने तक सब गंदे पानी से करना पड़ रहा है।
कई सोसाइटियों ने प्राइवेट टैंकर मंगवाने शुरू कर दिए हैं, जो और महंगा पड़ता है।
समाधान की दिशा में क्या हो रहा है?
नगर निगम ने अमृत योजना के तहत नई पाइपलाइन बिछाने का दावा किया है, लेकिन काम धीमा है।
कुछ क्षेत्रों में ओवरहेड टैंक और फिल्ट्रेशन प्लांट का निर्माण प्रस्तावित है।
पार्षदों और स्थानीय नेताओं ने इस मुद्दे को उठाया है, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
लोगों की मांग है:
- पुरानी पाइपलाइन तत्काल बदली जाए।
- पानी की नियमित टेस्टिंग और क्लोरिनेशन हो।
- शिकायतों का 48 घंटे में निस्तारण।
- गंदे पानी की सप्लाई वाले क्षेत्रों से टैक्स माफ किया जाए।
शुद्ध पेयजल अधिकार है, सुविधा नहीं
गोरखपुर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में पेयजल संकट गंभीर समस्या बन चुका है।
टैक्स लेकर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना ठीक नहीं। नगर निगम को तुरंत एक्शन लेना चाहिए।
जनप्रतिनिधि और नागरिक मिलकर दबाव बनाएं तो बदलाव संभव है।
शुद्ध पानी हर नागरिक का अधिकार है। उम्मीद है जल्द हालात सुधरेंगे।
