CJI सूर्यकांत ने नोएडा मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर जताई नाराजगी, छात्र को 5 लाख के नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

गौतमबुद्धनगर के एक छात्र को प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में जारी किए गए 5 लाख रुपये के निजी मुचलके के नोटिस ने अब सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींच लिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मामले पर नाराजगी जताते हुए सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं करने की बात स्पष्ट की थी, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से ऐसा नोटिस कैसे जारी किया गया।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। उन्हें दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन में कथित रूप से शामिल होने और दूसरे छात्रों को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित करने के आरोप में शांति बनाए रखने के लिए निजी मुचलका भरने का नोटिस दिया गया था। बाद में पुलिस जांच के बाद यह नोटिस वापस ले लिया गया।

छात्र को क्यों भेजा गया था 5 लाख रुपये का नोटिस?

मिली जानकारी के मुताबिक, 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के तृतीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट कार्यालय की ओर से अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किया गया था। यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 130 के तहत की गई थी।

नोटिस में उनसे छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका भरने और इतनी ही राशि के दो जमानतदार प्रस्तुत करने को कहा गया था।

पुलिस की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि छात्र ने अन्य विश्वविद्यालय छात्रों को दिल्ली में एक राजनीतिक संगठन के नेतृत्व में आयोजित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और कथित तौर पर सरकार विरोधी तथा भ्रामक सूचनाएं प्रसारित कीं। पुलिस ने आशंका जताई थी कि इससे विश्वविद्यालय परिसर में तनाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है।

अक्षत त्रिपाठी ने आरोपों से किया इनकार

छात्र अक्षत त्रिपाठी ने पुलिस के आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण तरीके से हिस्सा लिया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिस समय प्रदर्शन हुआ, उस दौरान वह विश्वविद्यालय की नियमित कक्षाओं में नहीं जा रहे थे।

अक्षत के मुताबिक, वह 25 मई को विश्वविद्यालय से निकलकर लगभग तीन महीने के सेमेस्टर ब्रेक पर प्रयागराज चले गए थे और 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल हुए थे। ऐसे में उनका सवाल है कि विश्वविद्यालय परिसर में तनाव पैदा करने या छात्रों को प्रभावित करने का आरोप किस आधार पर लगाया गया।

पुलिस जांच के बाद वापस लिया गया नोटिस

इस मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह रहा कि शुरुआती रिपोर्ट के आधार पर जारी नोटिस को बाद में वापस ले लिया गया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, अक्षत के संबंध में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए पुलिस ने उनके नोएडा स्थित आवास पर जाकर पूछताछ की।

जांच के बाद शुरुआती रिपोर्ट में दी गई जानकारी को गलत पाए जाने की बात सामने आई। इसके बाद 5 सितंबर को नोटिस को रद्द कर दिया गया और छात्र के खिलाफ आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई।

हालांकि, छात्र की ओर से यह भी कहा गया कि उन्हें नोटिस वापस लिए जाने की जानकारी औपचारिक रूप से नहीं मिली थी।

CJI सूर्यकांत ने क्यों जताई नाराजगी?

मामला बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के सामने आया तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, CJI ने सवाल उठाया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद किसी मजिस्ट्रेट ने छात्र के खिलाफ ऐसा आदेश जारी करने की हिम्मत कैसे की।

CJI ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी छात्र के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए और कोई भी मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता। मामले में संबंधित अधिकारी से जवाब दाखिल करने को कहा गया है।

क्या है ‘शांति बंधपत्र’ का प्रावधान?

इस पूरे मामले में ‘शांति बंधपत्र’ शब्द भी चर्चा में है। सामान्य तौर पर शांति बंधपत्र किसी व्यक्ति को

दोषी ठहराने की सजा नहीं है। यह कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका की स्थिति में प्रशासन की ओर से

उठाया जाने वाला एहतियाती कदम है।इस प्रक्रिया में संबंधित व्यक्ति से

यह आश्वासन लिया जा सकता है कि वह भविष्य में शांति बनाए रखेगा और

ऐसी गतिविधियों से दूर रहेगा जिससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो।

इस मामले में कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था।

इसके पीछे धारा 126 और 135 के तहत शुरू हुई कार्यवाही का उल्लेख किया गया था।

मामला प्रदर्शन और छात्रों की कार्रवाई से जुड़ा है

अक्षत त्रिपाठी का मामला 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़ा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रदर्शन में छात्रों समेत बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे।

प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा था।

बाद में छात्रों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया।

इसी पृष्ठभूमि में नोएडा के एक छात्र को निजी मुचलके का नोटिस दिए जाने पर अदालत में सवाल उठे हैं।

पहले भी नोएडा प्रशासन पर उठे हैं सवाल

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब गौतमबुद्धनगर प्रशासन की कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद

हाईकोर्ट भी हाल में कड़ा रुख अपना चुका है। एक अलग मामले में नोएडा से जुड़ी छात्र कार्यकर्ता

अकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत को हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए कार्रवाई को

मनमाना बताया और सरकार को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।

इस वजह से अक्षत त्रिपाठी को जारी नोटिस और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी को

प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल तथा छात्रों के अधिकारों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

छात्रों के अधिकार और प्रशासनिक शक्ति पर बहस

इस पूरे घटनाक्रम ने एक अहम सवाल खड़ा किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले

छात्रों के खिलाफ प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल किस सीमा तक किया जा सकता है।

प्रशासन का तर्क आम तौर पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित तनाव को रोकने से जुड़ा होता है,

जबकि छात्र पक्ष इसे अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जोड़कर देखता है।

अक्षत के मामले में खास बात यह है कि जिस नोटिस को लेकर विवाद हुआ,

उसे पुलिस जांच के बाद वापस ले लिया गया। इसके बाद

सुप्रीम कोर्ट में CJI की नाराजगी ने इस प्रकरण को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद संबंधित अधिकारी को अदालत के सामने जवाब दाखिल करना होगा।

इस जवाब से यह स्पष्ट हो सकता है कि छात्र के खिलाफ शुरुआती कार्रवाई किस आधार पर की गई थी और

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों को ध्यान में रखते हुए नोटिस कैसे जारी हुआ।

फिलहाल छात्र के खिलाफ जारी नोटिस वापस लिया जा चुका है। ऐसे में इस मामले का

अगला महत्वपूर्ण पहलू सुप्रीम कोर्ट में संबंधित अधिकारी की ओर से दिया जाने वाला जवाब होगा।

निष्कर्ष: नोएडा के छात्र अक्षत त्रिपाठी को प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में जारी

5 लाख रुपये के निजी मुचलके के नोटिस ने प्रशासनिक कार्रवाई और छात्रों के अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी है।

पुलिस जांच के बाद नोटिस वापस लिया जा चुका है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की नाराजगी ने मामले को गंभीर बना दिया है। अब नजर

इस बात पर है कि संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत के सामने अपनी कार्रवाई को लेकर क्या स्पष्टीकरण देते हैं।

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