नेपाल की राजनीति में नया संकट: काकी सरकार को समर्थन, संसद भंग पर विरोध तेज
नेपाल की राजनीति एक बार फिर बड़े संकट से गुजर रही है। देश में सुषील काकी के नेतृत्व में नई सरकार बनने की घोषणा के साथ ही संसद भंग किए जाने के फैसले ने विवाद खड़ा कर दिया है। एक तरफ प्रमुख राजनीतिक दलों ने काकी सरकार को स्वीकार किया है, तो दूसरी तरफ संसद भंग का विरोध भी जोर पकड़ चुका है। आठ बड़े दलों ने इस कदम को असंवैधानिक बताते हुए संसद को बहाल करने की मांग उठाई है।
नेपाल की राजधानी काठमांडू से लेकर प्रांतों तक इस निर्णय के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। जनता, विपक्ष, बुद्धिजीवी वर्ग और सामाजिक संगठन सभी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राय जाहिर कर रहे हैं। नेपाल में लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता का दौर जारी रहा है, लेकिन संसद भंग ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।
संसद भंग का निर्णय और संवैधानिक सवाल
संसद लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर भेजती है ताकि वे उनकी आवाज़ संसद में उठा सकें। लेकिन अचानक संसद भंग करने के फैसले ने लोगों को चौंका दिया। संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है। उनका मानना है कि ऐसा करके सरकार ने न केवल जनता के भरोसे को तोड़ा है बल्कि संवैधानिक मर्यादा का भी उल्लंघन किया है।
पूर्व प्रधानमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं ने इसे गंभीर संवैधानिक संकट बताया है। उनका कहना है कि नेपाल ने बड़ी मुश्किल से लोकतंत्र की राह चुनी थी, और अब इस तरह के कदम से लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर हो रही है।
विपक्षी दलों की एकजुटता
नेपाल कांग्रेस, माओवादी सेंटर, समाजवादी पार्टी समेत आठ दलों ने एक स्वर में संसद बहाली की मांग की है। इन दलों ने राष्ट्रपति से अपील की है कि संसद को तुरंत बहाल किया जाए ताकि लोकतंत्र की रक्षा हो सके। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह सरकार असंवैधानिक नींव पर खड़ी है, इसलिए टिक नहीं पाएगी।
विपक्ष ने आंदोलन तेज करने का ऐलान किया है। जगह-जगह विरोध रैलियां निकाली जा रही हैं। युवा संगठन, छात्र संघ और महिला संगठन भी इस विरोध में शामिल हो गए हैं। उनका कहना है कि जनता को ठगा नहीं जा सकता।
जनता की नाराज़गी और सड़क पर संघर्ष
कर्फ्यू हटते ही सड़कों पर बड़ी संख्या में लोग उतर आए। उन्होंने सरकार के खिलाफ नारे लगाए और संसद बहाली की मांग की। कई जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी हुई। पुलिस ने भीड़ को काबू करने के लिए बल प्रयोग किया, लेकिन जनता का आक्रोश थमा नहीं।
कई जगह छात्र संगठनों ने विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन किए। महिलाओं ने भी मोर्चा संभालते हुए कहा कि संसद भंग कर सरकार ने लोकतंत्र का गला घोंट दिया है। नेपाल की आम जनता का कहना है कि नेताओं की आपसी लड़ाई का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता है।
आर्थिक स्थिति पर असर
नेपाल की अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर है। कोरोना महामारी और पर्यटन उद्योग की गिरावट ने हालात बिगाड़ दिए। ऐसे में राजनीतिक संकट ने निवेशकों का भरोसा भी हिला दिया है। बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई चरम पर है और विकास योजनाएं अधर में लटकी हुई हैं। जनता चाहती है कि स्थिर सरकार बने, ताकि आर्थिक हालात सुधर सकें।
लेकिन संसद भंग ने यह उम्मीद और कम कर दी है। गरीब तबका सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय नजरें नेपाल पर
नेपाल की राजनीति पर हमेशा से भारत और चीन की नज़र रहती है। नेपाल भौगोलिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत चाहता है कि नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थिर रहे। वहीं चीन का कहना है कि नेपाल को अपने आंतरिक मामलों का हल खुद निकालना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने शांति बनाए रखने की अपील की है। अमेरिका और यूरोपियन यूनियन भी लोकतंत्र की बहाली के पक्ष में हैं। ऐसे में नेपाल की स्थिति अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विषय बन गई है।
मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका
नेपाल के अखबारों और टीवी चैनलों पर संसद भंग का मुद्दा छाया हुआ है। संपादकीय लेखों में सरकार की आलोचना की जा रही है। टीवी डिबेट्स में नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिल रही है।
सोशल मीडिया पर भी जनता खुलकर अपनी नाराज़गी जता रही है। ट्विटर और फेसबुक पर संसद बहाली से जुड़े हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। युवा वर्ग इंटरनेट के माध्यम से आंदोलन को आगे बढ़ा रहा है।
काकी सरकार पर सवाल
काकी सरकार के समर्थक दलों का कहना है कि यह सरकार देश को नई दिशा देगी। उनका मानना है कि यह सरकार विकास के लिए काम करेगी और जनता का विश्वास जीत लेगी। लेकिन विरोधियों का कहना है कि यह सरकार अलोकतांत्रिक है और ज्यादा दिन नहीं टिकेगी।
महिला सशक्तिकरण का मुद्दा
इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की नई प्रधानमंत्री सुषील काकी को महिला सशक्तिकरण का शानदार उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि यह पूरे दक्षिण एशिया के लिए प्रेरणा है कि एक महिला इतनी ऊँचाई तक पहुंच सकती है। मोदी ने कहा कि नेपाल की जनता को इस मौके का उपयोग सकारात्मक बदलाव लाने के लिए करना चाहिए।
महिला संगठनों ने भी इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया, लेकिन साथ ही संसद भंग का विरोध किया। उनका कहना है कि महिला नेतृत्व का सम्मान होना चाहिए लेकिन लोकतंत्र को कमजोर नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
नेपाल एक बार फिर राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। संसद भंग से पैदा हुआ यह संकट लोकतंत्र की जड़ों को हिला रहा है। विपक्ष, जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय सभी इस फैसले के खिलाफ हैं। आठ प्रमुख दलों की एकजुटता इस बात का संकेत है कि यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है।
काकी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसद बहाली की है। अगर यह मुद्दा सुलझा नहीं, तो नेपाल फिर से अराजकता और अस्थिरता में फंस सकता है। जनता की उम्मीदें स्थिरता और विकास की ओर हैं। अब देखना होगा कि नेपाल के नेता समय रहते समझदारी दिखाते हैं या फिर देश को एक और संकट में धकेल देते हैं।