कर्नाटक: सिद्धारमैया सरकार पर गोमाला जमीन नियम तोड़ने का आरोप, 22 दलित-OBC मठों को सौंपी 255 करोड़ की जमीन

कर्नाटक में नया विवाद: गोमाला जमीन पर सिद्धारमैया सरकार के फैसले पर सवाल

कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार एक बार फिर विवादों में घिर गई है। राज्य सरकार ने बंगलूरू के आसपास स्थित 22 दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) मठों को कुल 255 करोड़ रुपये मूल्य की गोमाला (गौ-चरागाह) जमीन आवंटित करने का फैसला लिया है। इस फैसले को लेकर विभागीय अधिकारियों ने खुलकर विरोध जताया है और इसे नियमों का स्पष्ट उल्लंघन बताया है।

गोमाला जमीन क्या है और नियम क्या कहते हैं?

कर्नाटक में गोमाला जमीन का मतलब वह सरकारी भूमि है जो पारंपरिक रूप से गायों के चरने के लिए आरक्षित होती है। कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम और विभिन्न सरकारी आदेशों के तहत ऐसी जमीन को निजी संस्थाओं, मठों, ट्रस्टों या व्यक्तियों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। केवल सार्वजनिक उपयोग (स्कूल, अस्पताल, आश्रम आदि) के लिए विशेष परिस्थितियों में छूट मिल सकती है, वह भी उच्च स्तरीय मंजूरी और स्पष्ट दिशानिर्देशों के साथ।

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इन 22 मठों को दी गई जमीन पूरी तरह गोमाला श्रेणी में आती है और इसका निजी धार्मिक संस्थाओं को आवंटन कानूनी रूप से संभव नहीं है।

सरकार का फैसला और विभागीय आपत्ति

कर्नाटक सरकार ने दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच कई कैबिनेट बैठकें कर इस प्रस्ताव को मंजूरी दी। कुल 255 करोड़ रुपये की अनुमानित बाजार मूल्य वाली यह जमीन बंगलूरू अर्बन और ग्रामीण जिलों में फैली हुई है। सरकार का दावा है कि यह दलित और OBC समुदायों के धार्मिक और सामाजिक संस्थानों को मजबूत करने के लिए किया गया है।

लेकिन राजस्व विभाग, भूमि सर्वेक्षण विभाग और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने लिखित रूप से आपत्ति दर्ज की है। उन्होंने कहा कि:

  • गोमाला जमीन का निजी हस्तांतरण प्रतिबंधित है
  • कोई भी स्पेशल छूट बिना विधानसभा या उच्च न्यायालय की मंजूरी के नहीं दी जा सकती
  • इस फैसले से भविष्य में अन्य समुदायों द्वारा भी इसी तरह की मांग बढ़ सकती है

विपक्ष का हमला: राजनीतिक लाभ के लिए नियम तोड़े

बीजेपी और जेडीएस ने इस फैसले को “चुनावी फायदे के लिए नियम तोड़ने” का मामला बताया है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सिद्धारमैया सरकार दलित-OBC वोटबैंक को साधने के लिए कानून की अनदेखी कर रही है। बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, “गोमाला जमीन गरीब किसानों और पशुपालकों की है, इसे मठों को सौंपना सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग है।”

कांग्रेस नेताओं ने जवाब में कहा कि यह सामाजिक न्याय की दिशा में कदम है और

मठों का उपयोग सामुदायिक कल्याण के लिए होगा।

क्या हैं आगे की संभावनाएं?

  • विपक्ष हाईकोर्ट में PIL दाखिल कर सकता है
  • विभागीय अधिकारी राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग कर सकते हैं
  • यदि मामला अदालत पहुंचा तो फैसला कई महीनों तक लंबित रह सकता है
  • सरकार को या तो फैसला वापस लेना होगा या वैकल्पिक जमीन तलाशनी होगी

निष्कर्ष: सामाजिक न्याय या नियम उल्लंघन?

कर्नाटक में गोमाला जमीन आवंटन का यह मामला अब सिर्फ भूमि का नहीं रहा, बल्कि राजनीति,

सामाजिक न्याय और कानून के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है।

सिद्धारमैया सरकार के इस फैसले से एक तरफ दलित-OBC समुदाय में खुशी है, वहीं

दूसरी तरफ नियम-कानून के प्रति सवाल खड़े हो रहे हैं।

आने वाले दिनों में यह विवाद और गरमाने की संभावना है।

क्या सरकार अपना फैसला बरकरार रख पाएगी या अदालत में चुनौती का सामना करना पड़ेगा