भारत ने तेल खरीद घटाने की बनाई रणनीति
, ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराया खतरा
“लेख विस्तार से (रीराइटेड):नयी दिल्ली/वॉशिंगटन। वैश्विक तेल बाजार में हलचल एक बार फिर तेज हो गई है क्योंकि अमेरिका ने रूस की दो प्रमुख तेल कंपनियों पर नई सख्त पाबंदियां लगा दी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में इस फैसले का सबसे सीधा असर भारत सहित उन देशों पर पड़ने वाला है, जो अब तक रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात कर रहे थे। भारत ने संकेत दिया है कि वह साल के अंत तक रूसी तेल की खरीदारी में भारी कटौती करेगा, जिसके कारण देश की ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों दोनों पर दबाव बढ़ सकता है
रूस की दिग्गज तेल कंपनियां—रोज़नेफ्ट और लुकोइल—अमेरिकी पाबंदी के दायरे में आ गई हैं। भारत अब तक रोज़नेफ्ट से अपनी 35% और लुकोइल से 12% तेल की ज़रूरतें पूरी कर रहा था। 2022 में भारत ने औसतन 17 लाख बैरल तेल रोज़ाना रूस से मंगाया था, जो अब घटकर करीब 12-13 लाख बैरल हो सकता है।
इस निर्णय का सबसे बड़ा कारण अमेरिकी प्रतिबंध हैं, जिसके कारण भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों को वैश्विक फाइनेंशियल सिस्टम और भुगतान में दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।सरकारी तेल कंपनियों—इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम—ने भी रूसी तेल की खरीद के लिए फिलहाल नए टेंडर बंद कर दिए हैं। कंपनियों ने बाजार में विकल्पों की तलाश तेज कर दी है, ताकि पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से अतिरिक्त आपूर्ति का रास्ता निकाला जा सके। परंतु कीमतें और लॉजिस्टिक्स दोनों ही भारत के लिए चुनौती बनने जा रहे हैं।

ऊर्जा मंत्रालय के एक सूत्र के अनुसार, “हमारा पहला उद्देश्य घरेलू आपूर्ति में कोई बाधा नहीं आने देना है, लेकिन स्थिति बदलती रही तो पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं।” विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर रूसी तेल की खरीद और कम हो गई, तो भारत को मजबूरी में दूसरी जगहों से महंगा तेल खरीदना पड़ेगा, जिसका बोझ आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूसी तेल पर अमेरिकी दबाव केवल भारत ही नहीं, बल्कि चीन, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को भी प्रभावित कर रहा है। भारत सरकार ने फिलहाल सार्वजनिक रूप से पाबंदियों का विरोध नहीं किया है परन्तु कूटनीतिक स्तर पर अमेरिकी प्रशासन से छूट की मांग की जा रही है। अगर स्थिति लंबी चलती है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल आ सकता है और देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई नीति बनानी पड़ सकती है।
भारत के लिए यह वक्त बेहद संवेदनशील है क्योंकि त्योहारों में ऊर्जा की मांग चरम पर होती है। सरकार और कंपनियां एक तरफ कीमतें नियंत्रित रखना चाहती हैं, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय दबाव और खुद की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है।