मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि जो लोग आयोग का बचाव कर रहे हैं, वे भी कथित चुनावी अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार हैं।
अखिलेश यादव का यह बयान ऐसे समय आया है जब चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े मुद्दों को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है। हाल में आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR से संबंधित उसके फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
*अखिलेश यादव ने क्या कहा?
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर अपनी आपत्तियां दोहराईं। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग से जुड़े मामलों में सवाल उठने के बावजूद सत्ता पक्ष के लोग उसका बचाव कर रहे हैं।
सपा अध्यक्ष का कहना है कि यदि किसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठते हैं तो उन सवालों का जवाब संबंधित संस्था को स्वयं देना चाहिए। उनके बयान में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाता सूची की शुद्धता को प्रमुख मुद्दा बनाया गया।
14 आपत्तियों का मुद्दा फिर चर्चा में
विवाद की पृष्ठभूमि में ऐसी रिपोर्ट सामने आई थी कि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ निर्णयों और निर्देशों को लेकर 14 बार आपत्ति दर्ज की थी।
अखिलेश यादव ने इसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए। हालांकि चुनाव आयोग ने बाद में कहा कि उसके महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
चुनाव आयोग ने क्या स्पष्टीकरण दिया?
चुनाव आयोग ने शनिवार को जारी अपने पक्ष में कहा कि SIR सहित आयोग के फैसलों को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी।
आयोग ने यह भी कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ी प्रक्रिया में मतदाताओं को अपनी पात्रता साबित करने और आवश्यक जानकारी देने के अवसर उपलब्ध हैं।
इस तरह अखिलेश यादव और चुनाव आयोग के पक्ष में अलग-अलग दावे सामने आए हैं। इन दावों की अंतिम वैधानिक स्थिति संबंधित संस्थागत और न्यायिक प्रक्रियाओं से तय होगी।
SIR को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
SIR के तहत मतदाता सूचियों की समीक्षा और सत्यापन किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में पुराने मतदाता रिकॉर्ड से वर्तमान विवरण के मिलान सहित अलग-अलग स्तर पर सत्यापन किया जाता है।
विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया में दस्तावेजों, नामों के सत्यापन और संभावित नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है।
यूपी चुनाव को लेकर भी अखिलेश ने उठाए सवाल
अखिलेश यादव ने अपने हालिया बयानों में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 और बाद के उपचुनावों का भी उल्लेख किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी से जुड़े मतदाताओं के
नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे और शिकायतों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई।
ये आरोप सपा अध्यक्ष के राजनीतिक दावे हैं। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में इन आरोपों को लेकर
चुनाव आयोग की ओर से अलग-अलग प्रक्रियाओं और शिकायत निवारण व्यवस्था का पक्ष भी सामने आया है।
राजनीतिक दलों के बीच बढ़ी बयानबाजी
SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर भाजपा, कांग्रेस और
समाजवादी पार्टी सहित कई राजनीतिक दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
विपक्षी दल आयोग से पारदर्शिता और स्पष्टीकरण की मांग कर रहे हैं, जबकि भाजपा और
केंद्र सरकार से जुड़े नेता चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने भी
अपने फैसलों की प्रक्रिया को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया है।
आगे की प्रक्रिया पर नजर
SIR विवाद के बीच मतदाता सूची, फॉर्म-6, सत्यापन प्रक्रिया और आयोग की
निर्णय प्रणाली से जुड़े मुद्दे आगे भी चर्चा में रहने की संभावना है।
इस मामले में किसी भी आरोप या राजनीतिक दावे को अंतिम तथ्य मानने के बजाय संबंधित
आधिकारिक दस्तावेज, चुनाव आयोग के आदेश और न्यायिक निर्णय महत्वपूर्ण होंगे।
FAQ: अखिलेश यादव और चुनाव आयोग विवाद
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग को लेकर क्या कहा?
अखिलेश यादव ने आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाए तथा
आयोग का बचाव करने वाले लोगों की भूमिका पर भी आरोप लगाए।
विवाद किस मुद्दे से जुड़ा है?
मुख्य विवाद SIR यानी Special Intensive Revision के तहत मतदाता सूचियों के
पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़ा है।
क्या चुनाव आयोग ने अपने फैसलों पर सफाई दी है?
हां। चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR से संबंधित फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों
चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए।
14 आपत्तियों का मामला क्या है?
रिपोर्टों के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कुछ निर्णयों और निर्देशों पर
14 बार आपत्ति दर्ज की थी। इस रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़ा।
क्या अखिलेश यादव के आरोप साबित हो चुके हैं?
नहीं। ये अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं।
इनकी सत्यता का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, जांच या न्यायिक प्रक्रिया से ही हो सकता है।
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