राकेश शर्मा की रिपोर्ट
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश | 1 नवंबर 2026
गोरखपुर के चिल्लूपार (रतनपुर) विद्युत उपकेंद्र की निर्माण व्यवस्था और संचालन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। घाघरा नदी के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में बने इस उपकेंद्र को लेकर स्थानीय उपभोक्ता लंबे समय से परेशान हैं। 22 गांवों की बिजली आपूर्ति इससे जुड़ी है, लेकिन तकनीकी समस्याओं के कारण लोगों को बार-बार बिजली संकट का सामना करना पड़ता है।
मुख्य समाचार
गोरखपुर। बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों में निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाए गए विद्युत उपकेंद्र चिल्लूपार (रतनपुर) की कहानी सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, तकनीकी नियोजन और विभागीय जवाबदेही पर कई सवाल खड़े करती है। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार, समाजवादी पार्टी शासनकाल में करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित यह विद्युत उपकेंद्र शुरुआत से ही तकनीकी और भौगोलिक समस्याओं से घिरा रहा है। उपभोक्ताओं का आरोप है कि गलत स्थान चयन और निर्माण संबंधी खामियों के कारण आज भी उन्हें नियमित बिजली आपूर्ति का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
घाघरा नदी के डूब क्षेत्र में बनाया गया विद्युत उपकेंद्र
सबसे बड़ा सवाल विद्युत उपकेंद्र के स्थान चयन को लेकर उठ रहा है। चिल्लूपार के नाम से निर्मित इस उपकेंद्र को उसके मूल क्षेत्र से लगभग 40 किलोमीटर दूर विकासखंड बेलघाट की ग्राम सभा रतनपुर में स्थापित किया गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक, जिस स्थान पर इसका निर्माण कराया गया है, वह घाघरा नदी का बाढ़ प्रभावित और डूब क्षेत्र है।
गोरखपुर के रतनपुर स्थित चिल्लूपार विद्युत उपकेंद्
ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में विद्युत उपकेंद्र का निर्माण कराने के निर्णय पर सवाल उठाए जा रहे हैं। बरसात और बाढ़ के मौसम में इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां बिजली व्यवस्था के संचालन के लिए चुनौती पैदा करती हैं। उपभोक्ताओं का कहना है कि उपकेंद्र का निर्माण शुरू करने से पहले स्थान की भौगोलिक स्थिति, बाढ़ की आशंका और भविष्य में होने वाली तकनीकी समस्याओं का गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए था।
33 हजार वोल्ट की लाइन में भी गंभीर तकनीकी समस्या
इस विद्युत उपकेंद्र तक बिजली पहुंचाने के लिए लगभग 40 किलोमीटर दूर बड़हलगंज से 33 हजार वोल्ट की विद्युत लाइन लाई गई है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस लाइन में एक पोल से दूसरे पोल के बीच की दूरी लगभग 80 से 90 मीटर रखी गई है।
उपभोक्ताओं का दावा है कि निर्धारित तकनीकी मानकों की तुलना में पोल के बीच अधिक दूरी होने से लाइन की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। तेज हवा, खराब मौसम और अन्य परिस्थितियों में लाइन में खराबी आने की आशंका बनी रहती है। इसका सीधा असर विद्युत आपूर्ति पर पड़ता है।
बिजली आपूर्ति की समस्या।
हालांकि, पोल के बीच निर्धारित दूरी का वास्तविक मानक संबंधित लाइन की तकनीकी डिजाइन, वोल्टेज, कंडक्टर और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए इस मामले में विद्युत विभाग की तकनीकी जांच और निरीक्षण रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी।
2014 में तकनीकी टीम ने संचालन योग्य नहीं माना था उपकेंद्र
चिल्लूपार (रतनपुर) विद्युत उपकेंद्र वर्ष 2014 में बनकर तैयार हो गया था। लेकिन निर्माण पूरा होने के बाद जब इसे चालू करने की तैयारी हुई, तब लखनऊ से आई तकनीकी टीम ने निरीक्षण के दौरान इसे संचालन योग्य नहीं माना था।
बताया जाता है कि तकनीकी टीम की आपत्तियों के चलते उपकेंद्र का नियमित संचालन शुरू नहीं हो सका। परिणामस्वरूप करोड़ों रुपये की लागत से तैयार भवन और विद्युत उपकरण लंबे समय तक उपयोग से बाहर रहे।
भ्रष्टाचार, तकनीकी मानकों के उल्लंघन
करीब सात वर्षों तक यह उपकेंद्र अपनी पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पाया। इस दौरान रतनपुर गांव की बिजली आपूर्ति कभी-कभी इसी उपकेंद्र से संचालित होती थी, जबकि आसपास के उपभोक्ताओं को दूसरे विद्युत उपकेंद्रों पर निर्भर रहना पड़ता था।
यह स्थिति सरकारी धन के उपयोग, निर्माण की गुणवत्ता और योजना तैयार करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
