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आज हमारे देश में स्वदेशी की बातें बहुत होती हैं। मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह ‘Make in India’, ‘Vocal for Local’ जैसे नारे गूंजते हैं। लेकिन जब उन नारों को बोलने वाले लोगों की ज़िंदगी पर नज़र डालते हैं, तो एक अजीब सा विरोधाभास दिखाई देता है। जो लोग स्वदेशी का झंडा उठाकर दूसरों को उपदेश देते हैं, वही लोग अपने जीवन में विदेशी वस्तुओं से घिरे रहते हैं।
उनके घरों की दीवारों पर लगी टीवी, सोफ़े, मोबाइल, कारें — सब विदेशी ब्रांड्स के होते हैं। उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई विदेशों में होती है, और जब पूछा जाए कि क्यों नहीं अपने देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षा दिलाई, तो कहते हैं — “वहां का स्तर ऊँचा है।” यह सोच देश के विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। क्योंकि जिस देश को अपनी मिट्टी, अपनी शिक्षा, अपनी प्रतिभा पर विश्वास नहीं, वह कैसे खुद को आत्मनिर्भर बना सकेगा?
स्वदेशी का मतलब सिर्फ भारतीय चीज़ें खरीदना नहीं होता; यह आत्मगौरव की भावना है, अपने देश की मेहनत और योग्यता पर विश्वास करने की सोच है। लेकिन दुःख की बात है कि जिन लोगों के पास समाज में प्रभाव है, उनके कर्म और उनके वचन में बहुत अंतर है।
मंच पर “देश के लिए” बोलते हैं, मगर घर लौटते ही विदेशी वस्तुओं की चमक में अपना स्वाभिमान खो देते हैं। हाथ की घड़ी foreign brand की, जेब में imported फोन, और मन में पश्चिम की चकाचौंध — यह कैसी स्वदेशी भावना है? क्या ऐसे दिखावटी लोग इस देश का सच्चा परिवर्तन कर सकते हैं?
भारत आज भी गाँवों की मिट्टी में, कारीगरों के हाथों में, और नौजवानों की सोच में बसता है। जो व्यक्ति अपने देश के शिल्पकार पर भरोसा नहीं कर सकता, जो अपने ही किसान, अपने ही उद्योगपति, और अपने ही शिक्षक की मेहनत को छोटा समझता है — वह किसी भी मंच पर खड़ा होकर चाहे जितना लंबा भाषण दे दे, उसकी बातें खोखली रहेंगी।
सच्चा देशभक्त वही है जो पहले अपने आचरण से उदाहरण पेश करे। जो अपने बच्चे को देश के स्कूल में पढ़ाए, अपने घर में भारतीय उत्पादों को अपनाए, अपने कारखाने में देशी मजदूर को अवसर दे — वही वास्तविक “स्वदेशी” है।
देश केवल नारों से नहीं चलता, वह आत्मविश्वास से चलता है। यदि हर भारतीय अपने कर्म से यह दिखा दे कि उसे अपने देश पर भरोसा है, तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
हमारी असली ताकत बाहर से आयात करने में नहीं, बल्कि भीतर से निर्माण करने में है। जब तक हम “विदेशी दिखावे” से ऊपर उठकर “स्वदेशी गर्व” की भावना नहीं अपनाएँगे, तब तक राष्ट्र निर्माण का सपना अधूरा रहेगा।
