बिजनौर में बढ़ता गुलदार-मानव संघर्ष: बदल रहा आवास और व्यवहार, चार साल में 40 लोगों की मौत से बढ़ी चिंता

उत्तर प्रदेश का बिजनौर जिला इन दिनों इंसान और गुलदार के बढ़ते संघर्ष को लेकर गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। जंगलों से निकलकर गुलदारों का गन्ने के खेतों और आबादी वाले इलाकों के आसपास पहुंचना ग्रामीणों के लिए लगातार खतरा बनता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में गुलदार के हमलों में बड़ी संख्या में लोगों की जान जा चुकी है। बदलते प्राकृतिक आवास, गन्ने के खेतों में मिलने वाली सुरक्षित पनाह और भोजन की तलाश ने इंसान और वन्यजीव के बीच दूरी को और कम कर दिया है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, जिले में गुलदार के लिए संवेदनशील इलाकों का दायरा लगातार बढ़ा है। वहीं, हालिया रिपोर्टों में गुलदार के हमलों से मौतों का आंकड़ा 40 के आसपास पहुंचने की बात सामने आई है। अगस्त 2026 तक उपलब्ध रिपोर्ट में 2023 से अब तक 38 मौतों का आंकड़ा सामने आया था, जबकि सितंबर में एक और महिला की मौत की घटना सामने आई।

गन्ने के खेत बने गुलदारों का नया ठिकाना

बिजनौर में मानव-गुलदार संघर्ष की सबसे बड़ी वजहों में गन्ने के खेतों का विस्तार और उनका घना आवरण माना जा रहा है। गन्ने के लंबे और घने पौधे गुलदारों को छिपने के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध कराते हैं। यही खेत ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी का भी हिस्सा हैं, जहां किसान चारा लेने, सिंचाई करने और फसल की देखभाल के लिए जाते हैं।

ऐसे में खेतों में मौजूद गुलदार और इंसानों के बीच अचानक आमना-सामना होने की आशंका बनी रहती है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जिले में बड़ी संख्या में गुलदार गन्ने के खेतों में शरण लेते हैं।

आठ ब्लॉक के 190 गांव संवेदनशील

वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, बिजनौर जिले के आठ ब्लॉक के 190 गांव गुलदार के लिहाज से संवेदनशील घोषित किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा बताता है कि समस्या किसी एक गांव या इलाके तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि जिले के बड़े ग्रामीण क्षेत्र में इसका असर दिखाई दे रहा है।

रिपोर्ट में गन्ने के खेतों में बड़ी संख्या में गुलदार मौजूद होने का अनुमान भी जताया गया था। हालांकि अलग-अलग समय पर वन विभाग और अन्य स्रोतों से गुलदारों की संख्या के अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि बिजनौर में इनकी मौजूदगी मानव आबादी के काफी करीब बढ़ी है।

बदल रहा है गुलदारों का व्यवहार?

बिजनौर में पिछले कुछ वर्षों में गुलदारों की गतिविधियों को लेकर वन्यजीव विशेषज्ञों और अधिकारियों की चिंता बढ़ी है। 2025 की रिपोर्ट में भी गुलदारों के व्यवहार में बदलाव की चर्चा हुई थी। पहले अकेले रहने वाला गुलदार कई बार एक साथ कई गुलदारों के दिखाई देने की घटनाओं से चर्चा में आया।

हालांकि किसी वन्यजीव के व्यवहार में स्थायी बदलाव का निष्कर्ष वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर ही निकाला जा सकता है। इसी कारण बिजनौर में वैज्ञानिक स्तर पर गुलदारों की गणना और मानव-वन्यजीव संघर्ष का अध्ययन शुरू किया गया है।

वैज्ञानिक अध्ययन से तलाशा जा रहा समाधान

2026 में बिजनौर में गुलदारों की वैज्ञानिक गणना शुरू की गई। विशेषज्ञों की टीम उन क्षेत्रों का सर्वे कर रही है जहां गुलदारों की मौजूदगी और हमलों की घटनाएं अधिक रही हैं। अध्ययन का उद्देश्य संघर्ष वाले हॉटस्पॉट की पहचान करना और यह समझना है कि इंसान और गुलदार के बीच टकराव क्यों बढ़ रहा है।

इस तरह के अध्ययन के आधार पर भविष्य में गुलदारों के प्रबंधन और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए रणनीति तैयार की जा सकती है।

चार साल में बढ़ती मौतों ने बढ़ाई चिंता

बिजनौर में गुलदार के हमलों से होने वाली मौतों का आंकड़ा लगातार चिंता बढ़ा रहा है। जून 2026 की एक रिपोर्ट में साढ़े तीन साल में 36 लोगों की मौत का आंकड़ा सामने आया था। अगस्त में सात वर्षीय बच्चे की मौत के बाद यह संख्या 38 बताई गई। सितंबर में आलोपुर गांव में 40 वर्षीय महिला बबीता देवी की मौत के बाद यह संकट और गंभीर दिखाई दिया।