2022 में तत्कालीन अधीक्षण अभियंता ने शुरू कराया संचाल
नवर्ष 2022 में धुरियापार विद्युत उपकेंद्र के निरीक्षण के लिए पहुंचे तत्कालीन अधीक्षण अभियंता रमेश श्रीवास्तव ने चिल्लूपार उपकेंद्र के संचालन की दिशा में पहल की।
बताया जाता है कि धुरियापार उपकेंद्र के अहिरौली फीडर पर उपभोक्ताओं का लोड अधिक होने के कारण बिजली आपूर्ति प्रभावित हो रही थी। इस समस्या को कम करने के लिए चिल्लूपार (रतनपुर) उपकेंद्र को चालू कराने की व्यवस्था की गई।
इसके तहत धुरियापार उपकेंद्र से जुड़े लगभग 10 से 12 गांवों के उपभोक्ताओं को हटाकर चिल्लूपार उपकेंद्र से जोड़ दिया गया। इससे धुरियापार उपकेंद्र पर बिजली का लोड कम करने और संबंधित गांवों को बिजली आपूर्ति उपलब्ध कराने की कोशिश की गई।
इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक व्यवस्था भी बनाई गई थी। इसके अनुसार, यदि चिल्लूपार की 33 हजार वोल्ट की लाइन में खराबी आती है तो तत्काल धुरियापार उपकेंद्र से टैपिंग के माध्यम से बिजली आपूर्ति बहाल की जा सकती थी।
बैकअप व्यवस्था हटने से बढ़ी उपभोक्ताओं की परेशानी
स्थानीय लोगों के अनुसार, बाद में धुरियापार उपकेंद्र से लगभग 10 और गांवों को हटाकर चिल्लूपार (रतनपुर) उपकेंद्र से जोड़ दिया गया। इस प्रकार इस उपकेंद्र से जुड़े गांवों और उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ गई।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह रही कि चिल्लूपार की 33 हजार वोल्ट की लाइन खराब होने पर धुरियापार उपकेंद्र से तत्काल बिजली आपूर्ति बहाल करने वाली टैपिंग व्यवस्था हटा दी गई।
इसका नतीजा यह हुआ कि जब भी बड़हलगंज से आने वाली लंबी 33 हजार वोल्ट की लाइन में खराबी आती है, तो चिल्लूपार उपकेंद्र से जुड़े उपभोक्ताओं को कई घंटों तक बिजली के बिना रहना पड़ता है।
स्थानीय उपभोक्ताओं का कहना है कि कई बार लाइन में खराबी ठीक होने में 8 से 12 घंटे तक का समय लग जाता है।
जब संबंधित लाइन की मरम्मत में अधिक समय लगता है।
धुरियापार से वैकल्पिक टैपिंग की व्यवस्था की जाती है। इससे लोगों को अनावश्यक परेशानी उठानी पड़ती है।
22 गांवों के उपभोक्ताओं ने स्थायी समाधान की उठाई मांग
चिल्लूपार (रतनपुर) विद्युत उपकेंद्र से जुड़े लगभग 22 गांवों के उपभोक्ताओं का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं है।
उनका मानना है कि जब तक उपकेंद्र को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से हटाकर सुरक्षित स्थान पर स्थापित नह किया जाए।
बिजली आपूर्ति के लिए बेहतर तकनीकी व्यवस्था नहीं बनाई जाती, तब तक समस्या बनी रहेगी।
उपभोक्ताओं ने मांग की है कि उपकेंद्र को घाघरा नदी के डूब क्षेत्र से हटाकर किसी सुरक्षित स्थान पर शिप्ट कराई जा।
उपयुक्त स्थान पर स्थापित करने की संभावना की जांच कराई जाए।
इसके साथ ही पास के विद्युत उपकेंद्र डेहरी भार से आने वाली 33 हजार वोल्ट की लाइन है ।
इसे जोड़ने की तकनीकी व्यवहार्यता का भी परीक्षण किया जाए।
लोगों का कहना है कि यदि पास के विद्युत केंद्र से बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध हो जाती है।
लगभग 40 किलोमीटर दूर बड़हलगंज से आने वाली लंबी लाइन पर निर्भरता कम हो सकती है।
हालांकि, इसके लिए विभागीय सर्वे और तकनीकी स्वीकृति जरूरी होगी।
यह मामला केवल बिजली कटौती तक सीमित नहीं है,
बल्कि सार्वजनिक धन से तैयार की गई एक महत्वपूर्ण परियोजना की उपयोगिता और उसके संचालन की गुणवत्ता से भी जुड़ा हुआ है। अब देखना यह है कि विद्युत विभाग इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए जांच और सुधार की दिशा में क्या कदम उठाता है।
उपभोक्ताओं की प्रमुख मांगें
चिल्लूपार (रतनपुर) उपकेंद्र से जुड़े उपभोक्ताओं ने विद्युत विभाग और संबंधित अधिकारियों से निम्नलिखित मांगें उठाई हैं:
- 1 घाघरा नदी के डूब क्षेत्र में बने उपकेंद्र की तकनीकी और भौगोलिक जांच कराई जाए।
- 2 उपकेंद्र को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की संभावनाओं का परीक्षण हो।
- 3 33 हजार वोल्ट की लाइन और पोलों के बीच की दूरी की तकनीकी जांच कराई जाए।
- 4 डेहरी भार विद्युत उपकेंद्र से वैकल्पिक लाइन जोड़ने की व्यवहार्यता देखी जाए।
- 5 धुरियापार उपकेंद्र से आपातकालीन बिजली आपूर्ति की स्थायी व्यवस्था की जाए।
- 6 निर्माण में अनियमितताओं के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदारी तय की जाए।
विभागीय जांच और जवाबदेही क्यों जरूरी?
