नीलगाय का कहर
नीलगायों का आतंक, किसानों का दर्द – गोरखपुर में फसलें बर्बाद
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में नीलगाय (ब्लू बुल) का कहर बढ़ता जा रहा है। पाली क्षेत्र के न्यूास गोविंदपुर, भगवानपुर, सजनापार और हस्पती गांवों में नीलगायों के झुंड रातोंरात खेतों में घुसकर फसलों को चर-चर कर बर्बाद कर रहे हैं। दिसंबर 2025 की इस घटना ने सैकड़ों किसानों को आर्थिक संकट में डाल दिया है। गेहूं, चना, मसूर, सरसों, आलू, अरहर और विभिन्न सब्जियों की फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं। किसान रात-दिन पहरा दे रहे हैं, लेकिन नीलगायों की संख्या इतनी ज्यादा है कि रोक पाना मुश्किल हो गया है। यह समस्या नई नहीं है, लेकिन इस सीजन में नुकसान का आंकड़ा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। आइए, इस संकट की पूरी तस्वीर देखते हैं।
घटना का विवरण: कैसे बर्बाद हो रही हैं फसलें?
पाली क्षेत्र में नीलगायों का आतंक पिछले एक महीने से चरम पर है। ग्रामीणों के अनुसार, रात के अंधेरे में 20-30 के झुंड में नीलगायें खेतों में घुस आती हैं और सुबह तक सब कुछ तबाह कर देती हैं। न्यूास गोविंदपुर के किसान रामप्रताप ने बताया, “हमारी गेहूं की फसल जो नवंबर में बोई थी, वो अभी-अभी अंकुरित हुई थी। एक रात में ही 2 एकड़ बर्बाद हो गया। चना और मसूर के खेत भी चपेट में हैं।”
भगवानपुर गांव में सरसों और आलू की फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं। एक किसान ने कहा, “नीलगायें आलू के खेतों को उखाड़ फेंकती हैं, जबकि अरहर के पौधे तोड़ देती हैं। सब्जियों के खंडहर हो जाते हैं।” सजनापार और हस्पती में भी यही हाल है – कुल मिलाकर 100 एकड़ से ज्यादा फसलें प्रभावित बताई जा रही हैं। वन विभाग की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, जंगल कटाई और शहरीकरण के कारण नीलगायें खेतों की ओर रुख कर रही हैं।
किसानों पर असर: आर्थिक नुकसान और मानसिक तनाव
यह नुकसान किसानों के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है। एक एकड़ गेहूं की फसल का अनुमानित नुकसान 20-25 हजार रुपये है, जबकि सरसों और आलू पर 30-40 हजार तक। पूरे क्षेत्र में सैकड़ों किसान प्रभावित हैं, जिनमें छोटे-मझोले किसान बहुमत में हैं। रामनाथ यादव (सजनापार) ने शिकायत की, “पहले सूखा, फिर बाढ़, अब नीलगाय। हमारा एक साल का मेहनत पर पानी फिर गया। कर्ज चुकाने का क्या होगा?”
किसानों में निराशा इतनी है कि कई रात भर जागकर पटाखे फोड़ते हैं या डराने के लिए नाटक करते हैं, लेकिन नीलगायें भागती ही नहीं। महिलाएं और बच्चे भी खेतों की रखवाली में लगे हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। जिला प्रशासन को दर्जनों शिकायतें मिल चुकी हैं, लेकिन तत्काल राहत नहीं मिली।
नीलगाय समस्या का कारण: क्यों बढ़ रहा है खतरा?
नीलगायें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित हैं, इसलिए इन्हें मारना या शिकार करना अपराध है। लेकिन बढ़ती आबादी के कारण ये खेतों में घुस आती हैं।
गोरखपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में जंगलों का क्षरण, अवैध कटाई और खाद्य संकट
नीलगायों को मजबूर कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है
कि UP में नीलगायों की संख्या 10 लाख से ज्यादा है,
जो फसलों को सालाना 500 करोड़ का नुकसान पहुंचाती हैं।
पाली क्षेत्र में पास के जंगलों से नीलगायें निकलकर आ रही हैं,
और सूखे मौसम में भोजन की तलाश में खेतों पर हमला बोल रही हैं।
समाधान के उपाय: किसान क्या करें, सरकार क्या करे?
किसानों को तत्काल राहत के लिए कुछ टिप्स:
- बाड़ लगाएं: ऊंची जाली या इलेक्ट्रिक फेंसिंग लगाएं (सरकारी सब्सिडी उपलब्ध)।
- प्राकृतिक डरावने: नीम की टहनियां या मिर्ची के पाउडर का छिड़काव।
- पटाखे और लाइट: रात में सोलर लाइट्स और आवाज वाले डिवाइस यूज करें।
- शिकायत दर्ज: वन विभाग की हेल्पलाइन 1926 पर कॉल करें या तहसीलदार को आवेदन दें।
सरकार को सख्त कदम उठाने चाहिए – नीलगायों को पकड़कर अन्य क्षेत्रों में छोड़ना,
स्ट्रिंगलाइटिंग या कंडोम विधि (गोली में कंडोम भरना) जैसे वैज्ञानिक उपाय अपनाना।