नई दिल्ली। देश में दवाओं की कीमतों और मरीजों पर इलाज के बढ़ते खर्च को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से गंभीर सवाल किए हैं। अदालत ने दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और खुदरा विक्रेताओं को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताते हुए पूछा कि पूरा सिस्टम दवा निर्माताओं को फायदा पहुंचाने की दिशा में क्यों काम कर रहा है। अदालत का कहना था कि दवाओं की कीमत तय करने वाली व्यवस्था में मरीजों के हितों और सस्ती चिकित्सा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
27 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाए। अदालत ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की प्रभावशीलता पर भी चिंता जताई। सुनवाई के बाद पीठ ने संबंधित याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
MRP और रिटेलर कीमत के बीच भारी अंतर पर अदालत की चिंता
दवाओं की कीमतों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसी दवा को खुदरा विक्रेता जिस कीमत पर खरीदता है, उसके पैकेट पर उससे कई गुना अधिक MRP क्यों दर्ज हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी अंतर को लेकर केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने ऐसे उदाहरण भी रखे गए, जिनमें किसी दवा की खुदरा विक्रेता के लिए कीमत और मरीज से ली जाने वाली कीमत में बहुत बड़ा अंतर था। एक उदाहरण में कैंसर की दवा की खुदरा विक्रेता के लिए कीमत लगभग 2,700 रुपये और MRP करीब 27,000 रुपये बताई गई थी। अदालत ने पूछा कि इतनी बड़ी कीमत के अंतर का औचित्य क्या है और इससे किसे लाभ मिलता है।
दवाओं की आपूर्ति की प्रक्रिया में निर्माता, वितरक, स्टॉकिस्ट, खुदरा विक्रेता और अस्पताल जैसी कई कड़ियां शामिल हो सकती हैं। भंडारण, परिवहन और वितरण की लागत भी होती है। इसलिए MRP और खरीद मूल्य का पूरा अंतर किसी एक पक्ष का शुद्ध मुनाफा नहीं माना जा सकता। फिर भी, जब अंतर बहुत अधिक हो और मरीज को कीमत का उचित आधार समझ न आए, तो मूल्य निर्धारण व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अदालत की चिंता यही थी कि दवाओं की कीमत तय करने की प्रक्रिया में मरीजों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा होनी चाहिए और अत्यधिक कीमतों को लेकर प्रभावी निगरानी होनी चाहिए।
केंद्र सरकार और NPPA की भूमिका पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण रखने वाली व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए। अदालत ने NPPA की कार्यप्रणाली पर भी तीखी टिप्पणी की और पूछा कि जब कीमतों में इतना बड़ा अंतर सामने आ रहा है, तो निगरानी व्यवस्था इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रही है।
NPPA का प्रमुख कार्य दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने और निर्धारित नियमों के पालन की निगरानी से जुड़ा है। इसके अधिकारों और जिम्मेदारियों का आधार औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) और संबंधित सरकारी प्रावधान हैं।
सभी दवाओं की कीमतें एक समान तरीके से नियंत्रित नहीं होतीं। कुछ दवाएं निर्धारित मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं, जबकि अन्य दवाओं के शुरुआती मूल्य तय करने में निर्माताओं को अधिक स्वतंत्रता मिलती है। गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी पर भी नियम लागू होते हैं, लेकिन उनकी कीमतें तय करने की व्यवस्था शेड्यूल्ड दवाओं से अलग है।
यही अंतर मौजूदा विवाद का एक प्रमुख कारण है। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या दवाओं के व्यापारिक मार्जिन पर अधिक व्यापक नियंत्रण होना चाहिए, ताकि मरीजों को अनावश्यक रूप से अधिक कीमत न चुकानी पड़े।
क्या सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत का मार्जिन लागू हो सकता है?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों में व्यापारिक मार्जिन को सीमित करने के विकल्प पर भी सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि जिन दवाओं की कीमत निर्धारित करने की व्यवस्था में खुदरा विक्रेता का 16 प्रतिशत मार्जिन शामिल होता है, उसी तरह का मानदंड दूसरी दवाओं पर लागू करने की संभावना क्यों नहीं देखी जा सकती।
यहां यह समझना जरूरी है कि 16 प्रतिशत का आंकड़ा अदालत द्वारा उठाया गया सवाल और मूल्य निर्धारण के मौजूदा ढांचे से जुड़ा मुद्दा है। इसे सभी दवाओं पर लागू हो चुका नया नियम नहीं माना जाना चाहिए। व्यापक मार्जिन सीमा लागू करने के लिए सरकार की नीति, संबंधित नियमों और अदालत के अंतिम आदेश का इंतजार करना होगा।
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि भारत में दवाओं की कीमतें कई देशों की तुलना में कम हैं और नीति बनाते समय पूरे औषधि क्षेत्र को ध्यान में रखना पड़ता है। अदालत ने इसके जवाब में मरीजों की आर्थिक स्थिति और सस्ती चिकित्सा की जरूरत को महत्व देने पर जोर दिया।
