चिल्लूपार में कटे वोट
गोरखपुर जिले की राजनीति में 2022 विधानसभा चुनाव के बाद एक नया चर्चा का विषय सामने आया है। जिले की 8 विधानसभा सीटों पर कटे वोटों (अमान्य और NOTA) की संख्या ने विजेताओं की चिंता बढ़ा दी है। खासकर चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र में अमान्य वोटों की संख्या विजयी मार्जिन से चार गुना अधिक रही। यह स्थिति न केवल विजेताओं के लिए सबक है बल्कि मतदाताओं के असंतोष को भी दर्शाती है। चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि गोरखपुर की कई सीटों पर रिजेक्टेड वोटों ने करीबी मुकाबले को प्रभावित किया हो सकता था।
चिल्लूपार: सबसे चौंकाने वाले आंकड़े
चिल्लूपार विधानसभा सीट पर भाजपा के राजेश त्रिपाठी ने सपा के विजय कुमार को हराया। राजेश को 88,000 से अधिक वोट मिले जबकि मार्जिन करीब 20,000 वोटों का रहा। लेकिन यहां अमान्य वोटों की संख्या लगभग 80,000 के करीब पहुंच गई, जो विजयी मार्जिन से चार गुना अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ये वोट किसी एक उम्मीदवार को मिलते तो नतीजे उलट सकते थे।
मतदाताओं की शिकायत रही कि ईवीएम में गड़बड़ी या बटन दबाने में समस्या के कारण वोट कट गए। कई लोगों ने NOTA का विकल्प चुना क्योंकि उन्हें कोई उम्मीदवार पसंद नहीं आया। यह असंतोष स्थानीय मुद्दों जैसे बेरोजगारी, सिंचाई और विकास कार्यों से जुड़ा माना जा रहा है।
गोरखपुर की अन्य 7 सीटों पर स्थिति
गोरखपुर जिले में कुल 9 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 8 पर भाजपा ने जीत हासिल की। लेकिन कटे वोटों का प्रतिशत सभी सीटों पर चिंताजनक रहा:
- गोरखपुर शहरी: यहां भी अमान्य वोट हजारों में रहे, जो मार्जिन का बड़ा हिस्सा थे।
- सहजनवा, पिपराइच, कैंपियरगंज, खजनी, चौरी-चौरा और बांसगांव में रिजेक्टेड वोटों ने विजेताओं को सोचने पर मजबूर किया।
- कई सीटों पर NOTA को 5,000 से 15,000 तक वोट मिले, जो तीसरे स्थान पर रहे।
चुनाव आयोग के अनुसार, अमान्य वोटों की मुख्य वजह मतदाताओं का ईवीएम हैंडलिंग में अनाड़ीपन, जल्दबाजी या जानबूझकर गलत बटन दबाना रही। लेकिन राजनीतिक दलों का मानना है कि यह जनता का मौन विरोध है।
विजेताओं की चिंता: क्यों बढ़ी टेंशन?
भाजपा के विजेता विधायक अब इन कटे वोटों को गंभीरता से ले रहे हैं। चिल्लूपार के नवनिर्वाचित विधायक राजेश त्रिपाठी ने कहा कि वे क्षेत्र में जनसंपर्क बढ़ाएंगे और मुद्दों का समाधान करेंगे ताकि अगले चुनाव में ऐसा न हो। इसी तरह अन्य विधायकों ने भी जनता दर्शन और विकास कार्यों पर फोकस बढ़ाने की बात कही।
विपक्षी दल सपा और बसपा इसे जनता के असंतोष का प्रमाण बता रहे हैं।
सपा नेताओं का दावा है कि यदि ये वोट उन्हें मिलते तो कई सीटें उनकी झोली में जातीं।
NOTA का बढ़ता चलन उत्तर प्रदेश में चिंता का विषय बन गया है, जो मतदाताओं की निराशा को दिखाता है।
कारण और समाधान की दिशा
चुनाव विशेषज्ञों के अनुसार, कटे वोटों के पीछे मुख्य कारण:
- मतदाता जागरूकता की कमी।
- ईवीएम पर शक।
- उम्मीदवारों से असंतोष।
- ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी अनभिज्ञता।
चुनाव आयोग ने मतदाता शिक्षा अभियान तेज करने की बात कही है।
अगले चुनावों में मॉक पोल और ट्रेनिंग पर जोर दिया जाएगा।
राजनीतिक दलों को भी अपने उम्मीदवारों का चयन सावधानी से करना होगा
ताकि जनता का विश्वास जीता जा सके।
निष्कर्ष में कहें तो गोरखपुर की 8 विधानसभा सीटों पर कटे वोटों की
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए एक संदेश है।
विजेताओं को यह समझना होगा कि जीत केवल वोटों की संख्या से नहीं बल्कि जनता के विश्वास से होती है।
चिल्लूपार जैसे उदाहरण आने वाले चुनावों में सबक साबित होंगे।
यदि सुधार नहीं हुए तो 2027 में बड़ा उलटफेर हो सकता है।
