बिहार में चुनाव प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्ट तौर पर पूछा है कि हालिया विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद हटाए गए 3.66 लाख मतदाताओं के नाम और उनकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए। अदालत ने आयोग को यह निर्देश दिया है कि हटाए गए तथा जोड़े गए दोनों वर्ग के नामों का पूरा ब्योरा गुरुवार तक सौंपा जाए, ताकि इस मामले में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रह सके

.इस प्रकरण की शुरुआत तब हुई, जब याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाया कि बिहार की मतदाता सूची से लाखों नाम बिना सही प्रक्रिया से हटा दिए गए। उन्होंने अपील की कि चुनाव आयोग संचालन में पारदर्शिता नहीं रख रहा है और मतदाताओं के अधिकारों की अनदेखी हो रही है

चुनाव आयोग ने अदालत में प्रस्तुत किया कि अधिकांश हटाए गए नाम वे हैं जिनका या तो मृत्यु हो गई, वे राज्य से बाहर चले गए, या अन्य कारणों से अयोग्य हो गए। आयोग ने बताया कि अंतिम सूची 30 सितंबर को प्रकाशित हुई, जिसमें कई नए मतदाताओं के नाम जुड़े हैं। आयोग ने यह भी दावा किया कि अब तक किसी भी हटाए गए मतदाता ने औपचारिक शिकायत या अपील दर्ज नहीं की है

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने चुनाव आयोग पर पारदर्शिता के लिए और दबाव डालते हुए कहा कि सभी सूची उपलब्ध हैं – वर्ष 2022 की पुनरीक्षित सूची, 2025 का मसौदा और 2025 की अंतिम सूची – इसलिए इनकी तुलना कर ब्यौरा दिया जा सकता है।

जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि आयोग को जनसामान्य की पहुंच और विश्वास को मजबूत करना होगा एक बड़ा सवाल अदालत के सामने यह आया कि अंतिम सूची में जोड़े गए 21 लाख नए नाम कौन हैं – क्या ये वही 65 लाख मतदाता हैं

जिन्हें मसौदा सूची से हटाया गया था या अलग से नए मतदाता हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि अधिकांश नए जोड़े गए नाम बिल्कुल नए मतदाताओं के हैं और कुछ ही पुराने हैं याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि मतदाताओं की पहचान स्पष्ट न होने से लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है।

उन्होंने मुस्लिम और महिला मतदाताओं के निष्कासन पर चिंता जताई और अदालत से विशेष तौर पर इन वर्गों के विवरण प्रकाशित करने की मांग की अदालत ने अपने निर्देश में निष्कासन का पूरा विवरण वेबसाइट पर साझा करने और अयोग्य घोषित किए गए मतदाताओं को व्यक्तिगत रूप से सूचित करने को भी महत्वपूर्ण बताया है।

आयोग को आदेश दिया गया है कि वह इन मानकों का पालन करके पारदर्शिता सुनिश्चित करे इस मामले में अगली सुनवाई 9 अक्टूबर यानी गुरुवार को होगी, जिसमें आयोग को अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होगी।

अदालत के अनुसार देश के लोकतांत्रिक चुनावों की सबसे बड़ी ताकत निष्पक्षता और पारदर्शिता है, जिसे हर हाल में बनाए रखना जरूरी है बिहार की मतदाता सूची का संशोधन इस बार बहुत तीव्र और व्यापक स्तर पर हुआ, जिसमें 65 लाख नाम सबसे पहले मसौदा सूची से हटाए गए थे

और अंतिम सूची में यह संख्या 47 लाख रह गई। इसमें से 3.66 लाख नाम हटाए जाने की विशेष चर्चा अदालत में चल रही है। राजनीतिक दल चुनाव आयोग के निर्णय और निष्पादन पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि आयोग विधिक प्रक्रिया और तकनीकी कारणों का हवाला दे रहा है

इस बीच याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि निष्कासित मतदाताओं का डाटा वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाए, ताकि उनके अधिकारों का हनन न हो और वे शिकायत/अपील दर्ज कर सकें। अदालत ने आयोग को इन दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य किया है,

ताकि किसी मतदाता के साथ अन्याय न हो बिहार के चुनावी परिदृश्य में यह मामला आने वाले विधानसभा चुनावों की पारदर्शिता और विश्वास के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। आयोग पर जिम्मेदारी है कि वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कोई बाधा या अस्पष्टता न रखे। इसका सीधा असर राज्य की बड़ी आबादी, उनके मतदान अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा पर पड़ता है

इस प्रकरण की हर सुनवाई और आदेश भविष्य के चुनाव प्रणाली के लिए मील का पत्थर साबित हो सकते हैं, जिसमें मतदाता सूची का अद्यतन व निष्पादन पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष होना आवश्यक है

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