Lucknow KGMU News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कथित धर्मांतरण, महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों के उत्पीड़न तथा धमकी देने के गंभीर मामले ने नया मोड़ ले लिया है। उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच रिपोर्ट में एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि संस्थान में कुछ महिला डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और संविदा कर्मचारियों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
इस मामले में राज्य सरकार ने केजीएमयू प्रशासन को जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। शासन की ओर से 30 अक्टूबर 2026 को इस संबंध में पत्र जारी किया गया था। अब विश्वविद्यालय प्रशासन ने 6 नवंबर को कार्यपरिषद की बैठक बुलाने की तैयारी की है, जिसमें एसटीएफ की रिपोर्ट रखी जाएगी।
इस घटनाक्रम ने प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में से एक की आंतरिक व्यवस्था, महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
KGMU धर्मांतरण मामला क्या है? STF की जांच में सामने आई शिकायतें
लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में कथित धर्मांतरण और उत्पीड़न का मामला पिछले वर्ष सामने आया था। दिसंबर 2025 में संस्थान के पैथोलॉजी विभाग से जुड़े एक जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर के खिलाफ शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि एक महिला डॉक्टर को संबंधों के माध्यम से प्रभावित कर धर्मांतरण और विवाह के लिए दबाव बनाया गया।
इसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन ने उत्तर प्रदेश एसटीएफ को जांच सौंपी। एसटीएफ ने लगभग छह से सात महीने तक मामले की पड़ताल की। जांच के दौरान तकनीकी साक्ष्य, सर्विलांस से मिली जानकारियां, पीड़िताओं के बयान और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की गई।
एसटीएफ की रिपोर्ट में केवल एक व्यक्ति तक मामला सीमित नहीं बताया गया, बल्कि संस्थान के अलग-अलग विभागों से जुड़े डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
रिपोर्ट में महिला रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सिंग कर्मचारियों और संविदा पर काम करने वाली महिला कर्मचारियों की शिकायतों का उल्लेख किया गया है। आरोपों में अनुचित व्यवहार, मानसिक उत्पीड़न, दबाव बनाने और धर्म परिवर्तन के लिए कथित तौर पर मजबूर करने जैसी बातें शामिल हैं।
जांच रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया है कि जब कुछ महिलाओं ने अपनी शिकायतें अधिकारियों तक पहुंचाईं, तब उनकी समस्याओं का उचित समाधान क्यों नहीं हुआ।
पीड़िताओं को धमकाने और शिकायत दबाने के भी आरोप
एसटीएफ की रिपोर्ट में कुछ मामलों में शिकायत करने वाली महिलाओं को डराने और उन पर दबाव बनाने के आरोप भी सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ महिला कर्मचारियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार के खिलाफ शिकायत की थी, लेकिन कथित तौर पर उनकी शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
जांच में एक संविदा पर कार्यरत महिला कर्मचारी का मामला भी सामने आया। आरोप है कि संबंधित विभाग के एक वरिष्ठ कर्मचारी ने उसका पीछा किया और अनुचित व्यवहार किया। महिला ने विभागीय स्तर पर शिकायत की, लेकिन कार्रवाई होने के बजाय उसका संविदा अनुबंध समाप्त किए जाने का आरोप लगाया गया।
इसी तरह कुछ महिला रेजिडेंट डॉक्टरों ने भी अपने वरिष्ठों और सहकर्मियों के खिलाफ मानसिक दबाव, धमकी और अनुचित व्यवहार की शिकायतें कीं। रिपोर्ट में आरोप है कि कुछ मामलों में महिलाओं को उनके करियर और परीक्षाओं को प्रभावित करने की धमकी दी गई।
एसटीएफ ने यह भी जांचा कि शिकायतों के बाद विश्वविद्यालय के विभागीय स्तर पर क्या कदम उठाए गए थे। रिपोर्ट में संस्थान की आंतरिक शिकायत निवारण व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं।
हालांकि, इन सभी आरोपों पर संबंधित व्यक्तियों का पक्ष और विभागीय जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है। किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी सक्षम जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही निर्धारित होगी।
एरा मेडिकल कॉलेज से जुड़े तार, पुराने प्रशासनिक फैसले भी जांच के घेरे में
