मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को चिंता में डाल दिया है। ईरान ने अमेरिका के सहयोगी देशों और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए अलग-अलग तरह की बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल किया है। इनमें शाहेद ड्रोन, फतेह सीरीज की मिसाइलें और अन्य बैलिस्टिक मिसाइलें प्रमुख हैं।
ईरान की सैन्य रणनीति की खासियत यह है कि वह केवल महंगी और अत्याधुनिक मिसाइलों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन और बड़ी संख्या में मिसाइलों का इस्तेमाल करके विरोधी की एयर डिफेंस व्यवस्था पर दबाव बनाता है। इससे अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए लगातार हमलों को रोकना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
ईरान किन हथियारों का कर रहा इस्तेमाल?
मौजूदा संघर्ष में ईरान की ओर से इस्तेमाल किए जा रहे हथियारों में ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें सबसे महत्वपूर्ण हैं। इन हथियारों का इस्तेमाल अलग-अलग दूरी और अलग-अलग लक्ष्यों के लिए किया जा सकता है।
ईरान की रणनीति को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में समझा जा सकता है—लंबी दूरी की मिसाइलों से सैन्य ठिकानों पर हमला, ड्रोन के जरिए लगातार दबाव बनाना और बड़ी संख्या में हथियार भेजकर एयर डिफेंस सिस्टम को व्यस्त रखना।
यही कारण है कि पैट्रियट और THAAD जैसे महंगे एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद होने के बावजूद हर हमले को रोक पाना आसान नहीं है।
शाहेद ड्रोन बना ईरान की रणनीति का अहम हथियार
ईरान के ड्रोन बेड़े में शाहेद सीरीज का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है। इन ड्रोन का इस्तेमाल कम लागत वाले हमलों और बड़े पैमाने पर लक्ष्य पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है।
ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि एक साथ बड़ी संख्या में इन्हें इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि किसी क्षेत्र की एयर डिफेंस प्रणाली को लगातार कई दिशाओं से लक्ष्य मिलते रहें तो उसे हर खतरे पर समान स्तर की प्रतिक्रिया देना कठिन हो सकता है।
इसी रणनीति को सैन्य विशेषज्ञ अक्सर असिमेट्रिक वॉरफेयर के नजरिए से देखते हैं—यानी कम कीमत वाले हथियारों से ज्यादा महंगे रक्षा संसाधनों पर दबाव बनाना।
फतेह मिसाइलों की भी चर्चा
ईरान के मिसाइल कार्यक्रम में फतेह सीरीज काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। ये बैलिस्टिक मिसाइलें ईरान की रणनीतिक मारक क्षमता का हिस्सा हैं।
हालिया घटनाक्रम में ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों के क्षेत्रों की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागे जाने की खबरें सामने आई हैं। सितंबर की शुरुआत में जॉर्डन ने भी ईरानी मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने की जानकारी दी थी।
9 सितंबर को ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने जॉर्डन में अमेरिकी इस्तेमाल वाले एक सैन्य अड्डे की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागने का दावा किया। जॉर्डन के मुताबिक उसकी एयर डिफेंस ने अधिकांश मिसाइलों को रोक लिया।
अमेरिका के सहयोगी देशों पर क्यों बढ़ा खतरा?
अमेरिका की पश्चिम एशिया में लंबे समय से सैन्य मौजूदगी है। जॉर्डन, बहरीन, कतर, कुवैत, यूएई और अन्य खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां और सुविधाएं मौजूद हैं।
ऐसे में यदि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव बढ़ता है तो केवल दोनों देशों के बीच ही संघर्ष सीमित नहीं रहता। अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मेजबानी करने वाले देश भी संभावित लक्ष्य बन सकते हैं।
हाल के दिनों में जॉर्डन के अलावा खाड़ी क्षेत्र में भी ड्रोन और मिसाइल हमलों को लेकर अलर्ट बढ़ा है। ईरान समर्थित हूती समूह की गतिविधियों ने भी संघर्ष का दायरा बढ़ाया है।
एयर डिफेंस के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
आधुनिक युद्ध में किसी मिसाइल या ड्रोन को रोकने के लिए केवल एक सिस्टम पर्याप्त नहीं होता। अलग-अलग ऊंचाई, गति और दिशा से आने वाले खतरों से निपटने के लिए कई स्तर की एयर डिफेंस व्यवस्था की जरूरत होती है।
ईरान की रणनीति में एक साथ मिसाइल और ड्रोन का इस्तेमाल इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यदि एक ओर बैलिस्टिक मिसाइलें तेज गति से लक्ष्य की तरफ बढ़ें और दूसरी ओर बड़ी संख्या में
