राकेश शर्मा की रिपोर्ट
गोरखपुर क्षेत्र में शनिवार को जीवित्पुत्रिका यानी जिउतिया व्रत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। महिलाओं ने संतान की लंबी उम्र, सुखी और निरोगी जीवन की कामना से दिनभर निर्जल व्रत रखा।
मुख्य खबर
जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जिउतिया को लेकर शनिवार को गोरखपुर क्षेत्र में धार्मिक माहौल रहा। संतान की मंगल कामना, दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए महिलाओं ने पूरे दिन निर्जल रहकर व्रत रखा। क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार व्रती महिलाओं ने शाम के समय नदी तट पर पहुंचकर स्नान किया और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
सनातन हिंदू परंपरा में विभिन्न व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व माना जाता है। जीवित्पुत्रिका व्रत भी महिलाओं के प्रमुख व्रतों में शामिल है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। इस दौरान महिलाएं संतान की दीर्घायु और उसके सुखी एवं स्वस्थ जीवन की कामना करती हैं।
सरयू और कुआनो नदी तट पर पहुंचीं व्रती महिलाएं
क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार बनकटी, हरिहरपुर, मलौली सहित आसपास के गांवों की व्रती महिलाएं सरयू नदी के तट पर पहुंचीं। वहीं कुरावल, मधुपट्टी, अलावलपुर, महुआडांड़, धुरियापार, सिधवाना, रसूलपुर और बौरडीह सहित कई गांवों की महिलाएं कुआनो नदी के तट पर पहुंचीं।
व्रती महिलाएं अपने साथ जिउतिया, फल, मिठाई, बनउर, सिंदूर और हल्दी का लेपन किया हुआ सात प्रकार का अनाज लेकर नदी तट पर पहुंचीं। नदी में स्नान करने के बाद महिलाओं ने पूजा की तैयारी की। इस दौरान नदी तट पर महिलाओं की भीड़ दिखाई दी और धार्मिक वातावरण बना रहा।
बरियार की पूजा कर सुनी व्रत कथा
स्नान के बाद व्रती महिलाओं ने बरियार को सिंदूर अर्पित कर उसकी पूजा की। इसके बाद महिलाओं ने बरियार को अपने गले से लगाया। पूजा-अर्चना के बाद नदी तट पर बैठकर जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनी और सुनाई गई।
महिलाओं ने परंपरा के अनुसार पूजा सामग्री अर्पित करते हुए अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य, लंबी उम्र और मंगलमय जीवन की कामना की। कई स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से व्रत कथा का श्रवण किया।
व्रत के दौरान महिलाओं ने दिनभर जल और अन्न का सेवन नहीं किया। शाम को पूजा और कथा के बाद भी व्रत जारी रहा। क्षेत्रीय मान्यताओं और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार महिलाओं ने जिउतिया व्रत से जुड़ी धार्मिक विधियों का पालन किया।
रविवार को पूजा के बाद होगा पारण
जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण रविवार की सुबह पूजा-अर्चना के बाद किया जाएगा। व्रती महिलाएं पूजन के बाद जिउतिया अपने पुत्रों को पहनाएंगी और स्वयं भी धारण करेंगी। इसके बाद पारण कर निर्जल व्रत का समापन करेंगी।
इस अवसर पर महिलाओं ने संतान की मंगल कामना के साथ परिवार की सुख-समृद्धि की भी प्रार्थना की।
नदी तटों पर महिलाओं के पहुंचने से पूरे क्षेत्र में धार्मिक वातावरण देखने को मिला।
सरयू और कुआनो नदी तट पर पहुंचीं व्रती महिलाएं
बरियार की पूजा कर सुनी व्रत कथा
रविवार को पूजा के बाद होगा पारण
जीवित्पुत्रिका व्रत को जिउतिया व्रत भी कहा जाता है।
यह व्रत संतान की मंगल कामना और दीर्घायु के लिए रखा जाता है।
महिलाओं ने शनिवार को निर्जल व्रत रखा।
बनकटी, हरिहरपुर और मलौली की महिलाएं सरयू तट पर पहुंचीं।
कुरावल, मधुपट्टी, अलावलपुर, महुआडांड़ और धुरियापार सहित कई गांवों की महिलाएं कुआनो तट पर पहुंचीं।
महिलाओं ने स्नान के बाद बरियार की पूजा की।
पूजा के दौरान सिंदूर, फल, मिठाई और सात प्रकार के अनाज का प्रयोग किया गया।
नदी तट पर जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनी और सुनाई गई।
रविवार सुबह पूजन के बाद जिउतिया धारण कर व्रत का पारण किया जाएगा।
व्रती महिलाओं ने बताया कि जीवित्पुत्रिका व्रत संतान के सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना से रखा जाता है। परंपरा के अनुसार पूरे दिन निर्जल रहने के बाद नदी तट पर पूजा और व्रत कथा का श्रवण किया गया। रविवार सुबह पूजन के बाद व्रत का पारण किया जाएगा।
FAQ
1. जीवित्पुत्रिका व्रत किसलिए रखा जाता है?
संतान की मंगल कामना, अच्छे स्वास्थ्य, सुखी जीवन और दीर्घायु की कामना के लिए यह व्रत रखा जाता है।
2. जीवित्पुत्रिका व्रत को और किस नाम से जाना जाता है?
इसे जिउतिया या जितिया व्रत भी कहा जाता है।
3. गोरखपुर में व्रती महिलाएं कहां पहुंचीं?
क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार महिलाएं सरयू और कुआनो नदी के तट पर पूजा के लिए पहुंचीं।
4. व्रत का पारण कब होगा?
दिए गए विवरण के अनुसार रविवार सुबह पूजा-अर्चना के बाद व्रत का पारण किया जाएगा।
5. पूजा में किन वस्तुओं का प्रयोग किया गया?
जिउतिया, फल, मिठाई, बनउर, सिंदूर, हल्दी और सात प्रकार के अनाज सहित पूजा सामग्री का प्रयोग किया गया।
गोरखपुर क्षेत्र में जीवित्पुत्रिका व्रत श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया।
महिलाओं ने निर्जल व्रत रखकर नदी तट पर पूजा और कथा का श्रवण किया।
रविवार को पूजन के बाद व्रत का पारण किया जाएगा।