उत्तर प्रदेश, भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य, लंबे समय से बंटवारे की चर्चा का केंद्र रहा है। जनवरी 2026 में अमेठी के ददन सदन में खिचड़ी भोज के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह ने पूर्वांचल के 28 जिलों—मऊ, बलिया, गाजीपुर से लेकर आजमगढ़ तक—को मिलाकर अलग राज्य बनाने की मांग उठाई। उनका तर्क था कि 24 करोड़ की जनसंख्या वाले राज्य में एक प्रशासनिक ढांचा सुशासन स्थापित करने में असमर्थ है। पश्चिमी यूपी में बीजेपी सांसद संजीव बालियान जैसे नेताओं ने हरित प्रदेश की बात की, जबकि बुंदेलखंड सूखा-बाढ़ प्रभावित क्षेत्र अलग राज्य चाहता है। यह मांग राज्य के विकास असमानता को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
पूर्वांचल राज्य की मांग: कारण और समर्थन
पूर्वांचल समर्थक कहते हैं कि यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग पिछड़े हैं; अयोध्या-काशी जैसे पर्यटन केंद्रों के बावजूद संसाधन नहीं पहुंचते। पलायन, बेरोजगारी और विकास असमानता मुख्य कारण हैं। डॉ. संजय सिंह की मांग ने पूर्वांचल के 28 जिलों को एकजुट कर नया राज्य बनाने का सपना साकार करने की कोशिश की है। यह क्षेत्र गंगा के मैदानी इलाकों से घिरा है, जहां कृषि मुख्य अर्थव्यवस्था है, लेकिन बाढ़ और गरीबी बड़ी समस्या। अलग राज्य बनने से स्थानीय प्रशासन मजबूत होगा और केंद्र से सीधे फंड मिलेगा। अन्य क्षेत्रों में भी समान मांगें हैं—हरित प्रदेश पश्चिमी यूपी के औद्योगिक विकास के लिए, जबकि बुंदेलखंड जल संकट से जूझ रहा है।
ऐतिहासिक संदर्भ: पिछली कोशिशें
यह मांग नई नहीं। 2011 में मायावती सरकार ने यूपी को चार भागों—हरित प्रदेश (पश्चिमी), अवध प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वांचल—में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में लाने की घोषणा की थी। हालांकि, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से यह आगे नहीं बढ़ा। 2000 में उत्तराखंड यूपी से अलग हो चुका, जो सफल उदाहरण है। उत्तराखंड के अलग होने से वहां पर्यटन और विकास में तेजी आई। इसी तरह, पूर्वांचल के लिए भी अलग राज्य की मांग पुरानी है, जो क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने का प्रयास है। राजनीतिक दलों में इस पर विभाजित राय है—कुछ इसे विकास का माध्यम मानते हैं, जबकि अन्य राज्य की एकता को खतरा बताते हैं।
उत्तर प्रदेश विभाजन: संसद से परमिशन कैसे मिलेगी? पूरी प्रक्रिया
उत्तर प्रदेश विभाजन के लिए संसद से अनुमति जरूरी है। प्रक्रिया अनुच्छेद 3 के तहत होती है, जहां राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पास होना चाहिए, फिर केंद्र सरकार संसद में बिल लाती है। लोकसभा और राज्यसभा में बहुमत से पास होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलती है। उत्तराखंड के मामले में यही प्रक्रिया अपनाई गई।
पूर्वांचल के लिए पहले विधानसभा में समर्थन जुटाना होगा,
जो वर्तमान सरकार पर निर्भर है। केंद्र की अनुमति के बिना यह संभव नहीं।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि 2026 में चुनावी वर्ष होने से यह मुद्दा गर्माया है।
चुनौतियां और संभावित लाभ
बंटवारे की चुनौतियां कम नहीं—नए राज्य में प्रशासनिक ढांचा, राजधानी, संसाधन वितरण जैसे मुद्दे।
लेकिन लाभ भी स्पष्ट हैं: छोटे राज्य में बेहतर शासन, स्थानीय मुद्दों पर फोकस और विकास।
उत्तराखंड जैसा उदाहरण दिखाता है कि अलगाव से प्रगति संभव है।
हालांकि, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनसमर्थन जरूरी।