Lucknow में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। शहर के दो नामी निजी स्कूलों पर आरोप लगा है कि उन्होंने अभिभावकों को बेहद महंगी किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया। शिकायत के अनुसार बाजार में केवल ₹65 में मिलने वाली किताब स्कूल के माध्यम से करीब ₹700 में बेची गई। मामला सामने आते ही अभिभावकों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है और अब शिक्षा विभाग ने जांच शुरू कर दी है।
अभिभावकों ने स्कूलों पर लगाए गंभीर आरोप
अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रशासन ने केवल तय दुकानों से ही किताबें खरीदने का दबाव बनाया। कई पैरेंट्स का आरोप है कि यदि वे बाहर से किताबें खरीदने की कोशिश करते थे तो उन्हें अलग-अलग कारण बताकर मना कर दिया जाता था। इससे परिवारों को मजबूरी में महंगे दामों पर किताबें खरीदनी पड़ीं।
कुछ अभिभावकों ने दावा किया कि हर साल किताबों के एडिशन बदल दिए जाते हैं ताकि पुराने सेट इस्तेमाल न हो सकें और नई किताबें खरीदना अनिवार्य बन जाए। इससे मध्यम वर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है।
शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर उठे सवाल
यह मामला सामने आने के बाद निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। लोगों का कहना है कि शिक्षा अब सेवा नहीं बल्कि बड़ा कारोबार बनती जा रही है। फीस, यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट और अब किताबों के नाम पर भी भारी मुनाफाखोरी की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई निजी स्कूल बुक सेलर्स के साथ मिलकर तय दुकानों से खरीदारी कराने का दबाव बनाते हैं। इससे अभिभावकों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता और उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।
जांच में जुटा शिक्षा विभाग
मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा विभाग ने जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों ने कहा है कि यदि आरोप सही पाए गए तो संबंधित स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। विभाग यह भी जांच कर रहा है कि कहीं स्कूलों और बुक विक्रेताओं के बीच कमीशन का खेल तो नहीं चल रहा था।
सूत्रों के अनुसार जांच टीम किताबों की वास्तविक कीमत, बिल, सप्लाई रिकॉर्ड और खरीद प्रक्रिया की पड़ताल कर रही है। कई अभिभावकों के बयान भी दर्ज किए जा सकते हैं। यदि गड़बड़ी साबित होती है तो संबंधित संस्थानों पर जुर्माना और मान्यता संबंधी कार्रवाई भी हो सकती है।
सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ मामला
जैसे ही यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया।
कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले संस्थान
आखिर पढ़ाई के नाम पर अभिभावकों से इतनी बड़ी रकम कैसे वसूल सकते हैं।
कुछ लोगों ने इसे “एजुकेशन माफिया” तक करार दिया। वहीं कई अभिभावकों ने अपनी
पुरानी शिकायतें भी सोशल मीडिया पर साझा कीं। लोगों का कहना है कि किताबों और
यूनिफॉर्म में मनमानी लंबे समय से चल रही है लेकिन अब इस मुद्दे ने बड़ा रूप ले लिया है।
#अभिभावकों की मांग- दोषियों पर हो सख्त कार्रवाई
अभिभावकों ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और
दोषी पाए जाने वाले स्कूलों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
साथ ही किताबों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नई गाइडलाइन लागू की जाए ताकि
भविष्य में किसी भी परिवार को ऐसी परेशानी का सामना न करना पड़े।
अभिभावकों का कहना है कि पहले ही बच्चों की पढ़ाई का खर्च लगातार बढ़ रहा है।
ऐसे में किताबों में भारी मुनाफाखोरी आम लोगों की कमर तोड़ रही है।
पूरे प्रदेश में बढ़ सकती है जांच
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल दो स्कूलों तक सीमित नहीं है।
उत्तर प्रदेश के कई निजी स्कूलों में किताबों और
यूनिफॉर्म को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं। अब यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो
प्रदेशभर में निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली की जांच तेज हो सकती है।
लखनऊ में ₹65 की किताब ₹700 में बेचने के आरोप ने शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर
गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभिभावकों की नाराजगी लगातार बढ़ रही है और अब सभी की
नजर शिक्षा विभाग की जांच पर टिकी हुई है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि दोषियों पर
सख्त कार्रवाई होगी और भविष्य में शिक्षा के नाम पर होने वाली मुनाफाखोरी पर रोक लगेगी।