दवा की कीमत का सवाल केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक इलाज कराने वाले मरीजों, कैंसर रोगियों और नियमित दवाएं लेने वाले परिवारों के लिए कीमत में छोटा अंतर भी बड़ा आर्थिक बोझ बन सकता है। इसलिए मूल्य नियंत्रण और मरीजों की पहुंच के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है।
भारत में दवाओं की कीमत और इलाज का आर्थिक बोझ
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च कई परिवारों के लिए बड़ी चुनौती है। विशेष रूप से लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में दवाओं की नियमित खरीद, जांच, अस्पताल में भर्ती और अन्य चिकित्सा सेवाओं पर खर्च बढ़ जाता है।
इस संदर्भ में एक जरूरी तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है: उपलब्ध रिपोर्टों में लगभग
17 प्रतिशत दवाओं के शेड्यूल्ड श्रेणी में होने का उल्लेख किया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि
भारत में इलाज के कुल खर्च का 17 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर ही खर्च होता है।
दवाओं की श्रेणी और स्वास्थ्य खर्च में दवाओं की हिस्सेदारी दो अलग-अलग आंकड़े हैं।
शेड्यूल्ड दवाओं के लिए सरकार मूल्य नियंत्रण के तहत अधिकतम कीमत निर्धारित कर सकती है।
दूसरी ओर, गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण का तरीका अलग है।
इस वजह से दवाओं की कीमतों और व्यापारिक मार्जिन पर एक समान व्यवस्था लागू करने की मांग चर्चा में है।
यदि दवाओं की कीमतों में अधिक पारदर्शिता आती है और अनुचित मार्जिन पर
प्रभावी नियंत्रण होता है, तो मरीजों को उपचार की लागत समझने और
दवाओं की कीमतों की तुलना करने में मदद मिल सकती है। हालांकि,
वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और नियामक संस्थाएं क्या कदम उठाती हैं।
मरीजों को राहत देने के लिए आगे क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने दवाओं की कीमतों और मरीजों के हितों से जुड़े
कई सवाल सामने रखे हैं। आगे की नीति में इन बिंदुओं पर ध्यान दिया जा सकता है:
- कीमतों में पारदर्शिता: दवाओं के MRP, खुदरा खरीद मूल्य और लागू मूल्य सीमा की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराना।
- व्यापारिक मार्जिन की समीक्षा: यह जांचना कि अलग-अलग दवाओं और
- चिकित्सा उत्पादों पर मार्जिन को किस तरह नियंत्रित किया जा सकता है।
- नियामक निगरानी मजबूत करना: NPPA और संबंधित एजेंसियों की निगरानी व्यवस्था को प्रभावी बनाना।
- मरीजों के हितों की सुरक्षा: आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं को उचित कीमत पर उपलब्ध कराने के उपाय करना।
- नियमों का प्रभावी पालन: जहां कीमत संबंधी नियमों का उल्लंघन हो, वहां लागू कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करना।
अदालत ने संबंधित मामलों में फैसला सुरक्षित रखा है। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि
सभी दवाओं पर एक समान मार्जिन सीमा लागू कर दी गई है या
दवाओं की कीमतों में तत्काल कमी का आदेश जारी हो चुका है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं के MRP और खुदरा विक्रेता की कीमत के बीच बड़े
अंतर पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत के सवालों का केंद्र यह है कि दवाओं की
मूल्य निर्धारण व्यवस्था मरीजों के हितों की पर्याप्त रक्षा कर रही है या नहीं।
अब आगे की नजर अदालत के फैसले और केंद्र सरकार के संभावित कदमों पर रहेगी।
यदि मूल्य नियंत्रण और निगरानी व्यवस्था में प्रभावी सुधार किए जाते हैं, तो दवाओं की कीमतों में
पारदर्शिता बढ़ाने और मरीजों पर आर्थिक बोझ कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों पर क्या सवाल उठाए?
अदालत ने MRP और खुदरा विक्रेता को मिलने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठाया और
पूछा कि मौजूदा व्यवस्था दवा निर्माताओं को अधिक फायदा पहुंचाने वाली क्यों दिखाई देती है।
2. MRP और PTR में क्या अंतर है?
MRP वह अधिकतम खुदरा कीमत है जो दवा के पैकेट पर अंकित होती है।
PTR यानी Price to Retailer वह कीमत है जिस पर खुदरा विक्रेता दवा खरीदता है।
3. NPPA क्या काम करता है?
NPPA दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने और संबंधित मूल्य निर्धारण नियमों के पालन की निगरानी करने वाला प्राधिकरण है।
4. क्या सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत मार्जिन लागू हो गया है?
नहीं। अदालत ने इस तरह की व्यवस्था की संभावना पर सवाल उठाया है। सभी दवाओं पर समान
मार्जिन सीमा लागू होने की पुष्टि के लिए आधिकारिक आदेश या नियम में बदलाव जरूरी होगा।
5. क्या दवाओं की कीमतें तुरंत कम होंगी?
अभी इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती। कीमतों में बदलाव सरकार की नीति, नियामक निर्णयों और
अदालत के अंतिम आदेश पर निर्भर करेगा।
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