*जीवन मे ज़हर घोल रहा पूर्वांचल का पानी*- आंकड़े बताते हैं सच्चाई,राजनीति स्तर पर स्थिति निराशाजनक पवन गुप्तागोरक्ष एक्सप्रेस।गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बहता पानी आज प्यास बुझाने के बजाय बीमारियाँ बढ़ा रहा है।
सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि यह क्षेत्र भूजल प्रदूषण, फ्लोरोाइड, नाइट्रेट और अत्यधिक TDS (कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) की मार झेल रहा है — मगर प्रशासन और राजनीति का ध्यान अब भी घोषणाओं तक सीमित है।केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2023–24 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के पूर्वी ज़िलों —
गोरखपुर, देवरिया, संतकबीरनगर, बलरामपुर, आज़मगढ़, मऊ और जौनपुर — के भूजल में रासायनिक असंतुलन चिंताजनक है। pH का मान 7.05 से 8.84 तक पाया गया, जो सामान्य सीमा में तो है, पर कई स्थानों पर यह उच्च स्तर तक पहुँच गया है।
जल की कुल कठोरता 50 से 8,607 mg/L तक दर्ज की गई, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह 300 mg/L से अधिक नहीं होनी चाहिए। नाइट्रेट का स्तर 0 से 850 mg/L तक और फ्लोरोाइड 0 से 9.0 mg/L तक पाया गया, जो सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है।कुल घुलनशील ठोस पदार्थ (TDS) का औसत स्तर 1014 mg/L पाया गया,
जबकि भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार 500 mg/L तक ही सुरक्षित माना जाता है। कई जिलों में यह 2000 mg/L से अधिक दर्ज हुआ। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि पूर्वांचल के हर तीसरे हैंडपंप या कुएँ का पानी असुरक्षित श्रेणी में आता है।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, गोरखपुर एवं बलरामपुर की राप्ती नदी, और आज़मगढ़ की टोंस(तमसा) नदी में जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD) 30 mg/L तक पहुँच गई है, जो स्वच्छ जल की सीमा 3 mg/L से दस गुना अधिक है। कुल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की संख्या लाखों प्रति 100 मिलीलीटर तक दर्ज की गई है,
जो मलजल के सीधे बहाव का प्रमाण है।इन परिस्थितियों का सामाजिक और आर्थिक असर गहरा है। नाइट्रेट और फ्लोरोाइड प्रदूषण से फ्लोरोसिस, ब्लू बेबी सिंड्रोम, पेट और किडनी रोग तेजी से फैल रहे हैं। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के आँकड़ों के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में जलजनित रोगों के मरीजों की संख्या में लगभग 40% की वृद्धि हुई है।
ग्रामीण परिवार अब पानी की शुद्धि पर सालाना ₹3,000 से ₹6,000 तक खर्च करने को विवश हैं। देवरिया और आज़मगढ़ जैसे जिलों में भूमि की उपजाऊ क्षमता घटने से कृषि उत्पादन में औसतन 12% की गिरावट आई है।इन सबके बीच “जल जीवन मिशन” उम्मीद की एक किरण बनकर आया था। 2019 में शुरू की गई इस योजना का लक्ष्य था हर ग्रामीण घर तक नल के माध्यम से शुद्ध पेयजल पहुँचाना।
उत्तर प्रदेश में सरकार का दावा है कि 87% घरों में नल कनेक्शन पहुँच चुका है, लेकिन सवाल यह है कि इन नलों से आने वाला पानी कितना शुद्ध है। कई जगह पाइपलाइनें तो बिछाई गईं, मगर स्रोत वही दूषित भूजल ही है। जल शोधन संयंत्रों की निगरानी और रखरखाव की कमी के कारण योजना का उद्देश्य अधूरा रह गया है।राजनीतिक स्तर पर स्थिति और भी निराशाजनक है।
“हर घर नल जल” और “स्वच्छ भारत मिशन” के नारे तो गूँजते हैं, पर ग्राम जलापूर्ति योजनाओं के 70% कार्य अब भी अधूरे हैं। राज्य के जल परीक्षण प्रयोगशालाओं में से आधी निष्क्रिय हैं, और जिनसे रिपोर्टें निकलती भी हैं, वे सार्वजनिक नहीं की जातीं। यह नीतिगत लापरवाही और लोकतांत्रिक जवाबदेही की कमी का स्पष्ट संकेत है।जल संकट केवल तकनीकी या भौगोलिक समस्या नहीं है,
बल्कि यह नीयत की परीक्षा भी है। बजट का 30–40% हिस्सा उपयोग में नहीं आता, योजनाएँ कागज़ों में सीमित रह जाती हैं, और जनता को लाभार्थी की तरह दिखाकर उनकी भागीदारी से वंचित रखा जाता है। इस पूरे तंत्र में पारदर्शिता और संवेदनशीलता दोनों का अभाव है।पूर्वांचल के इस जल संकट से निपटने के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं।
हर पंचायत में जल गुणवत्ता का नियमित परीक्षण और सार्वजनिक डेटा जारी किया जाना चाहिए। ग्राम स्तर पर कम लागत वाले शोधन संयंत्र लगाए जाने चाहिए। औद्योगिक और सीवेज निकासी पर नियंत्रण कड़ा होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण है जन-जागरूकता — क्योंकि जब तक जनता अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं होगी, तब तक योजनाएँ केवल घोषणाएँ बनी रहेंगी।पूर्वांचल का पानी आज जीवन का नहीं, जोखिम का प्रतीक बन गया है।
आंकड़े मौजूद हैं, मगर संवेदना गायब है। यदि नीति-निर्माताओं ने अब भी आँखें मूँद लीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ नदियों और हैंडपंपों को केवल इतिहास की वस्तु के रूप में जानेंगी। जब पानी बिकने लगता है, तब समाज की प्यास इंसानियत से भी गहरी हो जाती है — और यही स्थिति आज पूर्वांचल के जल की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुकी है।