इस पूरे मामले में वर्ष 2014 में लखनऊ से आई तकनीकी टीम की निरीक्षण रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज हो सकती है।
यदि उपकेंद्र को संचालन योग्य नहीं माना गया था तो उसके पीछे बताए गए तकनीकी कारण।
बाद में किए गए सुधारों और वर्ष 2022 में संचालन शुरू कराने की प्रक्रिया की जांच जरूरी है।
इसके साथ ही निर्माण की स्वीकृत योजना, लागत, तकनीकी डिजाइन, गुणवत्ता परीक्षण और लाइन निर्माण से संबंधित अभिलेखों की समीक्षा होनी चाहिए।
इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि परियोजना में वास्तव में कहां खामियां रहीं और उनके लिए कौन जिम्मेदार था।
Facts / Details
- उपकेंद्र का नाम: चिल्लूपार (रतनपुर) विद्युत उपकेंद्र।
- स्थान: ग्राम सभा रतनपुर, विकासखंड बेलघाट, गोरखपुर।
- निर्माण वर्ष: 2014 में निर्माण पूरा होने की जानकारी।
- निर्माण स्थल: घाघरा नदी का बाढ़ प्रभावित क्षेत्र।
- विद्युत आपूर्ति लाइन: बड़हलगंज से लगभग 40 किलोमीटर लंबी 33 हजार वोल्ट की लाइन।
- पोलों के बीच दूरी: स्थानीय जानकारी के अनुसार लगभग 80 से 90 मीटर।
- तकनीकी निरीक्षण: वर्ष 2014 में लखनऊ की टीम द्वारा निरीक्षण।
- संचालन की पहल: वर्ष 2022 में तत्कालीन अधीक्षण अभियंता रमेश श्रीवास्तव द्वारा।
- प्रभावित उपभोक्ता: लगभग 22 गांव।
- मुख्य समस्या: 33 हजार वोल्ट की लाइन में खराबी आने पर 8 से 12 घंटे तक बिजली आपूर्ति बाधित होने की शिकायत।
Statement / स्थानीय उपभोक्ताओं की मांग
स्थानीय उपभोक्ताओं का कहना है कि बिजली उपकेंद्र बनाने का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों को बेहतर विद्युत आपूर्ति देना था।
लेकिन मौजूदा व्यवस्था में लोगों को बार-बार बिजली संकट झेलना पड़ रहा है।
उपभोक्ताओं ने मांग की है कि विभाग मामले की निष्पक्ष जांच कराए,
निर्माण और तकनीकी खामियों की जिम्मेदारी तय करे।
उपकेंद्र को सुरक्षित और बेहतर विद्युत कनेक्टिविटी वाले स्थान पर स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. चिल्लूपार विद्युत उपकेंद्र कहां स्थित है?
यह गोरखपुर जिले के विकासखंड बेलघाट की ग्राम सभा रतनपुर में स्थित है।
2. चिल्लूपार विद्युत उपकेंद्र का निर्माण कब हुआ था?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसका निर्माण वर्ष 2014 में पूरा हुआ था।
3. उपकेंद्र को कितने वर्षों तक नियमित रूप से संचालित नहीं किया गया?
निर्माण के बाद लगभग सात वर्षों तक यह उपकेंद्र अपनी पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पाया था।
4. चिल्लूपार उपकेंद्र में बिजली आपूर्ति की मुख्य समस्या क्या है?
बड़हलगंज से आने वाली 33 हजार वोल्ट की लंबी लाइन में खराबी आने पर बिजली आपूर्ति कई घंटों तक बाधित रहती है।
5. उपभोक्ता विद्युत विभाग से क्या मांग कर रहे हैं?
उपभोक्ता सुरक्षित स्थान पर उपकेंद्र स्थापित करने, वैकल्पिक विद्युत लाइन की व्यवस्था करने और निर्माण संबंधी शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग कर रहे हैं।
Conclusion
चिल्लूपार (रतनपुर) विद्युत उपकेंद्र का मामला है।
निर्माण की गुणवत्ता, तकनीकी नियोजन और विभागीय जवाबदेही की जांच की मांग करता है।
अब जरूरत है कि विद्युत विभाग 22 गांवों के उपभोक्ताओं को स्थायी समाधान चाहिए।
निर्बाध बिजली आपूर्ति उपलब्ध कराने के लिए ठोस कार्रवाई करे।