आंकड़ों में समय और रिपोर्टिंग के आधार पर अंतर हो सकता है, लेकिन घटनाओं की लगातार श्रृंखला यह जरूर बताती है कि समस्या गंभीर है।

सितंबर में महिला की मौत के बाद ग्रामीणों में आक्रोश

हाल ही में बिजनौर के जलालाबाद क्षेत्र के आलोपुर गांव में गुलदार के हमले में 40 वर्षीय महिला बबीता देवी की मौत हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, महिला को गुलदार घर के बाहर से उठाकर गन्ने के खेत की ओर ले गया।

बाद में ग्रामीणों को उनका शव खेत में मिला।

घटना के बाद ग्रामीणों में आक्रोश फैल गया और शव के साथ धरना दिया गया।

इस घटना के बाद वन विभाग से गुलदार को पकड़ने और

ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग तेज हुई।

प्रशासन और वन विभाग के सामने बड़ी चुनौती

गुलदारों को पकड़ने के लिए वन विभाग की ओर से पिंजरे लगाए जा रहे हैं और

प्रभावित इलाकों में निगरानी बढ़ाई जा रही है।

कुछ क्षेत्रों में ड्रोन और अन्य तकनीकी माध्यमों से भी निगरानी की जा रही है।

हालांकि केवल गुलदारों को पकड़ना ही समस्या का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।

इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि वन्यजीव आबादी वाले क्षेत्रों तक क्यों पहुंच रहे हैं और

उनके प्राकृतिक आवास में किस तरह के बदलाव हो रहे हैं।

ग्रामीणों के लिए जारी की जा रही सावधानियां

वन विभाग और प्रशासन की ओर से ग्रामीणों को सलाह दी जा रही है कि वे खेतों में अकेले न जाएं।

बच्चों पर विशेष नजर रखने और समूह में खेतों की ओर जाने की सलाह दी जा रही है।

विशेषकर गन्ने के खेतों में प्रवेश करने से पहले आसपास की स्थिति की जांच करना जरूरी है।

गुलदार दिखाई देने पर उसे घेरने या पकड़ने की कोशिश करने के

बजाय तत्काल वन विभाग और पुलिस को सूचना देना अधिक सुरक्षित है।

इंसान और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा जरूरी

बिजनौर की समस्या केवल गुलदारों की संख्या से जुड़ा विषय नहीं है।

यह मानव-वन्यजीव संघर्ष का जटिल मामला है। ग्रामीणों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन इसके

साथ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनके व्यवहार को समझना भी जरूरी है।

अगर जंगल, खेत और आबादी के बीच संतुलन बिगड़ता है तो ऐसी घटनाएं बढ़ सकती हैं।

इसलिए वैज्ञानिक अध्ययन, समय पर चेतावनी, ग्रामीण जागरूकता,

प्रभावी निगरानी और वन्यजीव प्रबंधन को एक साथ लागू करना जरूरी होगा।

निष्कर्ष

बिजनौर में गुलदार और इंसान के बीच बढ़ता संघर्ष अब गंभीर सामाजिक और

पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। चार साल के भीतर दर्जनों लोगों की मौत, सैकड़ों गांवों में गुलदारों की

मौजूदगी और गन्ने के खेतों में उनका बढ़ता ठिकाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।

वैज्ञानिक अध्ययन से इस संघर्ष के कारणों को समझने और उसके आधार पर स्थायी समाधान

निकालने की उम्मीद है। फिलहाल ग्रामीणों की सुरक्षा के साथ-साथ गुलदारों के वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर देना ही

इस समस्या को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

FAQ: बिजनौर में गुलदार का आतंक

1. बिजनौर में गुलदार का खतरा क्यों बढ़ रहा है?

गन्ने के घने खेत गुलदारों को छिपने और भोजन तलाशने के लिए

अनुकूल जगह देते हैं। इससे उनका ग्रामीण आबादी से संपर्क बढ़ रहा है।

2. बिजनौर में कितने गांव गुलदार के लिहाज से संवेदनशील हैं?

वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार जिले के आठ ब्लॉक के 190 गांव संवेदनशील श्रेणी में शामिल हैं।

3. क्या गुलदारों की वैज्ञानिक गणना शुरू हुई है?

हां। 2026 में बिजनौर में गुलदारों की वैज्ञानिक गणना और मानव-गुलदार संघर्ष का अध्ययन शुरू किया गया है।

4. ग्रामीणों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

ग्रामीणों को अकेले खेतों में जाने से बचना चाहिए, बच्चों पर नजर रखनी चाहिए और गुलदार

दिखाई देने पर उसे घेरने की कोशिश करने के बजाय वन विभाग को सूचना देनी चाहिए।

5. क्या गुलदारों को पकड़ने के लिए अभियान चल रहा है?

हां। प्रभावित क्षेत्रों में वन विभाग की टीमें पिंजरे और निगरानी व्यवस्था के जरिए गुलदारों को पकड़ने का अभियान चला रही हैं।

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