गोरखपुर विश्वविद्यालय में
गोरखपुर विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग और मौलाना अबुल कलाम आजाद एशियाई अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में देशभर से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने भारत की संस्कृति, दर्शन और विकास को लेकर अपने विचार साझा किए। संगोष्ठी का मुख्य विषय भारत की बदलती सोच, सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विकास रहा।
भारत की संस्कृति ही इसकी सबसे बड़ी ताकत
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्राचीन इतिहास के विशेषज्ञ प्रो. राजवंत राव ने कहा कि भारत की संस्कृति, सोच और सामाजिक व्यवस्था में निरंतर बदलाव और विकास होता रहा है। यही इसकी विशालता और भव्यता का सबसे बड़ा आधार है। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और सहिष्णुता से बनती है, जिसने हजारों वर्षों तक समाज को एकजुट बनाए रखा।
गांधी और विवेकानंद के विचारों पर जोर
संगोष्ठी में वक्ताओं ने राष्ट्र निर्माण में महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद के विचारों को बेहद महत्वपूर्ण बताया। प्रो. सभाजीत मिश्र ने कहा कि भारत की वास्तविक परिकल्पना तभी पूरी हो सकती है जब समाज आत्मबोध और आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़े। उन्होंने कहा कि केवल आर्थिक विकास ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक विकास भी उतना ही जरूरी है।
आत्मज्ञान के बिना अधूरी है प्रगति
विशेषज्ञों का कहना था कि आधुनिक भारत को तकनीकी और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के साथ-साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को भी बचाए रखना होगा। वक्ताओं ने कहा कि यदि समाज आत्मज्ञान और नैतिक मूल्यों से दूर हो जाएगा तो विकास अधूरा रह जाएगा। संगोष्ठी में भारतीय दर्शन और आधुनिक चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
शोधार्थियों और छात्रों ने लिया हिस्सा
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शोधार्थियों, छात्रों और शिक्षकों ने भाग लिया। संगोष्ठी के दौरान विभिन्न विषयों पर शोध पत्र भी प्रस्तुत किए गए। छात्रों ने भारतीय संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक बदलाव से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछे और विशेषज्ञों से संवाद किया।
आयोजन का उद्देश्य युवाओं को भारतीय चिंतन और दर्शन से जोड़ना बताया गया।
भारतीय विचारधारा पर हुई गहन चर्चा
दो दिवसीय संगोष्ठी में भारतीय इतिहास, संस्कृति, आध्यात्मिकता और
आधुनिक शिक्षा प्रणाली जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है। वक्ताओं ने कहा कि भारत का
वैश्विक प्रभाव उसकी सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान परंपरा की वजह से लगातार बढ़ रहा है।
कार्यक्रम में भारतीय दर्शन को आधुनिक दुनिया के संदर्भ में समझाने का प्रयास भी किया गया।
शिक्षा और संस्कृति के समन्वय पर जोर
विशेषज्ञों ने कहा कि शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा आधार है।
भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों को शिक्षा से जोड़ने की जरूरत पर भी जोर दिया गया।
वक्ताओं ने कहा कि नई पीढ़ी को भारतीय इतिहास और दर्शन की गहराई से जानकारी होनी चाहिए।
गोरखपुर विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ने भारतीय संस्कृति, आत्मज्ञान और सामाजिक
विकास को लेकर नई चर्चा शुरू की है। विशेषज्ञों ने भारत की विशालता और भव्यता को उसकी बदलती सोच और
सांस्कृतिक शक्ति से जोड़ते हुए युवाओं को भारतीय मूल्यों से प्रेरणा लेने का संदेश दिया।
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