नई दिल्ली | 27 सितंबर 2026
परिचय
नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में Department of Xenotransplantation Sciences शुरू किया गया है। यह पहल सूअर जैसे आनुवंशिक रूप से संशोधित पशुओं के अंगों को इंसानों में प्रत्यारोपित करने की तकनीक पर शोध और चिकित्सा क्षमता विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मुख्य खबर
अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में भारत में ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन को लेकर नई पहल शुरू हुई है। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में देश का पहला समर्पित Department of Xenotransplantation Sciences स्थापित किया गया है। विभाग का उद्देश्य इस उभरती चिकित्सा तकनीक के लिए वैज्ञानिक, चिकित्सकीय और संस्थागत क्षमता विकसित करना है।
ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन में एक प्रजाति के अंग, ऊतक या कोशिकाओं को दूसरी प्रजाति में प्रत्यारोपित करने की संभावनाओं पर काम किया जाता है। वर्तमान में वैज्ञानिकों का विशेष ध्यान आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर की किडनी पर है। इसका कारण यह है कि मानव अंगों की उपलब्धता सीमित है और बड़ी संख्या में मरीज प्रत्यारोपण के लिए लंबे समय तक इंतजार करते हैं।
सूअर की किडनी क्यों महत्वपूर्ण?
आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर की किडनी को मानव शरीर में प्रत्यारोपित करने के प्रयोग दुनिया के कुछ हिस्सों में आगे कदम बढ़े हैं।सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में एक मरीज में प्रत्यारोपित जीन-संशोधित सूअर की किडनी ने उसे 271 दिनों तक डायलिसिस से दूर रखा, जिसके बाद उसे मानव किडनी प्रत्यारोपित की गई।
यह मानव ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन में एक महत्वपूर्ण चिकित्सकीय अनुभव माना जा रहा है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि सूअर की किडनी अब भारत में सामान्य मरीजों के लिए नियमित उपचार बन गई है। मानव शरीर में ऐसे अंगों को स्वीकार कराने, संक्रमण के जोखिम को नियंत्रित करने और लंबे समय तक उनकी कार्यक्षमता बनाए रखने जैसी चुनौतियों पर अभी शोध जारी है।
सर गंगाराम अस्पताल की भूमिका
सर गंगाराम अस्पताल पहले से ही किडनी रोग और प्रत्यारोपण सेवाओं के क्षेत्र में काम करता रहा है।
अस्पताल की जानकारी के अनुसार, वहां किडनी ट्रांसप्लांट सेवा 1987 में शुरू हुई थी।
नए विभाग के माध्यम से ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन से जुड़े शोध, तकनीकी विशेषज्ञता और भविष्य की क्लिनिकल व्यवस्था विकसित करने पर ध्यान दिया गया है। सितंबर 2026 में प्रकाशित वैज्ञानिक शोध में भी सर गंगाराम अस्पताल के Department of Xenotransplantation Sciences से जुड़े शोधकर्ताओं का उल्लेख मिलता है।
सुरक्षा और नियम सबसे अहम
इंसानों में पशु अंगों के प्रत्यारोपण से पहले कई वैज्ञानिक और नियामकीय पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है।
इनमें अंग अस्वीकृति, संक्रमण, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, आनुवंशिक बदलाव और मरीज की दीर्घकालीन निगरानी प्रमुख हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारत में इस क्षेत्र के लिए दिशानिर्देश विकसित करने की दिशा में भी काम चल रहा है।
फिलहाल इसे नियमित किडनी ट्रांसप्लांट का विकल्प मानना जल्दबाजी होगी।
Facts/Details
सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली में समर्पित ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन विभाग स्थापित किया गया है।
शोध का प्रमुख क्षेत्र आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर के अंग हैं।किडनी इस तकनीक के प्रमुख शोध क्षेत्रों में शामिल है।
अमेरिका में एक मरीज सूअर की किडनी के बाद 271 दिनों तक डायलिसिस से दूर रहा।
ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन अभी शोध और शुरुआती मानव प्रयोगों के चरण में है।संक्रमण और अंग अस्वीकृति जैसी चुनौतियां महत्वपूर्ण हैं।
विस्तार
सर गंगाराम अस्पताल में नए विभाग की स्थापना भारत में ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन के लिए शोध और विशेषज्ञता विकसित करने की दिशा में कदम है। भविष्य में यदि यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो मानव अंगों की सीमित उपलब्धता की समस्या को कम करने में इसकी भूमिका हो सकती है।
FAQ
1. ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन क्या है?
एक प्रजाति के अंग, ऊतक या कोशिकाओं को दूसरी प्रजाति में प्रत्यारोपित करने की तकनीक को ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है।
2. क्या भारत में सूअर की किडनी का नियमित ट्रांसप्लांट शुरू हो गया है?
नहीं। अभी भारत में इस क्षेत्र की वैज्ञानिक और चिकित्सकीय क्षमता विकसित करने पर काम हो रहा है।
3. सूअर की किडनी पर शोध क्यों किया जा रहा है?
मानव अंगों की उपलब्धता सीमित होने के कारण वैज्ञानिक वैकल्पिक अंग स्रोत तलाश रहे हैं।आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर के अंग इस शोध का प्रमुख हिस्सा हैं।
4. क्या इससे भविष्य में किडनी की कमी कम हो सकती है?
यदि तकनीक सुरक्षित है।
प्रभावी और नियामकीय रूप से स्वीकृत साबित होती है।
भविष्य में यह अतिरिक्त अंग स्रोत उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है।
दिल्ली में ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन विभाग की शुरुआत भारत में अंग प्रत्यारोपण के भविष्य से जुड़े है।
शोध को नई दिशा दे सकती है।
सूअर की किडनी को नियमित मानव उपचार बनाने से पहले सुरक्षा जरूरी है।
प्रभावशीलता और नियामकीय मंजूरी से जुड़े कई चरण पूरे करने होंगे।