ड्रोन भेजे जाएं तो रक्षा प्रणाली को कई खतरों पर एक साथ प्रतिक्रिया करनी पड़ सकती है।
यही वजह है कि ईरान के अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन भी विरोधी के लिए महंगे साबित हो सकते हैं।
अमेरिकी युद्धपोत भी बने निशाना
हालिया तनाव केवल जमीन पर मौजूद सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है।
ईरान ने अमेरिकी नौसैनिक जहाजों को भी बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाने की कोशिश की है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार ऐसे हमलों में
अमेरिकी जहाजों को नुकसान नहीं पहुंचा और कोई अमेरिकी हताहत नहीं हुआ।
इसके बाद अमेरिका ने ईरानी तेल टैंकरों पर कार्रवाई की। अमेरिकी सेना ने
8 सितंबर को पांच ईरानी तेल टैंकरों को नष्ट करने की जानकारी दी, जिसके बाद ईरान की ओर से जॉर्डन में
अमेरिकी इस्तेमाल वाले ठिकाने पर मिसाइल हमला किए जाने की खबर आई।
होर्मुज की वजह से बढ़ी चिंता
ईरान-अमेरिका तनाव में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण है। यह दुनिया के
सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ने से सिर्फ मध्य पूर्व की
सुरक्षा ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर पड़ सकता है।
हालिया घटनाक्रम में ईरान की ओर से होर्मुज क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाने की खबरें आई हैं।
रॉयटर्स के अनुसार ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने 10 जहाजों पर
हमला करने की बात कही, जिनमें अमेरिकी जहाज और तेल टैंकर भी शामिल थे।
ड्रोन युद्ध का नया मोर्चा
ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा संघर्ष में ड्रोन तकनीक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
8 सितंबर को ईरान ने होर्मुज के प्रवेश क्षेत्र में एक अमेरिकी मानवरहित अंडरवॉटर वाहन को पकड़ने का दावा किया।
अमेरिकी पक्ष ने इसे एक ऐसा अंडरवॉटर ड्रोन बताया जो खराब हो गया था।
इस घटना से स्पष्ट है कि भविष्य के संघर्ष केवल मिसाइल और
लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं रहेंगे। हवा, समुद्र और पानी के भीतर काम करने वाले
मानवरहित सिस्टम भी सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं।
क्या ईरान की रणनीति सफल हो रही है?
ईरान की रणनीति का मुख्य उद्देश्य केवल किसी एक सैन्य ठिकाने को नुकसान पहुंचाना नहीं है।
बड़ी संख्या में अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों के इस्तेमाल से वह अमेरिका और
उसके सहयोगी देशों की रक्षा प्रणाली पर लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान के सभी हमले सफल रहे हैं।
कई मिसाइलों को अमेरिकी या सहयोगी देशों की एयर डिफेंस प्रणालियों ने इंटरसेप्ट किया है।
जॉर्डन ने हालिया हमले में 20 में से 18 मिसाइलों को रोकने की जानकारी दी।
फिर भी लगातार हमलों का आर्थिक और रणनीतिक असर बड़ा हो सकता है। सैन्य संसाधनों की खपत,
तेल आपूर्ति में बाधा और समुद्री परिवहन पर खतरा इस संघर्ष को क्षेत्रीय सीमा से बाहर ले जा सकता है।
आगे क्या होगा?
अमेरिका और ईरान के बीच टकराव फिलहाल बेहद संवेदनशील दौर में पहुंच गया है।
एक तरफ ईरान मिसाइल और ड्रोन के जरिए अमेरिकी ठिकानों तथा सहयोगी देशों पर दबाव बढ़ा रहा है,
वहीं अमेरिका ईरान की सैन्य और आर्थिक क्षमता को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
अगर मिसाइल हमले, ड्रोन अटैक और होर्मुज में समुद्री टकराव आगे भी जारी रहते हैं तो
खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष और फैल सकता है। इसका असर तेल की कीमतों,
वैश्विक शिपिंग और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ने की आशंका है।
निष्कर्ष: ईरान के शाहेद ड्रोन और फतेह समेत बैलिस्टिक मिसाइलें
उसकी मौजूदा सैन्य रणनीति के महत्वपूर्ण हथियार हैं। ईरान इनका इस्तेमाल बड़ी संख्या में करके
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की एयर डिफेंस पर दबाव बनाने की
कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर, अमेरिकी और सहयोगी देशों की बहुस्तरीय रक्षा प्रणालियां
कई हमलों को रोकने में सक्षम रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि दोनों
देशों के बीच सैन्य टकराव सीमित रहता है या पूरे खाड़ी क्षेत्र को अपनी चपेट में लेता है।
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