भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रारंभिक चरण में आदिवासी समुदायों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जो विद्रोह किया, उसका प्रतीक चिन्ह थे तिलका मांझी। झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र के एक साहसी संथाल आदिवासी योद्धा तिलका मांझी ने 1784 में ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध पहला सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। आज उनके बलिदान दिवस पर कोटि-कोटि नमन। तिलका मांझी जी का जीवन संघर्ष न केवल आदिवासी अस्मिता का प्रतीक है, बल्कि समस्त भारत के स्वाधीनता संग्राम की नींव भी।
तिलका मांझी का जीवन और पृष्ठभूमि
तिलका मांझी का जन्म 1750 के आसपास झारखंड के भोगनाडीह (वर्तमान में साहिबगंज जिला) में हुआ था। संथाल परगना क्षेत्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1770 के दशक से भारी कर वसूली, जंगल कटाई और आदिवासियों की जमीन छीनना शुरू कर दिया। संथालों की पारंपरिक आजीविका और संस्कृति पर हमला हुआ। तिलका मांझी, जो एक सामान्य किसान और शिकारी थे, ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। वे अपनी तीर-कमान की कुशलता और साहस के लिए प्रसिद्ध थे।
1784 का ऐतिहासिक विद्रोह
1784 में तिलका मांझी ने ब्रिटिश कलेक्टर जॉन क्लेयर को निशाना बनाया। उन्होंने एक तीर से क्लेयर को घायल कर दिया, जो उस समय संथाल परगना का मुख्य प्रशासक था। यह घटना भारतीय इतिहास में ब्रिटिश अधिकारियों पर पहला प्रत्यक्ष हमला मानी जाती है। इस घटना के बाद ब्रिटिश सेना ने तिलका मांझी के खिलाफ अभियान चलाया। उन्होंने जंगलों में छापामार युद्ध लड़ा और हजारों संथालों को संगठित किया।
ब्रिटिश सेना ने उन्हें पकड़ लिया और 1785 में भागलपुर (बिहार) में फांसी पर लटका दिया। फांसी से पहले उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को चुनौती दी और कहा, “हमारी जमीन, हमारा जंगल, हमारा अधिकार है।” उनकी शहादत ने बाद के संथाल हूल (1855), बिरसा मुंडा विद्रोह और अन्य आदिवासी आंदोलनों को प्रेरित किया।
तिलका मांझी का महत्व और विरासत
तिलका मांझी को “भारत का पहला आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी” कहा जाता है। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से
73 साल पहले ही सशस्त्र विद्रोह शुरू किया। उनकी लड़ाई न केवल ब्रिटिश शोषण के खिलाफ थी,
बल्कि आदिवासी अधिकारों, जंगल-जमीन और स्वशासन की थी। आज झारखंड,
बिहार और पूरे देश में उन्हें आदिवासी क्रांति का प्रथम नायक माना जाता है।
भोगनाडीह में उनका स्मारक है, जहां हर साल बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि दी जाती है।
सरकार ने उनकी याद में डाक टिकट जारी किया और कई स्कूल-कॉलेजों में उनका नाम रखा गया है।
उनकी कहानी युवा पीढ़ी को सिखाती है कि अन्याय के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए।
नमन और संदेश
आज तिलका मांझी जी के बलिदान दिवस पर हम उनके साहस, बलिदान और आदिवासी गौरव को याद करते हैं।
उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई आदिवासी समुदायों ने सबसे पहले शुरू की थी।
कोटि-कोटि नमन उन नायकों को,
जिन्होंने अपनी जान देकर भारत की आजादी की नींव रखी।