नई दिल्ली। भारत और अमेरिका ने 26 अगस्त 2026 को वॉशिंगटन में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में हुई प्रगति और भविष्य में साझेदारी को मजबूत करने के उपायों पर चर्चा की। परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अजीत कुमार मोहंती और अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट के बीच हुई बातचीत ऐसे समय में हुई है जब भारत परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और निजी एवं विदेशी भागीदारी के लिए नए नियम तैयार कर रहा है।
भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग से भविष्य में परमाणु तकनीक, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर, ऊर्जा सुरक्षा, निवेश और उन्नत परमाणु परियोजनाओं के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
भारत और अमेरिका ने असैन्य परमाणु सहयोग की प्रगति की समीक्षा की
भारत और अमेरिका ने द्विपक्षीय असैन्य परमाणु सहयोग (Civil Nuclear Cooperation) में हुई हालिया प्रगति और भविष्य में सहयोग को और मजबूत करने के उपायों पर चर्चा की है। यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब भारत अपने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार और उसमें निजी एवं विदेशी भागीदारी के लिए नीतिगत ढांचे को आगे बढ़ा रहा है।
26 अगस्त 2026 को वॉशिंगटन में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष एवं परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव अजीत कुमार मोहंती ने अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने असैन्य परमाणु क्षेत्र में सहयोग की मौजूदा स्थिति और आगे की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया।
परमाणु ऊर्जा को लेकर क्यों अहम है भारत-अमेरिका सहयोग?
भारत तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा की भूमिका बढ़ाने पर जोर दे रहा है। देश का लक्ष्य आने वाले दशकों में परमाणु ऊर्जा क्षमता में बड़ा विस्तार करना है। ऐसे में अमेरिका के साथ सहयोग से उन्नत परमाणु तकनीक, उपकरण, विशेषज्ञता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंच को बढ़ावा मिल सकता है।
विश्व परमाणु संघ के अनुसार, भारत ने 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को कम से कम 100 गीगावाट तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।
भारत में परमाणु क्षेत्र में निजी और विदेशी भागीदारी का रास्ता खुला
भारत ने हाल में परमाणु क्षेत्र को निजी और विदेशी निवेश के लिए अधिक अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अगस्त 2026 में जारी मसौदा नियमों में विदेशों में पहले से संचालित और प्रमाणित परमाणु रिएक्टर तकनीकों को भारत में इस्तेमाल करने की संभावनाओं के लिए नियामकीय व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है।
हालांकि, परमाणु सुरक्षा और नियामकीय निगरानी में सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका बरकरार रहेगी। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत परियोजनाओं के विभिन्न चरणों में सुरक्षा समीक्षा की जा सकेगी और नियामक संस्थाओं को आवश्यक होने पर परियोजना की प्रगति रोकने का अधिकार भी होगा।
अमेरिकी कंपनियों के लिए भी खुल सकते हैं नए अवसर
भारत के परमाणु क्षेत्र में नीतिगत बदलाव से अमेरिकी परमाणु कंपनियों के लिए भी संभावनाएं बढ़ सकती हैं। अमेरिकी परमाणु उद्योग भारत के नए नियामकीय ढांचे को लेकर अपनी प्रतिक्रिया तैयार कर रहा है।
विशेष रूप से लाइसेंसिंग, सुरक्षा मानकों, बीमा, वित्तीय सुरक्षा और परियोजना संरचना जैसे मुद्दों पर अमेरिकी उद्योग की ओर से सुझाव दिए जाने की संभावना है।
इससे भविष्य में भारत में अमेरिकी परमाणु तकनीक और उपकरणों के इस्तेमाल, संयुक्त परियोजनाओं तथा तकनीकी सहयोग की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर पर भी बढ़ रहा जोर
भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग का एक महत्वपूर्ण संभावित क्षेत्र Small Modular Reactors (SMRs) है।
दोनों देशों के बीच हुई हालिया बातचीत अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की ATLAS
पहल से पहले हुई है। ATLAS पहल में नागरिक जहाजों और समुद्री क्षेत्र में
छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के संभावित उपयोग पर चर्चा की जा रही है।
SMR तकनीक को भविष्य की परमाणु ऊर्जा व्यवस्था में महत्वपूर्ण माना जा रहा है
क्योंकि पारंपरिक बड़े रिएक्टरों की तुलना में इनके निर्माण और तैनाती का मॉडल अलग हो सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा बल
भारत और अमेरिका के बीच असैन्य परमाणु सहयोग केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है।
यह दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। जुलाई 2026 में अमेरिकी अधिकारी एस.
पॉल कपूर ने भी कहा था कि भारत और अमेरिका रक्षा तथा असैन्य
परमाणु सहयोग सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में संबंधों का विस्तार कर रहे हैं।
परमाणु ऊर्जा में सहयोग बढ़ने से भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने,
स्वच्छ ऊर्जा मिश्रण में परमाणु बिजली की हिस्सेदारी बढ़ाने और
उन्नत तकनीक हासिल करने में मदद मिल सकती है। वहीं अमेरिकी कंपनियों के लिए
भारत के तेजी से विस्तार करते ऊर्जा बाजार में नए कारोबारी अवसर पैदा हो सकते हैं।
आगे क्या होगा?
आने वाले समय में भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग में सबसे महत्वपूर्ण
मुद्दे तकनीकी साझेदारी, नियामकीय व्यवस्था, सुरक्षा मानक, निवेश,
रिएक्टर तकनीक और परियोजनाओं के व्यावसायिक क्रियान्वयन से जुड़े होंगे।
भारत जिस तरह परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और क्षेत्र को अधिक व्यापक
भागीदारी के लिए खोलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें अमेरिका के
साथ सहयोग को महत्वपूर्ण रणनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, किसी भी नई परमाणु परियोजना को आगे बढ़ाने में सुरक्षा, नियामकीय मंजूरी और आर्थिक व्यवहार्यता प्रमुख कारक रहेंगे।
निष्कर्ष
भारत और अमेरिका के बीच असैन्य परमाणु सहयोग में हुई चर्चा दोनों देशों के लिए ऊर्जा और
रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। परमाणु तकनीक, SMR, निवेश और उन्नत परियोजनाओं में
सहयोग बढ़ने से आने वाले वर्षों में दोनों देशों के बीच साझेदारी को नई दिशा मिल सकती है।
भारत के लिए यह सहयोग बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और दीर्घकालिक
ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने का अवसर है, जबकि अमेरिकी कंपनियों के लिए
भारत के विस्तारित परमाणु ऊर्जा बाजार में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
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