भारतीय नौसेना बनाएगी स्वदेशी रुक्मिणी टर्मिनल, GSAT-7R से जुड़ेगा समुद्री संचार नेटवर्क

भारतीय नौसेना ने समुद्र में अपने संचार नेटवर्क को और मजबूत करने के लिए स्वदेशी सैटेलाइट कम्युनिकेशन तकनीक विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। नौसेना ने नए रुक्मिणी SATCOM टर्मिनल विकसित करने के लिए उद्योग जगत से रुचि पत्र (EoI) मांगा है। ये टर्मिनल नए नौसैनिक संचार उपग्रह GSAT-7R के साथ काम करेंगे।

पुराने संचार सिस्टम की जगह आएगी नई तकनीक

नौसेना के कई जहाजों पर इस्तेमाल हो रहे मौजूदा सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम एक दशक से ज्यादा पुराने हो चुके हैं। इन प्रणालियों में तकनीकी सहायता और डेटा ट्रांसफर की गति से जुड़ी समस्याएं सामने आने के बाद अब इनके स्थान पर नई पीढ़ी के स्वदेशी टर्मिनल विकसित करने की योजना बनाई गई है।

नए सिस्टम का उद्देश्य नौसैनिक जहाजों को समुद्र में रहते हुए सुरक्षित और तेज संचार सुविधा उपलब्ध कराना है।

GSAT-7R से जुड़ेगा नौसेना का नेटवर्क

GSAT-7R को नौसेना के लिए समर्पित संचार उपग्रह के रूप में तैयार किया गया है। यह जहाजों, पनडुब्बियों, विमानों और समुद्री संचालन केंद्रों के बीच आवाज, डेटा और वीडियो संचार की सुविधा देने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका कवरेज भारतीय महासागर क्षेत्र में नौसेना के संचालन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

नए रुक्मिणी टर्मिनल जहाजों पर लगाए जाएंगे और इन्हीं के जरिए नौसैनिक प्लेटफॉर्म GSAT-7R से सुरक्षित तरीके से जुड़ सकेंगे।

C-बैंड और Ku-बैंड तकनीक का इस्तेमाल

प्रस्तावित टर्मिनल C-बैंड और Ku-बैंड पर काम करने वाले होंगे। इनका इस्तेमाल सुरक्षित आवाज, डेटा और वीडियो संचार के लिए किया जाएगा।

नौसेना ने शुरुआत में तीन तरह के प्रोटोटाइप विकसित करने की योजना बनाई है। इनमें बड़ा C-बैंड टर्मिनल, बड़ा Ku-बैंड टर्मिनल और छोटा Ku-बैंड टर्मिनल शामिल हैं। आगे चलकर करीब 30 टर्मिनलों के उत्पादन की दिशा में बढ़ने की योजना बताई गई है।

समुद्र की कठिन परिस्थितियों में होगी टेस्टिंग

नौसैनिक जहाज लगातार लहरों, कंपन, तेज हवाओं और नमकीन समुद्री वातावरण में चलते हैं। इसलिए इन टर्मिनलों को सामान्य प्रयोगशाला परिस्थितियों के साथ-साथ समुद्री वातावरण जैसी कठिन परिस्थितियों में भी परीक्षण से गुजरना होगा।

प्रोटोटाइप की तीन-अक्षीय मोशन टेस्टिंग की जाएगी, ताकि यह जांचा जा सके कि जहाज के लगातार हिलने-डुलने के बावजूद सैटेलाइट लिंक स्थिर बना रहता है या नहीं। इसके अलावा तकनीक का मूल्यांकन और सुरक्षा से जुड़ी आवश्यक जांच भी की जाएगी।

कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री जरूरी

इस परियोजना को Make-II श्रेणी के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें उद्योग को प्रोटोटाइप के विकास की लागत स्वयं वहन करनी होगी।

प्रस्तावित सिस्टम में हार्डवेयर और एम्बेडेड सॉफ्टवेयर के स्तर पर कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री रखने की शर्त है। इस परियोजना को फिलहाल माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज यानी MSME के लिए रखा गया है। स्टार्टअप और अधिकतम पांच सदस्यों वाले कंसोर्टियम भी इसमें भाग ले सकते हैं।

नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध क्षमता को मिलेगा आधार

आधुनिक नौसैनिक अभियानों में केवल हथियार और जहाज ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच तेजी से सूचना साझा करना भी अहम भूमिका निभाता है।

रुक्मिणी नेटवर्क इसी तरह की क्षमता विकसित करने में मदद करता है। इसके जरिए अलग-अलग जहाज, विमान और अन्य प्लेटफॉर्म एक साझा ऑपरेशनल तस्वीर तैयार कर सकते हैं। किसी एक प्लेटफॉर्म से मिली जानकारी को जरूरत के अनुसार दूसरे प्लेटफॉर्म तक पहुंचाया जा सकता है।

नौसेना ने 2014 के TROPEX अभ्यास के दौरान इस तरह के नेटवर्क की क्षमता का प्रदर्शन भी किया था

जिसमें बड़ी संख्या में युद्धपोत और विमान एक साझा नेटवर्क से जुड़े थे।

आत्मनिर्भर रक्षा तकनीक की दिशा में कदम

स्वदेशी रुक्मिणी टर्मिनल परियोजना को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रयास के

तौर पर भी देखा जा रहा है। इससे महत्वपूर्ण संचार प्रणालियों के लिए

विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

GSAT-7R के साथ इन स्वदेशी टर्मिनलों का इस्तेमाल होने पर नौसेना के

समुद्री संचार नेटवर्क को नई तकनीकी क्षमता मिलेगी और दूर

समुद्र में तैनात प्लेटफॉर्म के बीच सुरक्षित संपर्क बनाए रखना आसान होगा।

क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?

हिंद महासागर क्षेत्र में लंबे समय तक समुद्री निगरानी और संचालन के लिए

सुरक्षित संचार व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण है।

जहाजों, पनडुब्बियों, विमानों और कमांड सेंटरों के बीच लगातार सूचना का

आदान-प्रदान नौसैनिक अभियानों की समन्वय क्षमता को प्रभावित करता है।

ऐसे में GSAT-7R के साथ काम करने वाले स्वदेशी रुक्मिणी टर्मिनल

नौसेना के भविष्य के संचार ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं

FAQ

1. रुक्मिणी SATCOM टर्मिनल क्या है?

यह नौसेना के जहाजों पर इस्तेमाल होने वाला सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम है,

जिसके जरिए समुद्र में सुरक्षित आवाज, डेटा और वीडियो संचार किया जा सकता है।

2. नए रुक्मिणी टर्मिनल किस सैटेलाइट से जुड़ेंगे?

नए टर्मिनल भारतीय नौसेना के लिए समर्पित संचार उपग्रह GSAT-7R के

साथ काम करने के लिए विकसित किए जा रहे हैं।

3. नए टर्मिनल में कौन से बैंड होंगे?

प्रस्तावित सिस्टम में C-बैंड और Ku-बैंड तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।

4. क्या यह पूरी तरह स्वदेशी परियोजना है?

परियोजना में कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की आवश्यकता रखी गई है।

इसे Make-II श्रेणी के तहत विकसित किया जा रहा है।

5. इससे भारतीय नौसेना को क्या फायदा होगा?

इससे समुद्र में तैनात जहाजों और अन्य नौसैनिक प्लेटफॉर्म के बीच सुरक्षित संचार,

डेटा और वीडियो कनेक्टिविटी को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

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