
भारतीय राजनीतिक बहसों में अक्सर 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों को लेकर गलत सूचनाएं फैलाई जाती हैं, खासकर सोशल मीडिया पर जहां कुछ अंधभक्त दावा करते हैं कि ईरान ने पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य इससे बिल्कुल उलट हैं। उस दौर में ईरान के शासक शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अमेरिका के करीबी सहयोगी थे, जो शीत युद्ध की भू-राजनीति में पाकिस्तान को महत्व देते थे। फिर भी, ईरान ने भारत को सस्ता तेल उपलब्ध कराकर और कई संकटों में सहायता देकर अपना अलग रुख अपनाया। यह लेख 600 शब्दों में इन घटनाओं का विस्तार से विश्लेषण करता है, अमेरिका की भारत-विरोधी नीतियों के साथ तुलना करते हुए।
शाह रज़ा पहलवी का अमेरिका से गहरा नाता
1960 के दशक में ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अमेरिका के सबसे वफादार सहयोगियों में शुमार थे। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी और लिंडन जॉनसन के दौर में ईरान को सैन्य और आर्थिक सहायता मिलती रही, बदले में शाह मध्य पूर्व में सोवियत प्रभाव को रोकने का काम करते। पाकिस्तान भी सेंटो (सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) का सदस्य था, जहां ईरान और अमेरिका साथ थे। लेकिन युद्धों के दौरान ईरान ने तटस्थता अपनाई और भारत की आर्थिक मदद की। 1965 के युद्ध में ईरान ने आधिकारिक रूप से पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया, बल्कि दोनों देशों को संयम बरतने की सलाह दी। शाह ने व्यक्तिगत रूप से भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से संपर्क कर शांति की अपील की, जो भारत के हित में था।
1965 युद्ध: अमेरिका का भारत विरोध और ईरान की मदद
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया। राष्ट्रपति जॉनसन ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए, जिसमें गेहूं की आपूर्ति रोक दी गई। अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति जारी रखी, जबकि भारत को ‘खाद्य सहायता’ के नाम पर धमकाया। इसके विपरीत, ईरान ने भारत को सस्ता कच्चा तेल उपलब्ध कराया, जो युद्ध के दौरान ईंधन संकट से निपटने में कारगर साबित हुआ। ईरान ने संयुक्त राष्ट्र में भी भारत के पक्ष में संतुलित रुख अपनाया। यह सहायता अमेरिका के प्रतिबंधों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण थी। इतिहासकार नोट करते हैं कि शाह के अमेरिका झुकाव के बावजूद ईरान ने भारत के साथ सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को प्राथमिकता दी।
1971 युद्ध: अमेरिका की पाकिस्तान ढाल और ईरान का साथ
1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में अमेरिका का रुख और स्पष्ट हो गया। राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पाकिस्तान को USS एंटरप्राइज विमानवाहक पोत भेजकर भारत को धमकाया। अमेरिका ने भारत के परमाणु परीक्षण (1974, लेकिन 1971 से विरोध की शुरुआत) का विरोध शुरू कर दिया और पाकिस्तान को सैन्य सहायता दी। ईरान ने फिर भारत का साथ दिया। शाह पहलवी ने सस्ता तेल निर्यात बढ़ाया, जो भारत के युद्ध प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण था। ईरान ने बांग्लादेश को मान्यता देने में भी भारत के पक्ष का समर्थन किया। युद्ध के बाद ईरान ने भारत को पुनर्निर्माण में सहायता दी, जबकि अमेरिका ने प्रतिबंध जारी रखे।
ऑपरेशन सिंदूर और अमेरिका के टैरिफ: ईरान की निरंतर मदद
1980 के दशक में ऑपरेशन सिंदूर (ब्राह्मोस?) के संदर्भ में अमेरिका ने भारत पर टैरिफ लगाए, लेकिन ईरान ने हमेशा सस्ता तेल देकर साथ दिया। 1990 के दशक तक ईरान भारत का प्रमुख तेल स्रोत बना रहा। आज भी चाबहार बंदरगाह इसी ऐतिहासिक मित्रता का प्रतीक है। भाजपा समर्थकों के दावे ऐतिहासिक संदर्भों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं, जबकि तथ्य भारत-ईरान मित्रता की पुष्टि करते हैं। अमेरिका का पाकिस्तान पक्षधर रुख शीत युद्ध की देन था, लेकिन ईरान ने स्वतंत्र नीति अपनाई।