इस मामले में एसटीएफ की रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू एरा मेडिकल कॉलेज से कथित संबंधों को लेकर है। जांच रिपोर्ट में केजीएमयू के कुछ डॉक्टरों के निजी मेडिकल संस्थान में आर्थिक निवेश का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट में एरा मेडिकल कॉलेज से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी की पूर्व प्रशासनिक भूमिका का भी जिक्र किया गया है। बताया गया है कि संबंधित व्यक्ति पहले केजीएमयू के मेडिसिन विभाग में विभागाध्यक्ष रह चुके हैं।
एसटीएफ की रिपोर्ट में वर्ष 2006 से 2012 के बीच हुई कथित घटनाओं का भी उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान सामने आए कुछ मामलों और उस समय की
प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संबंधों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
इसके अलावा विश्वविद्यालय में शिकायतों की जांच के लिए कमेटियां गठित करने की
प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि जांच समितियों के गठन में
विभागीय प्रभाव के कारण उनकी निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका थी।
इस पहलू की स्वतंत्र विभागीय जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि
शिकायतों के निस्तारण में कहीं प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही या पक्षपात तो नहीं हुआ।
यह मामला अब केवल व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि विश्वविद्यालय की
प्रशासनिक जवाबदेही और कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों की सुरक्षा से भी जुड़ गया है।
6 नवंबर को KGMU की कार्यपरिषद की बैठक, अब होगी आगे की कार्रवाई
एसटीएफ की रिपोर्ट शासन को सौंपे जाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने केजीएमयू प्रशासन को
कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से 30 अक्टूबर 2026 को जारी पत्र में संबंधित
डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ केजीएमयू अधिनियम 2002 तथा
विश्वविद्यालय के नियमों के तहत आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।
शासन ने विश्वविद्यालय से कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट यानी Action Taken Report (ATR) भी मांगी है।
केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह के अनुसार, 6 नवंबर को विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक प्रस्तावित है।
इसमें एसटीएफ की रिपोर्ट रखी जाएगी और संबंधित डॉक्टरों तथा अन्य कर्मचारियों के खिलाफ
अलग-अलग अनुशासनात्मक जांच समितियां गठित करने का प्रस्ताव रखा जाएगा।
इसके बाद आरोपों की विभागीय स्तर पर जांच की जाएगी और तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि एसटीएफ की रिपोर्ट में नाम आने मात्र से
किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। संबंधित व्यक्तियों को
अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना और निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।
अब इस मामले में तीन महत्वपूर्ण सवालों के जवाब सामने आने बाकी हैं।
पहला, शिकायतों के बावजूद पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई? दूसरा, क्या प्रशासनिक अधिकारियों की
भूमिका की भी अलग से जांच होगी? तीसरा, विभागीय जांच के बाद दोषी
पाए जाने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाएगी?
निष्कर्ष: लखनऊ के KGMU में कथित धर्मांतरण, उत्पीड़न और धमकी से जुड़े मामले ने
चिकित्सा संस्थानों में महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
एसटीएफ की रिपोर्ट के बाद शासन ने कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अब 6 नवंबर की
कार्यपरिषद की बैठक और उसके बाद होने वाली विभागीय जांच पर सभी की नजर रहेगी।
निष्पक्ष जांच और पीड़िताओं को न्याय मिलना इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण है।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1. KGMU धर्मांतरण मामला किस शहर का है?
यह मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से जुड़ा है।
Q2. KGMU मामले की जांच किस एजेंसी ने की है?
उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने मामले की जांच की और शासन को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
Q3. एसटीएफ की रिपोर्ट में कितने डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका का उल्लेख है?
रिपोर्ट में एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
Q4. KGMU की कार्यपरिषद की बैठक कब होगी?
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, 6 नवंबर 2026 को कार्यपरिषद की बैठक प्रस्तावित है।
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