देशभर के लाखों शिक्षकों से जुड़े शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा है कि 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए नियुक्ति के समय TET अनिवार्य नहीं था, क्योंकि उस समय यह न्यूनतम योग्यता का हिस्सा नहीं था। इस हलफनामे के बाद विभिन्न राज्यों के शिक्षकों के बीच नई उम्मीद जगी है। हालांकि अंतिम फैसला अभी सुप्रीम कोर्ट को करना है।
क्या कहा NCTE ने अपने हलफनामे में?
NCTE ने अदालत को बताया कि 23 अगस्त 2010 को जारी अधिसूचना के बाद पहली बार कक्षा 1 से 8 तक के शिक्षकों की नियुक्ति के लिए TET को न्यूनतम योग्यता बनाया गया। इससे पहले लागू 2001 के नियमों के अनुसार नियुक्त शिक्षकों की नियुक्तियां उस समय के नियमों के अनुरूप थीं और उनकी वैधता पर केवल इस आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता कि उन्होंने TET पास नहीं किया था।
हलफनामे में यह भी स्पष्ट किया गया कि 2001 से 23 अगस्त 2010 के बीच नियुक्त शिक्षक उस समय लागू नियमों के तहत योग्य माने जाते थे।
सुप्रीम कोर्ट में क्या चल रहा है मामला?
यह विवाद उन मामलों से जुड़ा है जिनमें यह प्रश्न उठाया गया कि क्या RTE Act लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को भी सेवा जारी रखने या पदोन्नति के लिए TET अनिवार्य किया जा सकता है।
हाल के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिन कार्यरत शिक्षकों पर नियम लागू होते हैं और जिनकी सेवा में पर्याप्त समय शेष है, उन्हें निर्धारित समय सीमा के भीतर TET उत्तीर्ण करना होगा। बाद में समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत ने अनुपालन की समय-सीमा बढ़ाई, लेकिन TET की अनिवार्यता के सिद्धांत को बरकरार रखा।
23 अगस्त 2010 की अधिसूचना क्यों है महत्वपूर्ण?
NCTE की 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना के माध्यम से पहली बार TET को प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यता बनाया गया।
इसके बाद 29 जुलाई 2011 की अधिसूचना सहित अन्य संशोधनों में भी TET की अनिवार्यता जारी रखी गई।
यही कारण है कि अदालत में यह प्रश्न महत्वपूर्ण बन गया कि पुराने नियमों के तहत
नियुक्त शिक्षकों पर बाद में लागू नियम किस सीमा तक लागू किए जा सकते हैं।
किन शिक्षकों पर पड़ सकता है असर?
यदि किसी शिक्षक की नियुक्ति 23 अगस्त 2010 से पहले हुई थी, तो नियुक्ति के समय
TET अनिवार्य नहीं था। हालांकि सेवा जारी रखने, पदोन्नति या अन्य सेवा संबंधी मामलों में
अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट के आदेश और संबंधित राज्य सरकारों के नियमों पर निर्भर करेगी।
इसी वजह से विभिन्न राज्यों में इस विषय पर अलग-अलग कानूनी विवाद भी सामने आए हैं।
हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में बढ़ी चर्चा
NCTE के हलफनामे के बाद हिमाचल प्रदेश सहित कई राज्यों के
शिक्षकों में इस विषय को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
दूसरी ओर कुछ राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप उन
शिक्षकों की सूची तैयार कर रही हैं जिन्होंने अभी तक TET उत्तीर्ण नहीं किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत आदेश और उसके अनुपालन पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष
NCTE के हलफनामे ने यह स्पष्ट किया है कि 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त
शिक्षकों के लिए नियुक्ति के समय TET अनिवार्य नहीं था।
हालांकि वर्तमान में सेवा, पदोन्नति और अन्य अधिकारों पर अंतिम
निर्णय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और संबंधित नियमों के आधार पर ही तय होगा। इसलिए शिक्षकों को
आधिकारिक आदेशों और राज्य सरकार की अधिसूचनाओं पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
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