सऊदी क्राउन प्रिंस MBS के प्राइवेट फोन कॉल्स: ट्रंप पर ईरान हमले का दबाव
प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने फरवरी 2026 में अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कई प्राइवेट फोन कॉल्स किए। इन कॉल्स में MBS ने बार-बार ईरान पर सैन्य हमले की पैरवी की, भले ही सार्वजनिक रूप से सऊदी अरब डिप्लोमेसी और डी-एस्केलेशन की बात कर रहा था।
रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप शुरू में डिप्लोमेटिक रास्ता अपनाना चाहते थे, लेकिन MBS के लगातार दबाव और सऊदी खुफिया जानकारी के आधार पर उन्होंने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले का फैसला लिया। यह हमला ईरान के सुप्रीम लीडर आयतोल्लाह अली खामेनेई की मौत का कारण बना, जो मध्य पूर्व की जियोपॉलिटिक्स में ऐतिहासिक बदलाव लाया।
ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मुस्लिम एकता की कोशिशें: सऊदी का दोहरा खेल
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतोल्लाह अली खामेनेई ने दशकों तक इस्लाम के नाम पर मुस्लिम देशों को एकजुट करने की कोशिश की। उन्होंने OIC जैसे मंचों पर शिया-सुन्नी विभाजन को कम करने और इस्लामिक एकता का नारा दिया। लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट से साफ होता है कि सऊदी अरब, जो इस्लाम के पवित्र स्थलों का संरक्षक होने का दावा करता है, ने पीछे से ईरान को कमजोर करने के लिए अमेरिका को उकसाया।
चार अमेरिकी अधिकारियों (गुमनाम स्रोतों) के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि MBS ने ट्रंप को चेतावनी दी कि अगर अब हमला नहीं किया गया तो ईरान और ज्यादा खतरनाक हो जाएगा। यह दोहरा चरित्र मुस्लिम दुनिया में सऊदी की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इसराइल और सऊदी का संयुक्त दबाव: ट्रंप का अंतिम फैसला कैसे हुआ?
इसराइल लंबे समय से ईरान को अपना सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप पर हमले का दबाव बनाया था। लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट से पता चलता है कि
सऊदी क्राउन प्रिंस MBS ने भी इसमें बराबर की भूमिका निभाई।
MBS ने ट्रंप को पूर्ण समर्थन का आश्वासन दिया और कहा कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अब कार्रवाई जरूरी है।
नतीजतन, ट्रंप ने ईरान के सैन्य ठिकानों और न्यूक्लियर साइट्स पर हमले का आदेश दिया।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान से कोई तत्काल खतरा नहीं था,
लेकिन सऊदी-इसराइल लॉबिंग ने फैसला बदल दिया। अब्राहम एक्सॉर्ड्स के बाद
यह गठजोड़ और मजबूत हुआ, जो ईरान विरोधी एजेंडे पर टिका है।
वॉशिंगटन पोस्ट रिपोर्ट के स्रोत और प्रभाव
रिपोर्ट चार वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों पर आधारित है,
जो मामले से वाकिफ थे। इन स्रोतों ने पुष्टि की कि MBS के
कॉल्स पूरी तरह प्राइवेट थे और इनमें सऊदी इंटेलिजेंस शेयर की गई। ट्रंप ने सऊदी को क्षेत्रीय पार्टनर माना, लेकिन
यह दबाव JCPOA (ईरान न्यूक्लियर डील) को खत्म करने और अब नए युग की शुरुआत का हिस्सा था।
यह खुलासा मुस्लिम जगत में फूट को और गहरा करता है और सऊदी-अमेरिका गठबंधन की नई हकीकत दिखाता है।
क्या यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलेगा? आने वाला समय बताएगा।